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शिरोमणि अकाली दल की स्थिति

Publish Date: December 23 2017 01:50:41pm

1920 में स्थापित शिरोमणि अकाली दल 3 वर्ष बाद अपने 100 वर्ष पूरे करेगा। 97वें स्थापना दिवस पर अकाली दल के सर्वेसर्वा स. प्रकाश सिंह बादल तथा उनके बेटे व अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल सहित अकालियों के वरिष्ठ नेताओं ने स्थापना दिवस पर अकाली दल द्वारा दी गई कुर्बानियां और संघर्ष का गुणगान किया। तीन दशक बाद अपना 100वां स्थापना दिवस मनाने जा रहा शिरोमणि अकाली दल आज पंजाब में एक दयनीय स्थिति में है।

पंजाबी सूबा बनने के बाद शायद पहली बार अकाली दल बादल तीसरे स्थान पर है और विपक्ष का नेतृत्व आम आदमी पार्टी के हाथ है, जो पंजाब में पहली बार विधानसभा चुनावों में उतरी थी। पंजाब में कांग्रेस को सीधी टक्कर देने वाले अकाली दल की वर्तमान स्थिति के लिए उसका नेतृत्व, नीति और संगठनात्मक स्तर पर आया ठहराव ही मुख्य रूप से जिम्मेवार है। पंजाब में पिछले तीन दशक की अकाली दल बादल की राजनीति पर न•ार दौड़ायें तो पायेंगे कि अकाली दल बादल में जिस किसी ने स. प्रकाश सिंह बादल विरुद्ध आवाज बुलंद की वह किनारे कर दिया गया। यह बात टोहरा, तलवंडी से लेकर अन्य अकाली नेताओं पर भी लागू हुई। परिणामस्वरूप अकाली दल का केन्द्रबिन्दू स. प्रकाश सिंह बादल बन गये। स. प्रकाश सिंह बादल ने जहां अपने विरोधी अकाली नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया या उनके पर काटने में सफलता पाई वही वह पंजाब के गैर सिखों के साथ तालमेल बनाने में सफल रहे। भाजपा के साथ जिस तरह उन्होंने राजनीतिक रिश्ते मजबूत किए उस से उनकी छवि में निखार आया और वह पंजाब व पंजाबियत के प्रतीक के रूप में स्थापित हो गये।

उपरोक्त स्थिति का लाभ लेते हुए स. प्रकाश सिंह बादल ने 1990 के दशक में अपने बेटे सुखबीर बादल को पंजाब की राजनीति में धीरे-धीरे आगे करना शुरू किया। सुखबीर की नीतियों के परिणामस्वरूप अकाली दल बादल एक के बाद एक चुनाव जीतता चला गया। इस जीत के दौर में प्रकाश सिंह बादल ने सरकार अपने हाथ रखी तो संगठन बेटे सुखबीर के हाथ सौंप दिया। समय के साथ संगठनात्मक स्तर पर सुखबीर बादल मजबूत होते गये।

पिता की दृष्टि से देखें तो यह बदलाव स. प्रकाश सिंह बादल के लिए एक सुखद बदलाव था। प्रकाश सिंह बादल ने धीरे-धीरे सुखबीर बादल को पार्टी का सर्वेसर्वा बनाने में सफल रहे। प्रकाश सिंह बादल की जहां संगठन स्तर पर पकड़ कम•ाोर हुई वहीं जनता के साथ सम्पर्क भी कम•ाोर हो गया। एक तरह से अकाली दल बादल की बागडोर पुरानी पीढ़ी से युवा पीढ़ी के हाथ आ गई। युवा पीढ़ी का केन्द्र बिन्दू सुखबीर बादल के साथ-साथ उनके साले विक्रमजीत मजीठिया बन गये।

