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मजहब की तरह नहीं है धर्म

Publish Date: December 31 2017 01:11:34pm

इन दिनों भिन्न-भिन्न कारणों से धर्म और धार्मिकता के साथ मजहब, संस्कृति आदि को लेकर खूब चर्चा हो रही है। यह पहली बार नहीं है। आजादी के बाद जब तमाम देसी रियासतों को मिलाकर भारतीय संघ का निर्माण हुआ तब भी न सब विषयों पर खूब चर्चा हो रही थी। दुनिया के तमाम मुल्कों को इस बात पर हैरानी थी कि भाषाओं, बोलियों, संप्रदायों, जातियों, खानपान, रहन-सहन और अनेक भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद भारतवासी एकता स्थापित कर कैसे एक राष्ट्र बन गए? तब कुछ पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने तो यहां तक आशंका जाहिर की थी कि यह एकता अधिक समय तक कायम नहीं रहेगी और यह संघ 14-15 वर्षो में छिन्न-भिन्न हो जाएगा। वास्तव में इतनी विषमताओं के साथ राष्ट्रीय एकता की स्थापना का कोई अन्य ऐसा उदाहरण नहीं मिलता। चीन ने अवश्य अपना एकीकरण कर भारत से भी बड़ा देश बना लिया, किंतु वहां एकरूपता अधिक होने और विभिन्नता कम होने से एकीकरण अपेक्षाकृत आसान रहा। फिर भारत में जो कुछ हुआ वह लोकतांत्रिक ढांचे के दायरे में हुआ जो कम बड़ी बात नहीं।भारत से इतर देखें तो पड़ोसी पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा उससे अलग हो गया। बांग्लादेश निर्माण के बाद भी बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान और सिंध अपनी आजादी के लिए आवाज उठाते रहते हैं। वहीं भाषा, मजहब, खानपान, रहन-सहन की समानता होते हुए भी पश्चिम एशिया अनेक छोटे-छोटे मुस्लिम राष्ट्रों में बंटा है और हमेशा उनके बीच मारकाट जारी रहती है। पूरी दुनिया को एकता और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले यूरोप के लिए भी भारत की एकता ईष्र्या का विषय बनी रही। ईसाई बहुल यूरोप में तमाम समानताएं हैं, लेकिन वहां ईसाईयत भी उन्हें जोडऩे में नाकाम रही। प्रथम विश्व युद्ध के बाद तो यूरोप का नक्शा ही बदल गया। फिनलैंड, ऑस्टिया, चेकोस्लोवाकिया, यूगोस्लाविया, पोलैंड, हंगरी, लाटविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया जैसे नए राष्ट्रों ने जन्म लिया। इन मुल्कों का टूटना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भी नहीं रुका। इजरायल के जन्म ने फलस्तीन के लिए समस्या पैदा कर दी। 1989-92 के बीच यूगोस्लाविया के सात टुकड़े हो गए। 1991 तक सोवियत संघ भी 15 राष्ट्रों में विभाजित हो गया। रूस का हिस्सा चेचन्या आजादी के लिए अब भी संघर्ष कर रहा है। वहीं स्पेन में भी कैटालोनिया खुद को आजाद देश बनाने की मुहिम में जुटा है।
एकीकरण के इस विमर्श में सांस्कृतिक बहुलता यानी संस्कृतियों के संगम का मुद्दा भी महत्वपूर्ण हो गया है। यह अब भारत ही नहीं पश्चिमी देशों में भी देखने को मिलता है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा जैसे विकसित और समृद्ध देशों में काम की तलाश में आए लोगों और शरणार्थियों के बसने के कारण सांस्कृतिक बहुलता आई है। उनके लिए यह नया अनुभव कुछ समस्याएं भी पैदा कर रहा है, लेकिन भारत के लिए यह नया नहीं है और यहां हजारों वर्षों से विद्यमान है। विभिन्न संस्कृतियों के बीच रहकर कैसे मेल मिलाप के साथ रहा जा सकता है, यह कोई भारत से सीखे। बहुसंस्कृतिवाद के साथ भारत ने जो एकता वैदिक युग से बनाए रखी है उसका प्रमुख कारण है कि इस देश की संस्कृति की प्रमुख धारा ने सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है। भारतीय जिस धर्म को मानते है उसका संबंध नैतिक मूल्यों और आचरण से है। उनका धर्म, मजहब की तरह नहीं है। मजहब को मानने वाले लोग कुछ निश्चित चीजों पर विश्वास करते हैं। यह एक ईश्वर, उसके विशेष दूत, पैगंबर और विशेष पुस्तक हो सकती है। जो इन निश्चित चीजों को नहीं मानता, मजहब उन्हें अपने से अलग मानता है। धर्म