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हिमाचल में जन-संवेदनशील हो नयी सरकार 

Publish Date: December 13 2017 01:14:54pm

-राजेन्द्र राजन
विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होते ही हिमाचल की सर्द फिजां में राजनीतिक गर्मी का माहौल होगा। जीत का सेहरा भाजपा के माथे पर बंधे या फिर कांग्रेस के, जनअपेक्षाएं चरम पर होंगी। अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाला हर व्यक्ति इस कदर व्यग्र है कि वह सरकार से अपेक्षा करता है कि उसके दु:ख दर्द दूर हों और वह बेहतर जीवन जीने के स्वपन को साकार कर पाये। जनादेश जन के विश्वास पर टिका होता है। उसे जन शिकायतों के निवारण व विकास में रूपांतरित करना चुने हुए जनप्रतिनिधियों का कर्तव्य है। लेकिन भ्रष्टाचार में लिप्त, निकम्मे व कामचोर जनप्रतिनिधियों को लोग सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने की भूल नहीं करते। यही इस चुनाव में होने जा रहा है। 1985 से हिमाचल का इतिहास साक्षी है कि जनता ने किसी भी पार्टी को रिपीट नहीं किया। यानी लोग हर पांच साल बाद कांग्रेस या भाजपा को चुनकर कुर्सी पर बिठा देते हैं। हिमाचल न तो बंगाल है जहां 35 साल तक माक्र्सवादी पार्टी की सत्ता रही या गुजरात जहां 22 साल से लोग भाजपा को झेलने के लिये बाध्य हों। यहां हर चुनाव विकास के मुद्दे व स्थानीय समस्याओं को केन्द्र में रख कर लड़े जाते रहे हैं। 70 लाख की आबादी में से 50 लाख मतदाता हर पांच साल बाद बदलाव को गले लगाते हैं तो इसका अर्थ है कि हिमाचल में किसी भी पार्टी की कार्यशैली से सन्तुष्ट नहीं दिखते। पांच साल बाद सत्तारूढ़ दल को उखाड़ फैकना उनकी फितरत में शामिल है। यानी दोनों ही पार्टियां ऐसी ‘बेस्ट परफारमर’ नहीं हैं कि उन्हें पुन: मौका दिया जाए। लोगों के लिये भाजपा और कांग्रेस में खास फर्क नहीं है। चेहरे बदल जाते हैं कार्यशैली वही रहती है। प्रत्येक मतदाता को नयी सरकार से यह अपेक्षा रहती है कि जनप्रतिनिधि लोगों के प्रति संवेदनशील हों और उनका अपने-अपने हलके में लगातार जनसंपर्क बना रहे और वे समस्याओं को हल करना उनका एकमात्र व मूल एजेन्डा हो। 

हिमाचल में सडक़ों की दुर्दशा से लोग $खफा हैं। लोक निर्माण विभाग पर विधायकों या मन्त्रियों का नियन्त्रण कभी नहीं रहा। इस विभाग और चुने हुए सेवकों के ‘गठजोड़’ से सब परिचित हैं। पहाड़ की पीड़ा को वे लोग बेहतर जानते हैं जिन्होंने सडक़ दुर्घटनाओं में अपने किसी सगे को खोया है। स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति भी बदतर नहीं है। 70 लाख की आबादी में शिमला, कांगड़ा, मंडी में मैडिकल कालेजों की स्थापना के बाद नाहन, चम्बा में मैडिकल कालेज खुल चुके हैं। हमीरपुर में खुलने वाला है। बिलासपुर में एम्स का शिलान्यास ऐतिहासिक है। लेकिन बड़े शहरों या कस्बों को छोड़ दिया जाए तो ग्राम्य अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति बेहद खराब है। पांगी, लाहुल में हर साल सैकड़ों मरीज़ बिना इलाज के दम तोड़ देते हैं। डाक्टरों को वहां अपनी तैनाती काला पानी लगती है।

