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कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित होंगे तीन तिलंगे

Publish Date: January 06 2018 12:36:16pm

इस बार का गुजरात का विधानसभा चुनाव जहां कांग्रेस के अस्तित्व का प्रश्न था तो भाजपा की अस्मिता का प्रश्न भी था। दोनों दलों का भविष्य और साख राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में दांव पर लगी थी। गुजरात का महारण केवल दो राजनैतिक दलों का साधारण रूप से लड़ा जाने वाला युद्ध ही नहीं था बल्कि यह दोनों दलों के चाणक्य कहे जाने वाले खांटी राजनीतिज्ञों की नाक का सवाल भी था जिसमें एक ओर भाजपा के चाणक्य अमित शाह थे तो दूसरी ओर सोनिया गांधी के घोषित और राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक सलाहकार कांग्रेस के चाणक्य अहमद पटेल थे। 

दोनों चाणक्य मूल रूप से गुजरात के हैं इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि किसी एक को स्थानीय होने का लाभ मिल सकता था किन्तु कुल मिला कर स्थानीय परिस्थितियों के चलते कांग्रेस इस नाते सुखद स्थिति में थी क्योंकि 22 वर्ष के लगातार शासन के चलते भाजपा के प्रति 'इन्कम्बैंसी फैक्टर' काम कर रहा था और कुछ अतिवादी हिन्दुओं ने गो हत्या के नाम पर भाजपा की कट्टर मुस्लिम विरोधी छवि बना दी थी। यही एकमात्र भाजपा का नकारात्मक बिंदु था। दोनों चाणक्य आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए नरेंद्र मोदी के गुजरात से हटते ही अपनी अपनी चक्रव्यूह बनाने की कूट संरचनाओं में जुट गये थे। 

अपनी आदत के अनुसार कांग्रेस जाति विभाजन की रणनीति पर काम कर रही थी। उसने आरक्षण के मुद्दे को लेकर लड़ रहे युवा हार्दिक पटेल को संरक्षण देकर जहां भाजपा को सांसत में डाले रखा, वहीं भाजपा के कोर वोट को भी एकबारगी छिन्नभिन्न करने में सफलता प्राप्त कर ली थी। यही नहीं, उसने पिछड़ा वर्ग के अल्पेश ठाकोर को भी जो वस्तुत: कांग्रेस मूल का ही था, अपने से अलग कर एक पिछड़े वर्ग के अराजनैतिक नेता के रूप में उभरने में भरपूर सहायता दी और उसके माध्यम से भाजपा को परेशानियों से जूझते रहने को विवश किया। 

अपनी राष्ट्रीय रणनीति के चलते उसने दलितों को भाजपा से अलग करने की नीति के तहत जिग्नेश मेवाड़ी को हर संभव सहायता देकर उभारा, स्थापित किया और इन तीनों के माध्यम से अपनी पूर्व 'खाम' नीति को परवान चढ़ाने के दृष्टिकोण से गुजरात की 'मोदी विहीन सरकार' की नाक में दम किये रखने की नीति में काफी सफलता प्राप्त कर चुकी थी। इस नीति के अनुसरण के चलते पिछले बीस सालों में गुजरात के हिन्दुओं में भाजपा द्वारा लाई गई एकता की भावना और एकजुटता को कांग्रेस एक हद तक ध्वस्त करने में सफल रही और यह भाजपा के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी कि वह किस तरह फिर से हिन्दुओं को जातिवाद से निकाल कर एकजुट करें या कम से कम हानि के स्तर तक ले आएं। कांग्रेस अपनी सत्ता लोलुपता के चलते 2019 के चुनावों में अपनी विजय सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से बिना इस बात का ध्यान रखे कि मोदी देश के सर्वोच्च पद पर बैठे एक ऐसे नेता हैं जो विश्वपटल पर एक प्रखर नेता के रूप में उभर रहे हैं और जिनके साथ राष्ट्र की अस्मिता जुड़ी हुई है, की छवि को धूमिल करने के दृष्टिकोण से एक ओर तो राहुल से यह कहलाती रही कि प्रधानमन्त्री को कोई अपशब्द न कहे और दूसरी ओर उसके प्रवक्ता और राष्ट्रीय नेता मोदी को झूठा, मक्कार, शातिर, फेंकू, रंगा-बिल्ला, समाज तोड़क, छुपा भ्रष्ट, मुस्लिम विरोधी, दलित विरोधी और नीच तक कहते रहे। यह हद दर्जे की स्तरहीन नीति थी। 

