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अयोध्या पर क्या मंजूर है शिया वक्फ का फैसला

Publish Date: December 11 2017 11:32:21am

अयोध्या में राममन्दिर निर्माण पर दोनों पक्षकारों और समुदाय के बीच धर्मगुरु और आर्ट्स आफ लिविंग के संस्थापक श्री- श्री रविशंकर जी और शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी की पहल कितनी कामयाब होगी, अभी कहना मुश्किल है लेकिन इस प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि श्री के पास जहाँ इस विवाद के हल का फार्मूला नहीं था, वहीं शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का नजरिया साफ है । यह बोर्ड काफी अर्से से इस विवाद को खत्म करने की पहल करता चला आ रहा है  लेकिन दूसरे पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड और दूसरे इस्लामिक संस्थाएं यह मानने को तैयार नहीं हैं। वह विवादित स्थल पर मस्जिद बनाना चाहती हैं जबकि यह सम्भव नहीँ दिखता है। 

शिया बोर्ड का यह प्रस्ताव अपने आप में ऐतिहासिक है कि राम मंदिर अयोध्या में बना दिया जाए जबकि मस्जिद का निर्माण लखनऊ में कराया जाय क्योंकि यही एक उपाय है जिसके चलते देश में शांति और भाईचारा बना रहेगा। रिजवी ने श्री श्री रविशंकर से बेंगलुरु में मुलाकात कर अयोध्या विवाद को सही ढंग से सुलझाने को लेकर बातचीत की थी। शिया समुदाय विवादित स्थल पर सुन्नी समुदाय का दावा बेमतलब मानता है । शिया समुदाय के विचार में 1944 से बाबरी मस्जिद में शिया लोग नमाज के लिए जा रहे हैं। शिया प्रशासन द्वारा चलाए जा रही इस मस्जिद को सुन्नी समुदाय ने अपने नाम पर रजिस्टर करा लिया था लेकिन बाद में इस अवैध करार दे दिया गया था लेकिन फिलहाल इसका कोई हल निकला नहीं दिखता हैं । 

अयोध्या पर अब तक नौ बड़ी पंचायतें हो चुकी हैं  लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकला क्योंकि कोई भी पक्ष अपने दावे को छोडऩे के लिए तैयार नहीं है, इस लिए श्री और शिया वक्फ बोर्ड की पहल कितनी कामयाब होगी, यह कहना मुश्किल है। श्री की इस पहल को कटघरे में भी खड़ा किया गया है । इसे गुजरात चुनाव से भी जोड़कर देखा गया है हालांकि इसे सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता है । उन्होंने खुद अपने ट्वीट में कहा है कि कितना विचित्र है कि कुछ लोग प्रयास करने से पहले असफलता के गीत गाते हैं। उसमें रस लेते हैं। इस नकारात्मकता से हमें बाहर आना होगा। 

श्री का यह ट्वीट अपने आप में सारी तस्वीर साफ कर देता है। इससे यह साफ जाहिर होता है राम मंदिर की अंतिम आस सुप्रीमकोर्ट का अंतिम फैसला होगा। अयोध्या में राम मन्दिर का निर्माण होना चाहिए क्योंकि वह श्री राम की जन्मस्थली है न कि बाबर की । दूसरी बात राम जन्मभूमि से जुड़े पक्षकार भी चाहते हैं कि मस्जिद अयोध्या के बाहर बने और उसका नाम बाबरी न रखा जाय क्योंकि यह गुलामी की प्रतीक है। 

श्री - श्री और शिया बोर्ड की पहल के पूर्व राममंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का अच्छा सुझाव भी आया था लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं दिखता लेकिन एक बात साफ हो गई कि अदालत आखिरकार बीच का रास्ता अपनाते हुए दोनों समुदाय की भावनाओं और देश की सांस्कृतिक विरासत और गौरवमयी सभ्यता को ध्यान में रखते हुए फैसला सुना सकती है। वह फैसला दोनों समुदायों के हित में होगा जिसे मानना सभी की बाध्यता होगी क्योंकि सबसे बड़ी अदालत के फैसले के बाद दूसरा रास्ता नहीं बचता। अब फरवरी से इस पर नियमित सुनवाई होगी। राममंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का अच्छा सुझाव आया था।  अदालत ने राममंदिर और बाबरी मस्जिद के पक्षकारों को अपनी भाषा में साफ संदेश दिया है। अगर इस बात को कोई नहीं समझता है तो यह उसकी खुद की भूल समझी जाएगी। अदालत ने कहा है कि अगर न्याय क्षेत्र से बाहर इस विवाद हल निकाला जाता है तो सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश भी पहल करेंगे। यह अनुकूल वक्त है, इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। गरिमामयी पीठ की भाषा को दोनों धर्म और समुदाय के साथ पक्षकारों को समझना चाहिए।

