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राष्ट्रीय शर्म का विषय

Publish Date: January 12 2018 01:22:51pm

विभिन्न टीवी चैनलों पर चर्चा करते हुए दिल्ली में जनवरी 2018 के पहले छह दिनों में सर्दी से ठिठुरते हुए जान गंवा कर दुनिया से चले गए 44 लोगों की चर्चा है। इससे पूर्व भी दिसंबर-नवंबर में दिल्ली में और देश के दूसरे भागों में भी बहुत से अभागे तीखी ठंड के कारण यूं कहि अपनी छत, पर्याप्त कपड़े और पेट भर रोटी न होने के कारण कहीं सड़कों पर पड़े-पड़े मर गए। सवाल केवल सर्दी का नहीं, सर्दी में खुले आकाश के नीचे तभी सोना पड़ा जब उनके पास अपना घर नहीं,  घर के नाम पर कच्ची छत भी नहीं। अगर उनके सिर पर एक छत होती तो उन्हें मौत के मुंह में न जाना पड़ता। न जाने तुलसीदास जी का दिया हुआ वह आदर्श वाक्य कहां चला गया, मुखिया मुख सो चाहिए, खान-पान को एक। जब देश के मुखिया कहे जाने वाले और स्वयं को मुखिया नेता, मंत्री, जनप्रतिनिधि मानने वाले लोग गर्म बिस्तरों में मशीनों से गर्म कमरों में गर्मा-गर्म भोजन का आनंद लेने के बाद भी सिकुड़ते हुए सोते हैं, तो उसी समय इन जनप्रतिनिधियों की जनता किसी आधे अधूरे रैनबसेरे में, किसी फुटपाथ पर, किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर या कहीं वृक्ष के नीचे रात काटने और हड््िडयां काटती सर्दी सहने के लिए विवश होती हैं। बहुत दुख हुआ यह देखकर कि दिल्ली में 44 लोगों की मौत को दिल्ली सरकार का दिवालियापन, अयोग्यता आदि विशेषणों के साथ वर्णन करते हुए देश की राष्ट्रीय पार्टियों के कुछ नेता टीवी चैनलों पर गर्म कॉफी पीते हुए चर्चा कर रहे थे। यहां दो प्रश्न पैदा होते हैं पहले तो यह कि क्या पूरे देश में लोग सर्दी के कारण मर रहे हैं और अगर गरीब सर्दी न सहते हुए मौत के मुंह में चला जाता है तो देश प्रदेश की सरकारें, समाजसेवी संस्थाएं, बड़े-बड़े धार्मिक संस्थानों के प्रतिनिधि क्या करते हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि दिल्ली कोई आम शहर नहीं हिंदुस्तान की संसद के दोनों सदनों के 700 से ज्यादा सांसद दिल्ली के बड़े-बड़े बंगलों में रहते हैं। भारत सरकार के सभी विभाग दिल्ली के दिल में ही अपने लिए जगह बनाकर बैठे हैं। दिल्ली सरकार के साठ विधायक पूरी सरकार और पूरे संसाधनों समेत इसी छोटे से प्रदेश में हैं। दिल्ली में ही तीन नगर निगम हैं। इन नगर निगमों के सदस्यों की भारी भरकम संख्या भी यहीं बसती है। अगर यह सब लोग मिलकर अपने-अपने क्षेत्र में बेघर, गरीब लोगों के लिए सर्दी के दिनों में आग के अलाव का प्रबंध करें, टेंट लगाएं और लंगर लगाने के लिए प्रसिद्ध बड़ी-बड़ी संस्थाएं यहां सर्दियों की ठंडी रातों को गर्म चाय से थोड़ी गर्मी दे दें तो निश्चित ही ये लोग विकासशील भारत के लोग, मंगल ग्रह तक पहुंचने की तैयारी कर चुके भारत के लोग भूखे नंगे सड़कों पर ही न मिट्टी हो जाते। छोटी-छोटी बातों को राष्ट्रीय शर्म कहने वाले नेता न जाने क्यों खामोश, न जाने किन विशालकाय भवनों में बंद न जाने क्यों देश की जमीनी सच्चाई से दूर खामोश हैं। केवल वक्तव्य देते हैं। केवल टीवी चैनलों द्वारा इन बेचारों के लिए संवेदना कम और सम्बद्ध सरकारों की आलोचना ज्यादा करते हैं। 