एक ओर तो राहुल की आस्थावान हिन्दू की छवि सामने लाई जा रही थी, वहीं उत्तर भारत से दर्जनों मौलानाओं को पार्टी के छदम प्रवक्ता के रूप में गुजरात के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में गुपचुप कांग्रेसी प्रचार पर लगा दिया गया था। जो मुस्लिमों में मोदी और बीजेपी को मुस्लिम विरोधी बता कर कांग्रेस के पक्ष में अधिक से अधिक मतदान करने के चुपके चुपके फतवे जारी कर रहे थे। वह उनके बीच उन घटनाओं का अतिरंजित प्रसार कर रहे थे जिनमें उत्तर भारत में मुस्लिम गो तस्करों के साथ दुव्र्यवहार किया गया था। हालांकि गुजरात में मुस्लिम वोट अधिक नहीं हैं, केवल 9 प्रतिशत ही हैं किन्तु कई विधानसभा सीटों पर वे निर्णायक स्थिति रखते हैं जिसका लाभ लेने के लिए इन मौलानाओं को बुलाया गया था। ये अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के रोग से ग्रसित मौलाना गुजरात में कभी टीवी पर नहीं आए बल्कि अपने आपको इन मुहल्लों में ही छिपाए रहे। यह क्या सिद्ध नहीं करता कि ये लोग गुप्त मिशन पर गुजरात में थे। इसके अतिरिक्त भी कांग्रेस ने हर स्थान पर नकारात्मक राजनीति का सहारा लेकर वोट साधने का प्रयास किया जिसमें वह कई जगह सफल भी हुई। 

इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि अमितशाह जो भी निर्वाचन लड़ते हैं, पूर्ण समर्पण भाव से लड़ते हैं और केवल जीत का लक्ष्य लेकर लड़ते हैं इसीलिए अपने नेतृत्व में उन्होंने बारह निर्वाचन भाजपा के पक्ष में करके दिखाए हैं। गुजरात का निर्वाचन भी शाह ने उसी भावना से लड़ा। माइक्रो बूथ मैनेजमेंट से लेकर वह हर दांव अमित शाह ने चला जो भाजपा को जीत दिला सकता था इसमें कांटे की टक्कर की सीटों पर निर्दलीयों को उतारना भी था ताकि विरोधी वोट कटें और फिर अंत में भाजपा के ब्रह्मास्त्र मोदी जी को स्वयं मैदान में उतार कर अमित शाह ने भाजपा की जीत सुनिश्चित कर दी। अपनी इस कार्य योजना पर चलकर अमित शाह कांग्रेस की जातिवादी राजनीति जो खाम के अनुसरण में चली गयी थी और इन्हीं तीन नौजवान जातिवादी नेताओं के बल पर कांग्रेस ने भाजपा की चूलें हिला कर रख दी थीं, पर विजय पाने में सफल हो पाए। जहाँ तक इन तीन नौजवानों जो अत्यंत महत्त्वाकांक्षी हैं, का प्रश्न है, हार्दिक ने तो अपनी कम उम्र के कारण चुनाव लड़ा ही नहीं किन्तु कांग्रेस को इस पूरे चुनाव में अपने आगे घुटनों पर खड़े रहने को विवश रखा। अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाड़ी जिन्होंने अपने लिए सीटें छोडऩे के लिए कांग्रेस को बुरी तरह प्रताडि़त किया था, निर्दलीय रूप में चुनाव जीते हैं। इन तीनों ने 2019 के चुनाव के लिए अपनी महत्त्वाकांक्षाओं का खुलकर प्रदर्शन करना प्रारम्भ कर दिया है। हालांकि चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी ने 24 घंटे बाद ही सही, जनता और कार्यकर्ताओं का आभार जो प्रकट किया था, उसमें उन्होंने इस आभार प्रदर्शन में इन तीनों का न तो नाम लिया और न आभार जताया बाद में भले ही कुछ कहते रहें। यह सिद्ध कर रहा है कि अंदर खाने सब कुछ ठीक नहीं है। 

इधर अल्पेश और जिग्नेश दोनों ने हार्दिक के साथ एक मंच बना कर अगला चुनाव लडऩे के संकेत दे दिए हैं। कहीं यह कांग्रेस से बगावत की भूमिका तो नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो यह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं है। इन लोगों ने अपने प्रभाव क्षेत्र से कांग्रेस को जो वोट दिलाए हैं, उन्हीं के बल पर कांग्रेस अपना वोट प्रतिशत इतना बढ़ा सकी है। अगर अगले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष इनकी सुरसा सी मांगों की प्रतिपूर्ति नहीं कर पाए तो निश्चित रूप से ये युवक कांग्रेस को अपूरणीय क्षति पहुंचाएंगे। अगर ऐसा होता है तो शिवभक्त राहुल के लिए ये तीनों नवयुवक वही 'भस्मासुर' साबित हो सकते हैं जो भगवान शंकर के साथ हुआ था। जीत के मद में चूर ये दोनों नेता हार्दिक का सहारा लेकर निश्चित रूप से एक बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं, इसका ध्यान अभी से कांग्रेस को रखना पड़ेगा। राह भाजपा की भी अब पहले सी आसान नहीं रहेगी, यह भी इन तीनों नौजवानों ने बता दिया है। कुल मिलाकर देश का अगला चुनाव दिलचस्प होगा यह विनिश्चित हो चुका है।  

लेखक - राज सक्सेना

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