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भीड़ से अलग एक आदमी अटल बिहारी वाजपेयी

Publish Date: December 25 2017 12:57:29pm

'वाजपेयी की जुबान में सरस्वती है' यह बात स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री 'पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अटल बिहारी वाजपेयी के संदर्भ में कही थी। आदर से बोलने और आदर से सुनने के अभ्यस्त वाजपेयी को ऊपर वाले ने संभवत: वह रूखाई कभी नहीं दी जो शिखर पर बैठे लोगों में होती है। शायद यही उनके जन नेता होने की वजह भी है।

अटल जी का जन्म ग्वालियर की शिंदे की छावनी में कृष्ण बिहारी वाजपेयी के घर 25 दिसम्बर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में हुआ था। जिस दिन वाजपेयी का जन्म हुआ था, उस दिन क्रिसमस का दिन था। गिरजाघर की घंटियों के बीच वाजपेयी परिवार में थाली बजी थी। धार्मिक और ज्योतिषी बाबा श्याम लाल वाजपेयी के संस्कारों, बटेश्वर मंदिर में देवी प्रार्थना और घुट्टी में मिली रामचरित मानस ने अटल बिहारी वाजपेयी को उतना ही धार्मिक बनाया जितना एक सामान्य भारतीय होता है। 

पिता ने पारिवारिक गुरू से अटल की पाटी पुजाई और फिर शुरू हुई अध्यापक पिता की अपने पुत्र को दीक्षा। गोरखी विद्यालय से मिडिल और विक्टोरिया कालीजिएट से हाई स्कूल। यह वह कॉलेज था, जहां अटल को 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्कार मिले। संघ के संस्कारों में वाजपेयी ने 'बच्चन' के बहुचर्चित गीत 'मिट्टी का तन, मिट्टी का मन, क्षणभर जीवन मेरा परिचय' के आधार पर अपनी प्रसिद्ध कविता लिखी जो उन्होंने 1942 के लखनऊ के कालीचरण हाईस्कूल में लगे शिविर में पहली बार पढ़ी थी। यह कविता थी 'हिंदू तन-मन, हिंदू जीवन, रग-रग हिंदू, मेरा परिचय।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1946 में उन्हें प्रचारक बनाकर लडुडुओं के लिए मशहूर संडीला शहर भेज दिया। वाणी की ओजस्विता के साथ कलम की तेजस्विता का समन्वय किया अटल ने पांचजन्य व 'राष्ट्रधर्म' का सम्पादन कर। अटल केवल सम्पादकीय ही नहीं लिखते थे बल्कि लखनऊ में अमीनाबाद की मारवाड़ी गली में दीनदयाल उपाध्याय के साथ राष्ट्रधर्म के बंडल भी बांधते थे।


'राष्ट्रधर्म' का प्रवेशांक अटल जी ने स्वयं निकाला था। राष्ट्रधर्म की सफलता के बाद ही दीनदयाल उपाध्याय ने साप्ताहिक 'पांचजन्य' प्रकाशित करने की जिम्मेदारी भी अटल को सौंपी। पत्रकारिता से उनका यह संबंध बाद में दैनिक 'स्वदेश', काशी से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'चेतना' और कुछ समय तक 'वीर अर्जुन' दैनिक के साथ भी रहा।

79 वर्षीय अविवाहित वाजपेयी ने अपने संसदीय जीवन की शुरूआत 1957 में की और तभी से अपनी जुबान की सरस्वती से अपनी छाप छोडऩी शुरू कर दी। एक जमाने में हिंदू राष्ट्र के प्रबल समर्थक माने जाने वाले वाजपेयी ने धीरे-धीरे नरमपंथी छवि बनायी और राष्ट्र निर्माण के कार्य में समाज के सभी वर्गो को साथ लेकर चलने वाले नेता के रूप में पहचान बनाने में सफलता हासिल की।

वाजपेयी ने 1955 में पहली बार चुनाव मैदान में कदम रखा जब विजय लक्ष्मी पंडित द्वारा खाली की गयी लखनऊ सीट के उपचुनाव में वह पराजित हो गये थे। बाद में वह इसी संसदीय क्षेत्र से जीत कर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं। उत्तर प्रदेश की बलरामपुर सीट से 1957 में पहली बार चुनाव जीतकर लोकसभा में कदम रखा। 1962 में इस चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से हार गये लेकिन 1967 में उन्होंने फिर इस सीट पर कब्जा कर लिया। उन्होंने 1972 में ग्वालियर सीट, 1977 और 1980 में नई दिल्ली, 1991, 1996 तथा 1998 में लखनऊ संसदीय सीट पर विजय हासिल की।


आपातकाल के दौरान जय प्रकाश नारायण और अन्य विपक्षी नेताओं के साथ वाजपेयी जी भी जेल गये। जब 1977 में आपात्काल समाप्त हो गया तो जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के काम में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। वाजपेयी को देश का सर्वोत्तम सम्मान भारत रत्न मिलने से पूर्व 1992 में पद्मविभूषण से अलंकृत किया गया और 1994 में उन्हें श्रेष्ठ सांसद के तौर पर गोविंद बल्लभ पंत और लोकमान्य तिलक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
     

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