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अमेरिका की भूमिका

Publish Date: December 15 2017 12:21:18pm

विश्व स्तर पर अमेरिका की भूमिका समय के साथ और महत्वपूर्ण हो रही है। अमेरिका, रूस और चीन यह तीनों विश्व की राजनीति के साथ-साथ सामरिक व आर्थिक क्षेत्र में भी विशेष महत्व रखते हैं। वर्तमान में अमेरिका, चीन और रूस के साथ संतुलन बनाकर चलने का अप्रत्यक्ष प्रयास तो कर रहा है, लेकिन विश्व स्तर पर हो रहे घटनाक्रम को देखते हुए अमेरिका के लिए परेशानियां बढ़ रही हैं। '

उत्तर कोरिया ने तो अमेरिका के विरुद्ध वाक युद्ध तो शुरू कर ही रखा है और जमीनी स्तर पर भी युद्ध करने की धमकी आये दिन अमेरिका को दे रहा है। अमेरिका भी उत्तर कोरिया को आये दिन अंजाम भुगतने को तैयार रहने की चेतावनी दे रहा है। इन दोनों के तनाव को देखते हुए विश्व में तीसरे महायुद्ध होने की चर्चा चल रही है। ऐसे में अमेरिका द्वारा उत्तर कोरिया से बिना शर्त बातचीत करने के लिए तैयार होना एक राहत भरा समाचार है। 'वाशिंगटन में अटलांटिक काउंसिल फोरम में हुए एक बैठक में उत्तर कोरिया को लेकर टिलरसन के रुख में नरमी देखी गई। उन्होंने कहा कि हम लोग पहली बैठक बिना किसी पूर्व शर्त के करने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि हम लोग मिलें और इस बात पर चर्चा करें कि बातचीत कैसे होगी। इससे पहले अधिकारियों ने कहा था कि किम जोंग-उन का प्रशासन हथियार छोडऩे पर विचार के संकेत दे। टिलरसन की यह पेशकश उत्तर कोरिया पर गंभीर प्रतिबंधों और दो सप्ताह पहले किम द्वारा किए गए अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल परीक्षण के बाद हुई है। यह पेशकश टिलरसन की पिछली टिप्पणी में बदलाव का प्रतीक है जब उन्होंने कहा था कि अमेरिका उत्तर कोरिया से बातचीत नहीं करेगा और यह वार्ता केवल तभी होगी जब वह हमारे पक्ष में चर्चा को तैयार हो। टिलरसन ने कहा, हमने राजनयिक पक्ष से कहा है कि अमेरिका किसी भी समय बिना पूर्व शर्त पहली बैठक के लिए उत्तर कोरिया से बातचीत को तैयार है। उन्होंने कहा कि चलिए, मिलते हैं और हम एक रोडमैप का खाका खींचने की कोशिश शुरू करते हैं। हालांकि व्हाइट हाउस ने दावा किया कि उत्तर कोरिया पर ट्रंप के नजरिए में कोई बदलाव नहीं आया है।'

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम में वाकयुद्ध तो चल ही रहा है। अमेरिका के विदेश मंत्री टिलरसन ने पाकिस्तान को भी चेतावनी देते हुए कहा है कि 'यदि उसने हक्कानी नेटवर्क और सुरक्षित पनाह पाने वाले अन्य आतंकी गुटों के साथ रिश्तों में बदलाव की प्रक्रिया शुरू नहीं को तो पाक के राजनीतिक नेतृत्व की उसके ही देश पर से पकड़ खत्म हो जाएगी। अमेरिका ने चिंता जताई कि अमेरिका-पाक के बीच अच्छे रिश्तों का इतिहास रहा है लेकिन ये संबंध पिछले कुछ दशकों से कमजोर हो रहे हैं। अमेरिकी विदेशमंत्री रेक्स टिलरसन ने कहा कि उन्हें पाकिस्तान के साथ डील करना अच्छा नहीं लगता है, इसमें उन्हें मजा नहीं आता है। टिलरसन की यह टिप्पणी ट्रंप प्रशासन के बार-बार पाक को आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी की बीच आई है। टिलरसन ने कहा कि हम पाकिस्तान से उसकी सीमाओं के भीतर आतंकवाद को उखाड़ फेंकने के लिए साथ मिलकर काम करना चाहते हैं लेकिन इसके लिए पाक को हक्कानी व अन्य आतंकी गुटों के साथ रिश्ते बदलने की प्रक्रिया शुरू करनी होगी। शीर्ष राजनयिक ने चेताया कि अमेरिका ने पाक के साथ सूचनाएं साझा की हैं लेकिन हम ऐसी स्थिति जारी नहीं रख सकते हैं जहां आतंकी संगठनों को पाक में सुरक्षित पनाहगाह के रूप में देखा जाता हो। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन द्वारा बार-बार चेताने के बावजूद आतंकी गुटों के मामले में पाक के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है। टिलरसन ने अमेरिका और पाक के बीच पिछले कुछ दशकों में खराब हो रहे रिश्तों को लेकर चिंता जताई। विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों के साथ एक बैठक में टिलरसन ने कहा कि उन्हें पाक के साथ डील करने में मजा नहीं आता है। विदेशमंत्री टिलरसन ने माना कि अमेरिका के लिए अभी भी पाक एक अहम साझेदार है लेकिन पिछले एक दशक में रिश्तों में खटास आई है। अब हमें आपसी रिश्ते को एक साझा हित की तरफ लाना होगा। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी राह तलाशनी होगी जहां क्षेत्र में शांति व स्थिरता के लिए साथ-साथ काम किया जा सके।'