आखिरकार आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मसले का फैसला अदालत ही करेगी। वह फैसला किसी के हित और दूसरे के विपरीत हो सकता है। उस स्थिति में सर्वोच्च संवैधानिक पीठ का फैसला सभी को मानना होगा लेकिन अगर हिंदू-मुस्लिम पक्षकार आपसी सहमति से सौहार्दपूर्ण तरीके से विवाद का हल निकाल लेते हैं तो इससे बढिय़ा कोई तरीका नहीं होगा। इसका साफ संदेश पूरी दुनिया में जाएगा। जिस सहिष्णु धर्म-संस्कृति के लिए भारत की पहचान विश्वभर में है, एक बार फिर प्रमाणित हो जाएगी। इस निर्णय को हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोग मानने को तैयार होंगे? क्या मुस्लिम समुदाय राम जन्मभूमि कही जाने वाली जमीन से अपना दावा छोड़ेगा? क्या आपसी बात से अदालत के बाहर इसका फैसला हो जाएगा? तमाम ऐसे सवाल हैं जिसके लिए अभी इंतजार करना होगा। अदालत ने यह बात भाजपा नेता एवं अधिवक्ता सुब्रहमण्यम स्वामी की याचिका पर कही है। स्वामी की तरफ से मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए याचिका दायर की गई है। राममंदिर हिंदू और मुसलमान दोनों के लिए उतना महत्त्वपूर्ण है। आज सांप्रदायिक विलगाव की जो स्थिति बनी है, उसके बीच में भी यही मसला है।
अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने वर्ष 2०1० में अपना फैसला सुनाया था जिसमें पूरी विवादित जमीन को तीन भागों में बांटने का फैसला किया था। एक भाग हिंदू पक्ष, दूसरा वक्फबोर्ड और तीसरा हिस्सा तीसरे पक्षकार को देने निर्णय दिया गया था लेकिन पक्षकारों को यह फैसला मंजूर नहीं हुआ और मसला सुप्रीम कोर्ट चला गया। बाद में केंद्र सरकार ने वहां की 7० एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली। आस्था से जुड़े इस विवाद की सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी पहल किसकी तरफ से होनी चाहिए। 

ऐतिहासिक प्रमाण है कि 1528 में राम जन्मभूमि पर मस्जिद का निर्माण हुआ था। 1853 में पहली बार इस जमीन को लेकर दोनों संप्रदायों में विवाद हुआ। 1859 में विवाद की वजह से अंग्रेजों ने पूजा और नमाज अदा करने के लिए बीच का रास्ता अपनाया था। दोनों समुदायों में विवाद गहराता देख 1949 में केंद्र सरकार ने ताला लगा दिया। बाद में 1986 में फैजाबाद जिला अदालत ने हिंदुओं की पूजा आराधना के लिए ताला खोलने का आदेश दिया। 

सांप्रदायिक सौहार्द के लिए दूरदर्शी निर्णय होगा। मसाइल के हल से दोनों समुदायों के बीच बनी दूरी खत्म हो जाएगी। इसके लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को सकारात्मक पहल करनी चाहिए। यह आस्था का प्रश्न है। उस स्थिति में धर्म गुरुओं के साथ सभी पक्षकारों, न्यायाधीश, राजनीतिज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और देश की दूसरी जानीमानी हस्तियों को मिलाकर एक कमेटी बननी चाहिए जिसमें दोनों समुदायों की जिम्मेदारी हो। आपसी सहमति के बाद राममंदिर का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए। सरकार को इसके लिए आगे आना चाहिए। राममंदिर निर्माण के लिए मुस्लिमों और बाबरी के लिए हिंदुओं को पहली ईंट रखनी चाहिए। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है लेकिन सब कुछ इतना आसान नहीं दिखता पर एक बात साफ हो गई है कि अदालत आखिरकार बीच का रास्ता अपनाते हुए दोनों समुदायों की भावनाओं और देश की सांस्कृतिक विरासत और गौरवमयी सभ्यता को ध्यान में रखते हुए फैसला सुना सकती है। वह फैसला दोनों समुदायों के हित में होगा जिसे मानना सभी की बाध्यता होगी क्योंकि सबसे बड़ी अदालत के फैसले के बाद दूसरा रास्ता नहीं बचता। भगवान श्री राम तम्बू से भव्य मंदिर में कब विराजमान होंगे, इसका करोड़ों हिंदुओं को इंतजार है। 

लेखक प्रभुनाथ शुक्ल
 

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