अलग करने में नहीं, बल्कि सबको जोडऩे में विश्वास करता है। यही वजह है कि प्रबुद्ध मुस्लिम यह मानने लगे हैं कि मुस्लिम समाज को भारत में चिंता करने की कोई बात नहीं, क्योंकि देश की बहुसंख्यक हिंदू जनता हमेशा से सहिष्णु और उदार रही है। कर्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धांत, विशाल एवं श्रेष्ठ संस्कृत साहित्य, बदरीनाथ से लेकर रामेश्वरम जैसे तीर्थ और गंगा, यमुना से लेकर गोदावरी और कावेरी जैसी तमाम नदियों को पवित्र माना जाता है। ये सभी कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिसने भारत की एकता और परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखा है।
मेगस्थनीज और हृवेसांग जैसे विदेशी यात्रियों को कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक ही भारत दिखाई पड़ा था। भारत को जोडऩे में जिस धर्म और संस्कृति की भूमिका रही उसका साहित्य संस्कृत भाषा में है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, चरक और सुश्रुत का चिकित्सा विज्ञान, गणित, नक्षत्र विद्या आदि अधिकांश संस्कृत में है। भारत की एकता को मजबूत बनाने में जिन विद्वानों का उल्लेख किया जाता है उनमें कश्मीर के पंडित सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। घाटी के बाहर शरणार्थी के रूप में जो आज कश्मीरी पंडित हैं वे उन्हीं पाणिनी, पतंजलि, चरक, कालिदास, कल्हण, बिल्हण, अभिनव गुप्त, क्षेमेंद्र, मम्मटाचार्य, आनंदवर्धन और वामनाचार्य की संतान हैं जिन्होंने कश्मीर में रहकर ही संस्कृत साहित्य को समृद्ध बनाया। कल्हण द्वारा लिखे ग्रंथ राजतरंगिणी को भारत में तिहास का सर्वप्रथम ग्रंथ माना जाता है। कहा जाता है कि संस्कृत विद्वानों की भाषा रही है। यह आम जनता की बोलचाल में प्रचलित नहीं थी। इस विषय में कश्मीर अपवाद रहा है। ग्रियर्सन के अनुसार लगभग दो हजार वर्षो तक कश्मीर में संस्कृत आम जनता की बोलचाल की भाषा थी। आठवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के बीच कश्मीर के 13-14 विद्वानों ने जितना लिखा वह संपूर्ण संस्कृत साहित्य के आधे भाग से भी अधिक है। अलंकारशास्त्र, नाट्यशास्त्र, कृषि शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान, वास्तु विज्ञान और नक्षत्र विज्ञान के विकास में कश्मीरी विद्वानों का योगदान भारत में सबसे अधिक बढ़-चढ़कर था। भारत आने पर पश्चिमी विद्वानों ने संस्कृत अध्ययन के लिए जिन विद्वानों की सहायता ली उनमें कश्मीर के गोविंद कौल, नित्यानंद शास्त्री, मुकुंद राम शास्त्री, प्रो. जगधर, पं. दामोदर, सहज भट्ट और आनंद कौल प्रमुख थे। पश्चिमी विद्वानों का यह संपर्क प्रमुख रूप से 1875 और 1940 के बीच विद्यमान था।
कश्मीर में विकसित शैव धर्म आठवीं से 12वीं शताब्दी तक भारत का सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक और धार्मिक आंदोलन था। कश्मीर में विकसित सूफी मत ने भी हिंदू और मुसलमानों के बीच की खाई पाटकर भारत की एकता को और अधिक सुदृढ़ बनाया है। कश्मीर की सूफी परंपरा, स्लाम, शैव भक्ति आंदोलन ओर वेदांत का मिश्रण है। हिंदू और बौद्ध विचारधारा का भी सूफियों पर प्रभाव पड़ा। हिंदू धर्म के प्रभाव में ही सूफियों की एक नई धारा ने भारत में जन्म लिया जिसे 'ऋषि' श्रृंखला के नाम से जाना जाता है। शैव धर्म, सूफियों की ऋषि श्रृंखला तथा संस्कृत ज्ञान ने मिलकर कश्मीर में जिस कश्मीरियत को जन्म दिया है उसके अस्तित्व के बिना हिंदू संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। आजादी के समय जब भारत में दंगे हो रहे थे तब महात्मा गांधी को आशा की किरण केवल कश्मीर में दिखाई पड़ी। कुछ कश्मीरियों की हत्या होने के बावजूद घाटी में पूर्ण शांति रही। यह कश्मीर की उदारवादी परंपरा का फल था। अब वह परंपरा कहां गई?

उदय प्रकाश अरोड़ा, लेखक (दैनिक जागरण से साभार)

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