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नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ने की सरकार के आर्थिक नीतियों की आलोचना 

Publish Date: February 12 2018 06:20:32pm

नई दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यज) : नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और अर्थशास्त्री अरविंद पनगढिय़ा ने केन्द्र सरकार के द्वारा प्रस्तुत आम बजट की आलोचना की है। एक अखबार में छपे उनके आलेख में बताया गया है कि केंद्र सरकार का हालिया बजट 1991 से पहले के लाइसेंस राज की वापसी का संकेत दे रहा है। बता दें कि पनगढय़िा मोदी सरकार के पसंदीदा अर्थशास्त्रियों में से एक रहे हैं।

पनगढिय़ा ने अपने आर्टिकल में लिखा कि जब भारत सरकार ने दिसंबर 2017 में कई चीजों पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाई तो मुझे लगा कि ऐसा रेवेन्यू के लिए किया जा रहा है लेकिन बजट में पतंगों से लेकर जूतों और मोबाइल फोन से लेकर मोटर कारों तक में ड्यूटी बढ़ा दी गई है। उन्होंने लिखा है कि इसे देखकर मेरी उम्मीद टूट गई। आगे वे लिखते हैं कि राजस्व सचिव हसमुख अधिया ने यह साफ किया है कि ड्यूटी बढ़ाने का मकसद रेवेन्यू बढ़ाना नहीं है बल्कि माइक्रो, स्मॉल और मीडियम इंटरप्राइजेस को संरक्षण देना है। 

इधर सरकार की आर्थिक नीतियों का समर्थन करने वाले अर्थशास्त्रियों ने पनगढय़िा के आर्टिकल पर आश्चर्य जताया है। आरएसएस समर्थित स्वदेशी जागरण मंच के अश्वनी महाजन ने कहा कि आज की परिस्थितियों की तुलना 1991 से पहले की परिस्थितियों से करना गलत है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया बिजनेस के लिए अपने दरवाजे खोलकर बैठी है। ऐसे में हमारे लिए भी यह जरूरी है कि हम व्यापार के लिए अपने रास्ते खुले रखें।

वहीं भारतीय जनता पार्टी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने पनगढिय़ा की आलोचना पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि साढ़े तीन सालों तक वह खुद सरकार का हिस्सा रहे हैं और सरकार के अंदर हुई हर चर्चा में शामिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि पता नहीं इस बजट से वह इतने ताज्जुब में क्यों हैं। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें रघुराम राजन की तरह उनके पद से हटाया गया हो। वह खुद अपना पद छोडऩा चाहते थे क्योंकि उन्हें डर था कि कोलंबिया यूनिवर्सिटी की उनकी नौकरी न कहीं चली जाएगी।

महाजन और स्वामी दोनों ने इशारों में कहा कि पनगढिय़ा एक विदेशी होने के नाते भारत की जमीनी हकीकत को नहीं समझते हैं और इसलिए वह नीति आयोग के प्रमुख का पद संभालने के लिए उपयुक्त नहीं थे। महाजन ने कहा कि विदेशी आर्थशास्त्री अक्सर विकास के ट्रिकल-डाउन मॉडल का समर्थन करते हैं, फिर चाहे इसका नतीजा जॉबलेस ग्रोथ क्यों न हो। 
 

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