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विकास और सुरक्षा के नाम पर विनाश

Publish Date: January 09 2018 12:43:18pm

धरती पर कयामत का काउंटडाउन शुरू हो गया है। ये कहना है प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफर हॉकिंग का। उन्होंने हाल में कहा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग, जैनेटिकली इंजीनयिर्ड वायरस और न्यूक्लियर वॉर के कारण पृथ्वी के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। विज्ञान की प्रगति के नकारात्मक पक्ष पर हम आंखें मूंदे हैं। यह खतरे की घंटी है। हमें सचेत होना है, आने वाली पीढिय़ों के भविष्य के लिए अभी से कदम उठाने होंगे। विकास की आपाधापी और सुरक्षा की चिंता में हमने अपने विनाश के ही हथियार जमा कर लिए हैं। 

हॉलीवुड की फिल्में ही नहीं, असल जिंदगी में भी जैनेटिकली इंजीनियर्ड वायरस का प्रकोप हम देख चुके हैं। इबोला वायरस के कारण हम अफ्रीका में मौत का तांडव देख चुके हैं। वर्ष 2014-15 में इबोला वायरस के फैलाव के दौर में इसे बड़ी मुश्किल से महामारी बनने से रोका जा सका था लेकिन फिर भी इसके कारण हजारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। जैनेटिकली इंजीनियर्ड वायरस इससे भी ज्यादा तबाही फैला सकता है। कई देश अपनी सुरक्षा के नाम पर ऐसे जैविक हथियार जमा करने में जुटे हैं जिनमें इस प्रकार के घातक वायरस का इस्तेमाल हो सकता है। हम आए दिन नए- नए वायरसों के बारे में सुनते-पढ़ते आए हैं। हाल में स्किन कैंसर के इलाज के लिए टी-वेक थेरेपी की खोज की गई है। इसके अनुसार शरीर की प्रतिरोध क्षमता को ही विकसित कर कैंसर से लड़ा जाता है लेकिन हॉकिंग इस बारे में सचेत करते हैं कि इस तरीके में काफी जोखिम भी है क्योंकि जीन को मॉडीफाई करने के दुष्प्रभावों के बारे में अभी वैज्ञानिक खोज अधिक विकसित नहीं हुई है। आशंका है कि ऐसे वायरस का तोड़ किसी एंटी बायोटिक के पास ही न हो। 

दुनिया परमाणु बम की त्रसदी को देख चुकी है। जापान ने इसे झेला है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से परमाणु हथियारों को बनाने के साथ तबाही का जखीरा जमा करने की होड़ मच गई। कई देशों ने अपनी सुरक्षा के नाम पर परमाणु हथियारों को जमा करना शुरू कर दिया। यहां तक कि परमाणु बम का आविष्कार करने वाले रॉबर्ट ओपनहाइमर ने कहा था मैं अब मौत बन चुका हूं, दुनिया को तबाह करने वाला। इसके बावजूद एटमी हथियारों की दौड़ खत्म नहीं हुई। तत्कालीन सोवियत संघ ने वर्ष 1949 में अपने पहले परमाणु बम का परीक्षण किया। इसके जवाब में एक कदम आगे बढ़ कर वर्ष 1952 में अमरीका ने अपने पहले हाइड्रोजन बम का परीक्षण कर डाला। ये बम तो परमाणु बम से कई गुना ज्यादा विनाशकारी है। शीतयुद्ध के दौरान परमाणु युद्ध की आशंका सियासी कारणों से उत्पन्न हुई। यह हमारे अस्तित्व के लिए अच्छी बात है कि परमाणु हथियार संपन्न तत्कालीन सोवियत संघ और अमरीका ने कभी इसका इस्तेमाल नहीं किया लेकिन अब समसामयिक विश्व में उत्तर कोरिया और पाकिस्तान जैसे कुछ परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं जिनके बारे में आशंकाएं हमेशा रहती हैं। उत्तर कोरिया के तानाशाह और पाकिस्तान की अस्थिर राजनीति इन आशंकाओं को हवा देती रहती है। इस सबके बीच सीरिया के बारे में भी आशंका है कि उसने भी परमाणु क्षमता हासिल करने के लिए जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया है। 

केवल परमाणु हथियार नहीं, परमाणु संयंत्र भी तबाही का कारण बन जाते हैं। ग्रीनपीस इंटरनेशनल के अनुसार वर्ष 1986 में चेर्नोबिल हादसे और वर्ष 2004 में बेलारूस में परमाणु संयंत्र में हुए हादसे से लगभग दो लाख लोगों की मौत हुई थी। वर्तमान में भी लाखों लोग विकिरण के कारण असाध्य रोग झेल रहे हैं। वर्ष 2011 में जापान के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना के कारण लगभग 1.60 लाख लोग विस्थापित हुए थे। कहा जाता है कि फुकुशिमा के आसपास का क्षेत्र अगले दो दशक तक मानवीय बसावट के लिए अनुकूल नहीं रहेगा। ज्ञात हो कि फुकुशिमा से लगभग छह माह तक विकिरण रिसाव होता रहा था। 

