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18 लाख रुपए का बिल,फिर भी जान नहीं बची

Publish Date: January 11 2018 08:30:31pm

फरीदाबाद (उत्तम हिन्दू न्यूज): भले ही निजी अस्पतालों के भारी भरकम बिलों के खिलाफ कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हों, ङ्क्षकतु इनकी मनमानी बदस्तूर जारी है। गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल के बाद  फरीदाबाद के एशियन अस्पताल का नया मामला सामने आया है। बुखार से पीड़ति एक गर्भवती महिला के 22 दिन उपचार का 18 लाख का बिल थमा दिया गया, जबकि महिला और उसके गर्भ में पल रहे आठ माह के बच्चे को भी बचाया नहीं जा सका।  फरीदाबाद के गांव नचौली के निवासी सीताराम ने अपनी 20 वर्षीय बेटी श्वेता को 13 दिसम्बर को बुखार होने पर अस्पताल में भर्ती कराया था। वह 32 सप्ताह की गर्भवती भी थी। अस्पताल में तीन-चार दिन इलाज के बाद डॉक्टरों ने परिजनों से कहा कि बच्चा पेट में मर गया है और ऑपरेशन करना होगा ।
      परिजनों का कहना है कि अस्पताल प्रशासन ने कहा कि साढ़े तीन लाख रुपए जमा कराने का पर ही ऑपरेशन किया जायेगा । परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन में देरी की वजह से श्वेता के पेट में संक्रमण हो गया। हालत बिगडऩे पर श्वेत को सघन चिकित्सा केन्द्र (आईसीयू)में भर्ती कराया गया। इस दौरान परिवारजन इलाज के लिए पैसे जमा कराते रहे।      श्वेता के पिता ने आरोप लगाया कि उन्हें बेटी से मिलने भी नहीं दिया जाता था। पांच जनवरी को जब वह आईसीयू में बेटी को देखने गए, तो वह अचेत थी। अस्पताल प्रशासन और पैसे जमा कराने के लिए बराबर दबाव डालता रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि जब और पैसे देने से मना कर दिया गया, तो उसके कुछ समय बाद श्वेत को मृत घोषित कर दिया गया।
      उधर अस्पताल प्रशासन ने श्वेता के पिता के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसे टाइफाइड था। उसकी किडनी भी सही ढंग से काम नहीं कर रही थीं। इसलिए उसे आईसीयू में भर्ती किया गया था। हालत में कुछ सुधार होने पर उसे सामान्य वार्ड में भेज दिया गया था, ङ्क्षकतु पेट में संक्रमण होने की वजह से मरीज को फिर आईसीयू में लाना पडा। भारी भरकम बिल पर अस्पताल प्रशासन का कहना है कि 18 लाख रुपए का खर्च आया था। परिजनों ने करीब दस लाख रुपए जमा कराये थे। बिल की बाकी रकम अस्पताल ने माफ कर शव परिजनों को सौंप दिया है ।
      उल्लेखनीय है कि गुरुग्राम के फोर्टिस अस्पताल में डेंगू से पीड़ति सात साल की बच्ची के इलाज के लिए 16 लाख रुपए का बिल बनाया गया था। उपचार पर इतनी रकम खर्च करने के बावजूद बच्ची की मृत्यु हो गई थी। इस मामले में अस्पताल के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उसकी भूमि की लीज रद्द करने के साथ ही रक्त बैंक का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था। 

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