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महाराष्ट्र में जातीय हिंसा

Publish Date: January 04 2018 12:40:42pm

1818 मे भीमा-कोरेगांव में अंग्रेजों और पेशवा के बीच युद्ध हुआ था जिसमें दलितों की सहायता के साथ अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी। उस विजय की 200वीं वर्षगांठ मनाने को दलित पहली जनवरी को वहां बने दलित शहीदों के स्मारक पर इकट्ठे हुए थे और वहीं से जातीय हिंसा की शुरुआत हुई जो महाराष्ट्र के दलित बहुल्य क्षेत्रों में फैल गई। महाराष्ट्र सरकार ने दंगों को साजिश करार दिया है और दंगों की जांच कराने तथा दंगों में हुई दलित युवक की मौत की न्यायिक जांच कराने के आदेश भी दिए हैं।

गौरतलब है कि देश में 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार का गठन हुआ। पिछले छ: दशक से कांग्रेस के निशाने पर रहने वाली पार्टी आज सत्ता में है तो यह कांग्रेस सहित भाजपा के विरोधी दलों के लिए एक चुनौती तो है, साथ में परेशानी का कारण भी है। हार का सामना कर रही कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों ने सत्ता में वापसी का रास्ता ढूंढने का जो प्रयास किया उसमें जातीय संघर्ष के माध्यम से भाजपा तथा हिन्दू समाज को कमजोर करने की राह स्पष्ट दिखाई। हिन्दू समाज को उसकी जातीय व्यवस्था पर बांटने तथा विभाजित कर चुनावी रणनीति बनाने वालों की पहली सफलता जातीय संघर्ष पर ही टिकी हुई थी और आज भाजपा के विरोधी दल जिनमें कांग्रेस, बसपा तथा समाजवादी पार्टी के साथ-साथ इस्लाम व ईसाई धर्म के साथ जुड़े राजनीतिक संगठन भी हैं वह अपनी 'बांटों व राज करो' वाली नीति में सफल होते दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आरपीआई के आह्वान पर ही कार्यक्रम का आयोजन हुआ था और महाराष्ट्र बंद का आह्वान भी आरपीआई ने ही किया था।

महाराष्ट्र में जिस तरह दलित वर्ग सक्रिय हुआ है उससे स्पष्ट हो जाता है कि आरपीआई के पीछे हाथ कांग्रेस का ही है। कांग्रेस ने आजादी के तत्काल बाद सत्ता प्राप्ति के लिए जो नीति बनाई उसका आधार दलित व मुस्लिम मतदाता ही था। कांग्रेस का राजनीतिक गणित सीधा-सीधा इस पर टिका हुआ था कि हिन्दू समाज का दलित, पिछड़़े तथा गरीब व मुस्लिम मतदाता का एक वर्ग अगर स्थाई रूप से उसके साथ जुड़ जाता है तो सत्ता हमेशा कांग्रेस के हाथ ही रहेगी। धर्म, जाति तथा क्षेत्र के नाम पर राजनीति करने वालों की कठिनाई तब पैदा हो गई जब भाजपा ने कांग्रेस व उनके सहयोगियों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना शुरू किया और आज भाजपा अपने सहयोगियों सहित सत्ता में है और पिछले 3 वर्षों में देशभर में कहीं भी जातीय दंगे नहीं हुए क्योंकि मोदी सरकार का नारा था 'सब का साथ सबका विकासÓ। 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए तथा वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को चुनौती देने के लिए जातीय संघर्ष सामने आ गया है।