आतंकवाद और परमाणु हथियारों की दौड़ के कारण सारी दुनिया परेशान व तनावग्रस्त हैं। हथियारों की दौड़ पहले से कहीं अधिक तेज हो चुकी है। एक रिपोर्ट अनुसार  'पिछले 15 साल में दुनिया भर में 100 बड़े हथियारों का व्यापार 38 प्रतिशत बढ़ा है। दुनिया भर में हथियारों का कुल जितना व्यापार हुआ, उसमें सबसे ज्यादा 57.9 प्रतिशत शेयर अमेरिका का रहा। दूसरा सबसे ज्यादा शेयर ब्रिटेन का और तीसरा रूस का रहा। भारत की भी दुनिया भर के हथियार व्यापार में 1.6 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। लिस्ट में भारत 11वें नंबर पर है। हथियार व्यापार में 2.2 प्रतिशत शेयर के साथ दक्षिण कोरिया भी टॉप-10 में है, लेकिन उत्तर कोरिया लिस्ट में नहीं है। ये सारी बातें स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की रिसर्च रिपोर्ट से सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले पांच साल में पहली बार दुनिया में हथियारों के व्यापार में इजाफा हुआ है। इससे पहले ये आंकड़े लगातार नीचे गिर रहे थे। 2016 में दुनिया में 24 लाख करोड़ के हथियार खरीदे-बेचे गए। अमेरिका में कुल 13 लाख करोड़ रुपए का हथियार व्यापार हुआ। इसमें बड़ा शेयर अमेरिका के हथियार निर्माता लॉकहीड मार्टिन का रहा। लॉकहीड ने ब्रिटेन, इटली, नॉर्वे के साथ एफ-35 की डील की थी। टैंक बनाने वाले जर्मनी के ग्रुप क्रॉस मेफई ने भी मिलिट्री वाहनों के कई सौदे किए। इन डील के दम पर ही जर्मनी का हथियार व्यापार में शेयर 1.6 प्रतिशत रहा। एसआईपीआरआई के प्रोग्राम डायरेक्टर ऑड फ्लूरेंट कहते हैं कि दुनिया भर में हथियारों का व्यापार बढ़ा है। हालांकि इससे ये नहीं कह सकते कि युद्ध की आशंका भी बढ़ी है, क्योंकि इस व्यापार में युद्ध मैटीरीयल जैसे वाहन और सुरक्षा उपकरण जैसे हेलमेट-जैकेट का व्यापार भी शामिल है। उदाहरण के लिए दक्षिण कोरिया। ये देश टॉप-10 की लिस्ट में है, लेकिन इनका ज्यादातर व्यापार अपनी सुरक्षा पर ही हुआ है, ना कि युद्ध भड़काने वाले हथियारों पर। फिर भी कुछ खतरा तो बेशक बढ़ा ही है। हालांकि चीन और उत्तर कोरिया का नाम लिस्ट में ना होने से खुद फ्लूरेंट भी हैरान हैं। वो कहते हैं- 'ये बात हमें लिस्ट तैयार करते हुए भी महसूस हुई थी, लेकिन हमारे पास जो डेटा थे उसी के आधार पर हमने नतीजे दिए। चीन की हथियार और युद्ध उपकरण निर्माता कंपनियां दुनिया की टॉप-20 में से हैं, फिर भी वो इस लिस्ट में शामिल नहीं है। इसका कारण ये भी है कि चीन अपने देश के ज्यादा आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं करता।'
हथियारों की दौड़ का मुख्य कारण राजनीतिक स्तर पर बढ़ता तनाव ही है। विश्व को बाजार मानकर विकसित देश ऐसी नीतियां बना लेते हैं जिनसे उनके आर्थिक हित सुरक्षित रहे, व राजनीतिक चौधर कायम रहे। अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों को समझ लेना चाहिए कि विश्व को जब तक बाजार समझेंगे तब तक टकराव व तनाव बढ़ेगा। जब विश्व को परिवार की तरह देखेंगे तो उनकी भूमिका भी बदल जाएगी और तनाव भी कम हो जाएगा। यह बदलाव तभी आयेगा जब अमेरिका सहित विश्व के अन्य देश विश्व को बाजार के बड़ों की तरह नहीं बल्कि परिवार के मुखिया की तरह बर्ताव करते परिवार के प्रत्येक सदस्य के हित का ख्याल रखेंगे। परिवार तोडऩे में कुछ ही समय लगता है लेकिन परिवार को बनाये रखने में बहुत कुछ बर्दाश्त करना और त्यागना पड़ता है। क्या अमेरिका अपनी भूमिका में विश्व को परिवार मानकर उसमें परिवर्तन ला सकेगा? यही अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों के आगे आज का सबसे बड़ा प्रश्न है। इस प्रश्न के गर्भ में ही विश्व का भविष्य छिपा है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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