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हुक्मरानों तक कब पहुंचेगी किसानों की आवाज

Publish Date: January 04 2018 02:36:27pm

विभिन्न मांगों का पिटारा लेकर पूरे देश से एकत्र हुए हजारों किसानों ने दिल्ली आकर केंद्र सरकार को ललकारा है। किसानों ने इस ललकार की पटकथा 6 जुलाई को मंदसौर में लिखी। मंदसौर से चला काफिला बीस प्रांतों से होकर 20-21 नवबंर को दिल्ली पहुंचा जहां किसान संसद में तब्दील हुआ। केंद्र सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बिगुल बजाकर पूरे हिंदुस्तान का भ्रमण करते हुए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति की किसान मुक्ति यात्रा का समापन दिल्ली के रामलीला में हुआ।  खेतीबाड़ी करना आज के समय में सबसे कठिन और घाटे का क्षेत्र माना जाने लगा है। किसान नोटबंदी और जीएसटी से बेहाल हो गए हैं। लोग किसानी छोड़ दूसरे धंधों में आ रहे हैं। इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखकर 187 किसान संगठनों ने एक मंच पर आकर सभी ने एक सुर में मोदी सरकार के किसान विरोधी फैसलों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। किसान मुक्ति यात्रा की अगुआई किसान नेता वीएम सिंह ने की। यात्रा के मकसद को लेकर रमेश ठाकुर ने उनसे विस्तृत बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश।   करीब पांच माह पहले मंदसौर से शुरू हुई आपकी मैराथन किसान मुक्ति यात्र का दिल्ली में समापन किया गया। मकसद क्या था?  मौजूदा केंद्र सरकार रामायण के मुख्य चरित्र रावण के कनिष्ठ भ्राता कुम्भकर्ण की तरह गहरी निद्रा में लीन है। किसान यात्र का मकसद कुम्भकाय नींद से जगाना है। आजादी के बाद देश का अब तक का सबसे बड़ा किसान आंदोलन कहा जाएगा। हमारी यात्रा करीब बीस प्रांतों से होकर दिल्ली पहुंची। इस मुहिम में देश के कोने-कोने से आए किसानों ने सरकार को ललकारा है। अभी भी वक्त है सुधर जाओ। देश का अन्नदाता इस वक्त सबसे ज्यादा कठिन दौर से गुजर रहा है पर किसी को कोई परवाह नहीं? आंदोलन के जरिए पूरे भारत के किसानों को एक मैसेज देना था कि मौजूदा केंद्र सरकार पूंजीपतियों की है न कि किसानों और गरीबों की? देश का किसान किस कदर हताश-परेशान है, इसका अंदाजा भी नरेंद्र मोदी और उनके कृषि मंत्री नहीं लगा सकते। 

जिस देश की जनसख्या का सत्तर फीसदी हिस्सा किसान आबादी से लबरेज हो और वही परेशान हो, इससे बड़ी विडंबना भला क्या होगी। मोदी ने किसानों से लच्छेदार बातें और लालच के बल पर बेवकूफ बनाकर सत्ता हासिल की थी। ऐसे व्यक्ति को समाज कभी बर्दाश्त नहीं करेगा। हमने केंद्र सरकार की पोल-पट्टी देश के लोगों सामने खोल दी है। किसान यात्र के दौरान हमनेे देश के किसानों के अलावा आम जनता को सिर्फ यही बताने की कोशिश है कि 2०19 में झांसे में मत आना। आपने प्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके फैसलों को किसान व जनविरोधी कहा हैै लेकिन केंद्र सरकार आपके आरोपों को सिरे से नकार रही है?

देखिए, सुशासन एक लोकप्रवर्धित अवधारणा है और समुचित न्याय जनता को मिले, इसकी उम्मीद सरकारों से होती है पर इस मोर्च पर मौजूदा सरकार पूरी तरह विफल है। किसानों- गरीबों की बुनियादी आवश्यकता से इस सरकार का काई लेना-देना नहीं। आर्थिक आयामों के आधार पर युक्त व्यवस्थाओं को समुचित रूप देना हो या सुशासनिक माहौल, सभी क्षेत्रों में इस सरकार ने कुछ नहीं किया है। नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। नोटबंदी और जीएसटी की आड़ में देश के किसान लुट चुके हैं। आर्थिक मोर्चे पर मूडीज की रिपोर्ट सरकार का गुणगान करती है। उनकी रिपोर्ट को हम कूड़ेदान में डालते हैं। सही आंकड़ों की तस्वीर हमारे पास हैं। 

सदियों से भारत का आर्थिक जीवन मूल्य किसानी पर निर्भर रहा है। उसकी रीढ़ किसान रहे हैं। लेकिन इस सरकार ने उसी कमर को तोड़ दिया है। किसानों की समस्याएं कोई नहीं सुन रहा है। देश के किसान कर्ज के बोझ से दबे हैं। किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहे हैं। उनकी समस्याओं पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है। मीडिया ने भी अब किसानों की समस्याओं को उजागर करना बंद कर दिया है।

सरकार से आपकी मुख्य मांगें क्या हैं? प्रत्येक फसलें की लागत पर डेढ़ गुना कीमत देने का तुरंत कानून बनें। संसद के शीतकालीन सत्र में फसलों के मूल गारंटी बिल को पारित किया जाए। इसके अलावा सहकारी, गैर सहकारी आदि हर प्रकार का फसली कर्ज माफ किया जाए। 2014 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी 309 चुनावी सभाओं में किसानों से कर्ज माफ और समर्थन मूल्य पर दो गुना भाव बढ़ाने का वायदा किया था। जो अब हवाई साबित हो रहा है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सूबे के किसानों का पुराना कर्ज माफ करने वादा किया था जिसे बाद में मजाक बना दिया। किसी किसान को माफी के रूप में दस रूपए तो किसी को पचास रूपए का चेक वितरित किया गया। किसानों की मौजूदा ललकार पूर्व में किए झूठे वायदों पर चेतावनी है, मसलन अभी भी वक्त है सुधर जाओ नहीं तो 2019 में जनता सबक सिखा देगी। 

क्या आपको लगता है सरकार किसानों की मांगों पर विचार करेगी? 
देश के किसानों ने सरकार को टेलर दिखा दिया है। जरूरत पडऩे पर पिक्चर भी दिखा देंगे। हमने किसान और खेती को बचाने का प्रण ले लिया है। आंदोलन से जुड़े सभी किसानों को उम्मीद है उनकी ये लड़ाई अपने अंजाम तक पहुंचेगी। देश का किसान एक हो गया है। किसान अब जुमलों की राजनीति में नहीं उलझेंगे। जात बिरादरी भूलकर किसानों की सामूहिक बिरादरी एकत्र हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस समय गन्ने की कटाई हो रही है और खेतों में गेहूं की बुआई की जा रही है। बावजूद इसके किसानों ने दिल्ली कूच किया। यह दृश्य बदलते परिदृश्य की गवाही देने के लिए काफी है। अगर सरकार ने किसानों की मांगों पर गौर नहीं किया तो उसकी अर्थी निकलने में समय नहीं लगेगा। पूरा देश इस बात को मानता है कि मोदी ने उनसे झूठ बोलकर सत्ता हासिल की है। कहावत है,, काठ की हांडी एक बार ही चूल्हे पर चढ़ती है।

लेखक सुभाष आनंद
     

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