युवा पीढ़ी की पकड़ जैसे-जैसे मजबूत होती गई उसी के साथ अकाली दल बादल की छवि भी बदलती गई। युवा पीढ़ी ने राजनीति के साथ-साथ अपने कारोबार पर भी ध्यान दिया और परिणामस्वरूप उनकी जीवनशैली में भी बदलाव आया। कभी ग्रामीण आधार के रूप में जाना जाने वाला अकाली दल के नेता शहरी जीवनशैली अपनाने लगे। ग्रामीण क्षेत्र से अकालियों के पांव उखडऩे लगे और शहर में अकालियों की युवा पीढ़ी अपने पांव जमा नहीं सकी। परिणामस्वरूप पंजाब के नगर निकाय चुनावों के परिणाम बाद कांग्रेस एक बार फिर पंजाब में मजबूत होकर सामने आई है। इससे पहले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सफल रही थी।

अकाली दल बादल ने अब हरियाणा में इनेलो के साथ गठबंधन तोडऩे व अगामी चुनाव अकेले लडऩे का ऐलान किया है। पंजाब में जहां सिख बहुमत में हैं और अकाली दल बादल अपने को सिखों की पार्टी कहती है, वहां अपना आधार खो रही है और हरियाणा में जहां उसका आधार पहले ही सीमित है वहीं अकेले चुनाव लडऩे का ऐलान कर रही है। पंजाब और हरियाणा में अकाली दल बादल राजनीतिक रूप में कम•ाोर स्थिति में है। गुरुद्वारों पर बेशक उसकी पकड़ है लेकिन मतदाता पर पकड़ कम•ाोर होती जा रही है।

वर्तमान समय में अकाली दल नेतृत्व को आवश्यकता आत्मचिंतन कर अपना आधार मजबूत करने की है लेकिन ऐसा हो नहीं रहा, यही कारण है कि पंजाब में भाजपा से तकरार बढ़ता जा रहा है और हरियाणा में इनेलो के साथ संबंधों को तोड़ लिया है। पंजाब में भी एक वर्ग भाजपा से गठबंधन तोडऩे के लिए आये दिन मांग भी करता रहता है और ऐसा कुछ करता रहता है जिससे स. प्रकाश सिंह बादल, उनके सहयोगी भाजपा को उत्पन्न हुई स्थिति का सामना करना मुश्किल हो जाता है। पंजाब की राजनीति का दोबारा केन्द्रबिन्दू बनने के लिए अकाली दल बादल को जहां संगठनात्मक स्तर पर बदलाव लाने की आवश्यकता है वहीं पंजाबी हिन्दू प्रति अपनाई नीति के बारे भी पुन: विचार करने की आवश्यकता है। पंजाब का हिन्दू स. प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में विश्वास रखता था लेकिन सुखबीर और मजीठिया की जोड़़ी से वह एक दूरी बनाकर चल रहा है। अकालियों का युवा नेतृत्व भी शायद यही चाहता है, इसीलिए विधानसभा चुनावों तथा निकाय चुनावों में सुखबीर बादल ने शहरी मतदाता प्रति कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई।

उपरोक्त नीति के परिणाम आज सबके सामने हैं। अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल को अगर पंजाब की राजनीति में अपना स्थाई स्थान बनाना है तो उन्हें अकाली दल के भीतर जहां शक्तियों का विकेन्द्रीकरण करना होगा वहीं सबको साथ लेकर चलने की नीति भी अपनानी होगी। पंजाबी हिन्दू प्रति क्या नीति सुखबीर बादल अपनाते है, इस बात पर भी उनका व अकाली दल का भविष्य निर्भर करता है। वर्तमान दौर में केवल पंथक मुद्दों पर राजनीति करना कोई समझदारी नहीं। पंथक मुद्दों के साथ आर्थिक मुद्दों को भी उठाना होगा और समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में भलाई है। अकेले अपने बलबूते पर चुनाव जीतना आज के समय में कुछ कठिन है। पंजाब व हरियाणा में भाजपा व इनेलो को साथ लेकर चलने में ही अकाली दल बादल का हित है, उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर शिरोमणि अकाली दल वर्तमान स्थिति पर पुन: विचार करे तो बेहतर होगा।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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