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उठो, जागो

Publish Date: January 01 2018 01:08:53pm

वर्षों पहले स्वामी विवेकानंद ने भारतीयों का आह्वान करते हुए कहा था, ''उठो, जागो! और कायरता के इस सम्मोहन से जागो, हममे΄ से कोई एक भी कमजोर नही΄ है...... ओ! आधुनिक हिन्दुओं स्वयं को इस सम्मोहन से मुक्त करो और उस मार्ग पर चलो जो हमारे पावन धर्म-ग्रंथो΄ मे΄ हमे΄ दिखाया गया है। स्वयं सीखो और सबको उनका वास्तविक स्वभाव सिखलाओ, सोई आत्माओं को जगाओ और देखो उनमे΄ कैसी जाग्रति आएगी। ऊर्जा जगेगी, गौरव जागेगा, अच्छाई आएगी, शुद्धता छाएगी और सभी सर्वोत्तम बातें हमारे मन मे΄ आ जाये΄गी जब हमारी सुप्त आत्माएं आत्म-चैतन्य होकर उद्वीप्तता को प्राप्त करे΄गी।''
''अपने पैरो΄ पर खड़े हो जाओ और सब शाश्वत गुणों को आत्मसात करो, हरेक देश की संस्कृति से सीखो। जो अपने लिए उपयोगी है उसे अपनाओ। परन्तु याद रखो हरेक हिन्दू के लिए हमारे राष्ट्रीय आदर्श के बाद ही किसी और अच्छाई का महत्व होता है।''
आज देश के बहुमत हिन्दू समाज को अपने राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेवारी को समझने की आवश्यकता है। वर्ष 2018 के आगमन पर स्वामी विवेकानंद के संदेश को सुनो और उस पर अमल करो। विशेषतया युवा वर्ग आगे आए। स्वामी विवेकानंद ने भारत के आदर्श को समझाते हुए कहा था:-''भारत का राष्ट्रीय आदर्श आत्म त्याग और सेवा है, इस आदर्श को सभी के हृदयो΄ मे΄, नसो΄ मे΄ प्रवाहित कर दो, बाकी सब कुछ अपने आप संभव हो जायेगा।''
''अपनी संकुचित मांद से बाहर निकलो, जहां-तहां चारो΄ ओर झांको, देखो अन्य देश कैसे प्रगति कर रहे है΄। क्या तुम अपने लोगो΄ से प्यार करते हो? क्या तुम अपने देश से प्यार करते हो? तो आओ और हम सब मिलकर महान् व उच्चतर उपलबि्धयों΄ के लिए संघर्ष करे΄, हम पीछे ना देखे΄ चाहे हमारा कोई अपना प्यारा पीड़ा से कराह ही रहा हो, बस आगे देखे΄, आगे बढ़े΄।''
''भारत को कम से कम अपने एक हजार युवाओं के आत्म त्याग, बलिदान की आवश्यकता है, बस व्यित और मन की, किन्तु बुद्धिजीवी अत्याचारियो΄ की नही΄। कितने व्यथित, नि:स्वार्थी, कट्टर लोग जीवन मृत्यु तक संघर्ष करने को तैयार है΄ ताकि नवोत्थान, गरीबो΄ के प्रति संवेदना, उनकी भूख शांति के लिए रोटी, जन-सामान्य के जागरण अपने पूर्वजो΄ द्वारा उत्पीडऩा के कारण पशुवत् जीवन व्यतीत करने वालों को आदमी बनाने के लिए आत्म बलिदान करने को तत्पर है΄?''
''मै΄ नयी पीढ़ी के प्रति आश्वस्त हूं उनमे΄ से आधुनिक युवक मेरे कार्यकर्ता बने΄गे, वे शेरो΄ की तरह कार्य करके सभी समस्याओं का हल खोज लेंगे। मै΄ने अपना जीवन लगाकर एक योजना की रचना की है। अगर मुझे सफलता नही΄ मिली तो मेरे बाद कोई और उच्चतम व्यकित्व इस कार्य को पूरा करेगा और मुझे उसके प्रयासो΄ से संतोष मिलेगा। लक्ष्य सबसे महान है। यह विश्व जानता है, उसने देखा है, अनुभव किया है, परन्तु अपने लोगो΄ को तो तुम कूड़ा-कचरा ही खिलाते हो! तुम्हारे यहां सदा शुद्ध जल की वर्षा होती है और उन्हे΄ तुम गढ्ढे और नाली का पानी पिलाते हो।''
केवल दूसरों की नकल कर या हां में हां मिलाकर हम महानता के शिखर पर नहीं पहुंच सकते हमें चरम शिखर पर पहुंचना है तो अपने मूल से जुड़े रहना होगा। 
स्वामी विवेकानंद भारतीयों को चरम शिखर पर पहुंचने का जो रास्ता बताते हैं वह यह है:- ''भारत!
केवल दूसरो΄ की 'हां' मे΄  'हां' मिलाकर, दूसरो΄ की इस क्षुद्र नकल के द्वारा, दूसरो΄ का मुंह ताकते रह कर .... क्या तू इसी पाथेय के सहारे, सभ्यता और महानता के चरम शिखर पर चढ़ सकेगा?
क्या तू अपनी इस लज्जास्पद कायरता के द्वारा इस स्वाधीनता को प्राप्त कर सकेगा जिसे पाने के अधिकारी केवल साहसी और वीर है΄?
''हे भारत!
मत भूल, तेरा नारीत्व का आदर्श सीता, सावित्री और दमयन्ती है।
मत भूल कि तेरे उपास्यदेव देवाधिदेव सर्वस्वत्यागी, उमापति शंकर हैं।
''मत भूल कि तेरा विवाह, तेरी धन-संपति, तेरा जीवन केवल विषय सुख के हेतु नही΄ है, केवल तेरे व्यकितगत सुखोपभोग के लिए नही΄ है।
मत भूल कि तेरी समाज-व्यवस्था उस अनन्त जगज्जननी महामाया की छायामात्र है।
''मत भूल कि नीच, अज्ञानी, दरिद्र, अपढ़, चमार, मेहतर सब तेरे रत-मांस के है΄, वे सब तेरे भाई है΄।
ओ वीर पुरुष!
''साहस बटोर, निर्भीक बन और गर्व कर कि तू भारतवासी है। गर्व से घोषणा कर कि, ''मै΄ भारतवासी हूं प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई।
''मुख से बोल, अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और पीडि़त भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी, चाण्डाल भारतवासी सभी मेरे भाई है΄। तू भी एक चिथड़े से अपने तन की लज्जा को ढक ले, और गर्वपूर्वक उच्च-स्वर से उद्घोष कर, प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है, भारतवासी मेरे प्राण है΄, भारत के देव-देवता मेरे ईश्वर है΄। भारतवर्ष का समाज, मेरे बचपन का झूला, मेरे यौवन की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी है।
मेरे भाई!
कह, भारत की मिट्टी मेरा स्वर्ग है, भारत के कल्याण मे΄ ही मेरा कल्याण है। अहोरात्र जपा कर, 'हे गौरीनाथ! हे जगदम्बे! मुझे मनुष्यत्व दो। हे शकितमयी मां मेरी दुर्बलता को हर लो, मेरी कापुरुषता को दूर भगा दो और मुझे मनुष्य बना दो मां!''
नववर्ष पर परमात्मा से यही प्रार्थना है कि हम सबको भारत के उत्थान के लिए कार्य करने की शक्ति व बल दें।
नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ


- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक,
दैनिक उत्तम हिन्दू। 
 

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