स्टीफन हॉकिंग ने वर्ष 2007 में लियोनार्डो डिकैपरियो की डॉक्यूमेंट्री में चिंता जताई थी कि 'हम नहीं जानते कि ग्लोबल वॉर्मिंग कब खत्म होगी।' उन्होंने कहा था कि यदि समय रहते सुधार के उपाय नहीं किए गए तो वो दिन दूर नहीं जब धरती शुक्र ग्रह के समान हो जाएगी जहां तापमान 250 डिग्री सेल्सियस हो जाता है और एसिड की बारिश होती है। संकेत साफ है, औद्योगिक क्रांति के बाद से धरती का औसत तापमान 0.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। हमने विकास के लिए कोयले और पेट्रोलियम का जम कर उपयोग किया है। इससे कार्बन डाईऑक्साइड और ग्रीन हाउस प्रभाव पैदा करने वाली कई गैसों का उत्सर्जन हुआ। इससे धरती का प्राकृतिक संतुलन डिग गया है। ओजोन परत को नुकसान पहुंचा। सबसे पहले हमारी कृषि इससे प्रभावित हुई है। मौसम चक्र में आए बदलाव से खेतों की पैदावार प्रभावित हुई है। विश्व के विभिन्न हिस्सों में ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवीय दखलअंदाजी के कारण ही अलनीनो का प्रभाव मौसम चक्र पर पड़ रहा है। इसका सीधा संबंध ग्लोबल वार्मिंग से है। 

स्टीफन हॉकिंग की आशंकाओं पर ध्यान देने की जरूरत है। जैनेटिक इंजीनियरिंग को निजी कंपनियों के बोर्ड रूम में बैठ कर सात-आठ व्यक्ति निर्धारित कर रहे हैं। इस पर समाज का कोई नियंत्रण नहीं है। यही कारण है कि उससे वायरस बनेगा या कुछ और चीज निकलेगी, किसी को कुछ भी मालूम नहीं है। दुनिया में कई वायरस फैल रहे हैं। उनमें अनेक वायरस जैनेटिकली इंजीनियर्ड हैं। जैनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग मानव पर होने लगा है। इसकी सूचनाएं भी बहुत कम लोगों तक पहुंच पा रही हैं। जैनिटकली इंजीनियर्ड फसलों पर भी कोई चर्चा नहीं हो रही है। सरकारें भी जैनेटिकल मोडिफाइड फसलों को लाने के लिए पिछले दरवाजे का इस्तेमाल कर रही हैं। इन पर पहले समाज में स्वच्छ खुली बहस हो, चर्चा हो, उसके बाद जनता यह निर्णय करे कि उसके लिए क्या सही है और क्या गलत है लेकिन दुर्भाग्य से यह सब चीजें जनता के हाथ से निकल चुकी हैं। अब कॉर्पोरेट के हाथ में आ गई हैं। इस पर जी-20 और जी-8 जैसे समूह संज्ञान लें। दुनिया को इस रास्ते से बचाने के लिए देखें कि क्या हमारे अनुकूल है और क्या नहीं। 

फ्रांस के डॉ.सिरालिनी की एक रिपोर्ट आई जिसमें बताया कि जैनेटिकली मोडिफाइड फूड जानवरों को लंबे समय तक खिलाया जाए तो इसका क्या असर होता है। इस रिपोर्ट को दूसरे दिन ही वेबसाइट से हटा लिया गया। इसका मतलब है कि कुछ छुपाया जा रहा है। अपनी पहले की रिपोर्ट में इन्होंने बताया कि चूहों को दो साल तक जैनेटिकली मोडिफाइड फूड खिलाया जाए तो उनके शरीर पर इतने भयंकर ट्यूमर हो जाते हैं कि उनको देख कर भी डर लगता है। चूहे के दो साल मानव के 70-80 साल के बराबर माने जाते हैं। चूहों पर 90 दिन का प्रयोग किया जाता है। जो कि मानव के 20 साल के बराबर माना जाता है। इस पर मांग की जा रही है कि इन पर पूरे दो साल का प्रयोग हो जिससे पता चल सके कि मानव के पूरे जीवन में क्या होगा।  

लेखक- नरेन्द्र देवांगन

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