कांग्रेस की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के आह्वान पर ब्रिटिश साम्राज्य की जीत के जश्न में शामिल हुए दलों व नेताओं को क्षणिक राजनीतिक लाभ तो अवश्य मिलेगा लेकिन होने वाले विधानसभा चुनावों में हार अवश्य मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनावी मैदान में मात देना मुश्किल देखते हुए विपक्षी दलों ने जो जातीय संघर्ष का रास्ता अपनाया है वह दु:खदायक है। राजनीतिक लाभ हेतु देश के तान बाने को ही हिला देने का प्रयास राष्ट्रहित में नहीं है। औवेसी और आजमां खां जब बोलते हैं तो समझ लगता है कि अपनी राजनैतिक असुरक्षा की भावना को देखते हुए वह उपरोक्त खेल खेल रहे हैं।

महाराष्ट्र की मुंबई को देश की आर्थिक राजधानी के रूप में देखा जाता है। लेकिन आर्थिक पक्ष ही कमजोर पड़ गया तो इसका बुरा प्रभाव देश पर भी पड़ेगा। देश को जातीय आधार पर बांटकर राजनीति करने वाले देश के गुनाहगार ही माने जाएंगे। समय की मांग जातीय संघर्ष को दबाने की है। दलित व अल्पमत समुदाय व मुस्लिम समाज का एक वर्ग अपने क्षणिक लाभ के लिए किस हद तक समझौता कर सकते हैं यह देखकर दु:ख ही होता है। 200 वर्ष पहले जो हुआ उसको लेकर उपद्रव करना या करवाना दोनों ही अपराध हैं और अलोकतांत्रिक ही है। अतीत में जायें तो पायेंगे कि डा. अम्बेडकर को कई बार धर्म परिवर्तन कर इस्लाम व मुस्लिम धर्म अपनाने की सलाह दी गई थी लेकिन उन्होंने देशहित को प्राथमिकता देते हुए इस्लाम व इसाई धर्म को अपनाने से इंकार कर दिया था। बाबा साहेब अम्बेडकर से पूछा गया था कि हिन्दू हितों की दृष्टि से इनमें से कौन सा धर्म अपनाया जाये? मुस्लिम, ईसाई या सिख? तो उन्होंने कहा था कि खुले तौर से कहा जाये तो सिख धर्म ही सबसे उत्तम धर्म है। अस्पृश्य यदि इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकारते हैं तो वे हिन्दू धर्म की रक्षा से बाहर चले जाते हैं। इतना ही नहीं बल्कि वे हिन्दू संस्कृति से बाहर हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि वे सिख हो जाते हैं तो वे हिन्दू संस्कृति में बने रहते हैं। हिन्दुओं का यह कोई छोटा-मोटा फायदा नहीं है। अस्पृश्यों के धर्मान्तरण से मोटे तौर से देश पर क्या परिणाम होंगे यह ध्यान दिये जाने योग्य है। यदि वे इस्लाम या ईसाई धर्म में गये तो वे अराष्ट्रीय हो जायेंगे। यदि वे मुसलमान हो गये तो मुसलमानों की संख्या दुगुनी हो जाएगी। इससे मुसलमानों का वर्चस्व बढ़ेगा। वे यदि ईसाई हो गये तो ईसाईयों की संख्या पांच-छह करोड़ हो जाएगी। तब इस देश पर ब्रिटिश सत्ता का शिकंजा और कस जाएगा।

बाबा साहेब के अनुयायी होने का दावा करने वाले आज देश के हित की अनदेखी कर रहे हैं और जातीय संघर्ष की राह पर चल रहे हैं। यह उस महान नेता जिसने दु:खों और संघर्षों से भरा जीवन जीने के बावजूद देश हित को प्राथमिकता दी उसकी आत्मा को भी कष्ट ही पहुंचा रहे हैं। वर्तमान व्यवस्था में सभी के अधिकार एक समान हैं। संविधान की दृष्टि में सभी एक समान हैं फिर जाती को आधार बनाकर दंगे कराना तो असंवैधानिक ही है। प्रदेश और देश की सरकारों को देश के हित से खिलवाड़ करने वालों विरुद्ध सतर्क हो सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, जिससे यह संदेश देशभर में जाये कि देश से सर्वोच्च कोई नहीं।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।
 

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