शिक्षा के नाम पर हिमाचल में 16 से अधिक निजी विश्वविद्यालय अपने पंख खोल चुके हैं लेकिन गुणवता के लिहाज से हिमाचल में एक भी स्कूल, कालेज या विश्वविद्यालय नहीं है जो राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता हो। सरकारी स्कूलों में बच्चे फेल होते हैं और प्राइवेट स्कूलों में शत-प्रतिशत परिणाम आते हैं। गत पांच साल तक कांग्रेस सरकार के मुखिया भ्रष्टाचार के मामलों में उलझे रहे व पार्टी में अन्दरूनी घमासान के कारण विकास खूंटी पर टंगा रहा। हिमाचल 50 हजार करोड़ के कर्ज में डूबा है। नयी सरकार किस प्रकार इस समस्या से निपटेगी कोई नहीं जानता। भ्रष्टाचार के मामलों में ‘जीरो टालरेस’ की घोषणाएं गुदगुदाती तो जरूर हैं लेकिन नयी सरकार के सत्तासीन होते ही हिमाचल में ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’ गुलज़ार हो उठती है। नयी सरकार अपने चेहतों को अपने पसन्दीदा स्टेशनों पर फिट करने के लिये सॉफट बनी रहती है। उसे लगता है कि हजारों-हजार ट्रासंफरस के बाद शायद उसकी पार्टी के कार्यकत्र्ता खुश होंगे। इस मानसिकता से उबरना जरूरी है। तबादलों से ‘ट्रांसफर माफिया’ पनपता है और लाखों के लेन-देन के आरोप लगते हैं। सरकार की छवि खराब होती है। अत: प्रशासनिक स्तर पर केवल अति आवश्यक तबादले ही होने चाहिए। हिमाचल में पौंग व भाखड़ा बांध विस्थापितों की समस्याएं 50 साल बाद भी जस की तस हैं। विगत पांच साल में कांग्रेस के राजस्व मन्त्री शायद एक बार सैर सपाटे के लिये राजस्थान गये हों, लेकिन पौंग बांध विस्थापितों के पुर्नवास के लिये कोई ठोस नीति है ना ही कामिटमेन्ट। इसी प्रकार किन्नौर और दीगर कबायली जिलों में महिलाओं के प्रॉपर्टी राइटस की बहाली के लिये किसी ने भी प्रयास नहीं किया। ‘कस्टमरी लॉ’ के नाम पर महिला समाज का अन्तहीन शोषण बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जनापेक्षा यह है कि जनप्रतिनिधि जन के प्रति अपनी जवाबदेही को समझें। सार्वजनिक समारोहों में फूल मालाओं से लदकर या शालें, टोपियां, स्मृति चिन्ह ही एकत्रित न करते रहें। पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल की इस बात के लिये तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान शाल, टोपियां या अन्य उपहार स्वीकार करने की परम्परा पर अंकुश लगाने का प्रयास किया था। किसानों को बंदरों और आवारा पशुओं से राहत मिले, इसके लियो कोई ठोस प्लान तैयार हो।

हिमाचल के लोग दोनों पार्टियों के नेताओं से इसलिये भी खफा दिखे कि चुनावों में विकास की कहीं चर्चा नहीं हुई। पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती रहीं। गुडिय़ा कांड जैसे संवेदनशली मुद्दों को प्रचार का आधार बना कर उन्हें वोट में बदलने के प्रयास हुए। यानी अगले पांच साल में विकास का माडल क्या होगा, इसकी चर्चा प्रचार के दौरान जरूरी नहीं समझी गयी। लोगों की सबसे बड़ी अपेक्षा बेरोजगारी दूर करने की है। दस लाख युवाओं को कैसे रोजगार मिले। नई सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। सरकार लोगों को स्वरोजगार के लिये प्रेरित करे और उसके लिए आधारभूत ढ़ाचा तैयार करे। युवा सरकारी नौकरियों के पीछे न दौड़ें। कर्जे के बोझ के नीचे दबी नई सरकार सरकारी क्षेत्र में रोजगार का सृजन कैसे कर पाएगी, यह अहम प्रश्न है। नई सरकार को चाहिए कि मन्त्रीमण्डल का आकार छोटा रखे सीपीएस और पीएस की नियुक्तियों न हों और निगमों व बोर्डों में अपने चेहतों को खपाने के दबाव में न आए। नयी सरकार के नेता आमजन के प्रति संवेदनशीलता बरतें और उनके घर-द्वार पर उनकी शिकायतों को सुनकर उनका समाधान खोजें तो निश्चित रुप से नयी सरकार की छवि लोगों के दिलों में उतर सकती है।


(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार है)

 

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