हिंदुस्तान के बहुत से गरीब लोग गर्मी न सहते हुए भी परलोक सिधार जाते हैं और सर्दी की भीषणता भी उन्हें मौत के मुंह में धकेल देती है। यह ठीक है कि देश की सरकार से यह आशा रखी जाती है वे इन लोगों का प्रबंध करे, पर जो रोज चर्चा सुनने को मिलती है, विश्व के बड़े-बड़े अमीर हिंदुस्तान में रहते हैं, क्रिकेट का एक-एक खिलाड़ी करोड़ों में बिकता है, कोई कबड््डी  मुकाबले करवाने वाले किसी अभिनेत्री या अभिनेता की अदाओं पर मुग्ध होकर ही करोड़ों रुपये राजकोष से लुटा देते हैं। यह सारा रुपया आखिर तो देश की संपत्ति है। क्यों नहीं पहले करोड़ों में बिकने वालों से, करोड़ों के बंगलों में रहने वालों से, विवाह आदि उत्सवों पर करोड़ों रुपये उड़ाने वालों से देश यह मांग करता कि पहले कुछ उनके लिए भी करो जिनके तन पर वस्त्र नहीं, पेट में रोटी नहीं और इतने बेघरे हैं कि गर्मी सर्दी कोई भी उन्हें मौत दे सकती है। 
पूरा हिंदुस्तान धार्मिक देश है। कन्याकुमारी से लेकर हिमालय की ऊंची चोटियों तक पूजा, आस्था के केंद्र हैं। यह अलग बात है कि कौन किस संप्रदाय से सम्बंध रखता है, कौन निराकारी है, कौन साकार की साधना करता है। यह तो निश्चित है कि बड़े-बड़े विशाल भवन, अकूत संपदा, धन-धान्य के स्वामी यह पूजा स्थान हैं। पूरे हिंदुस्तान में ऐसे लाखों बड़े-बड़े भवन हैं जिनमें शायद एक वर्ष में एक 50 दिन ही आयोजन होते होंगे। ऐसे भी धार्मिक स्थल हैं जहां एक ही समय सैकड़ों नहीं, हजारों लोग आश्रय प्राप्त कर सकते हैं, गर्मी-सर्दी और भूख से बच सकते हैं। जब यह सब अपने देश में है तो फिर लोग अभावग्रस्त होकर ही नहीं, अपितु छत और रोटी के लिए तड़पते हुए केवल मृृत्यु की गोद में ही त्राण पा सकें तो फिर हमें धार्मिक देश कहलवाने का भी क्या अधिकार रह जाता है। संसार के सामने जब ये आंकड़े जाएंगे कि विश्व की बड़ी शक्ति भारत में सब साधन रहते हुए भी बीस करोड़ लोग रात को भूखे सोते हैं, करोड़ों लोग कुपोषण का शिकार हैं, हजारों लोग हर वर्ष गर्मी और सर्दी से तड़पते हुए तिल-तिल कर मौत के आगोश में ही आश्रय लेते हैं तो हम किस मुंह से विश्व के समक्ष अपनी उन्नति एवं प्रगति की बात कह सकेंगे। आश्चर्य है कि देश के विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के अधिकतर नेता दूसरों की मीन-मेख निकालने में ही लगे रहते हैं। अगर दिल्ली में लोग भूख और ठंड से मर गए तो इसके लिए केवल दिल्ली सरकार को दोषी ठहराना काफी नहीं। यद्यपि पहली प्रत्यक्ष जिम्मेवारी उन्हीं की है, शेष नेता और विरोधी पार्टियों के प्रतिनिधि क्या यही देखते रहेंगे कि जितनी ज्यादा सर्दी से मौतें होंगी उतना ही उन्हें विरोधी पार्टियों की आलोचना करने का अवसर मिलता रहेगा। पंजाबी की एक पुरानी कहावत है, किसे दी धी मरी, किसे दे करम जागे राजनीति में भी आज यही हालत है। अगर किसी राज्य में कोई अभागी दुर्घटना हो जाए तब वहां मदद के लिए हाथ बंटाने को विरोधी पार्टियां आगे नहीं आतीं, अपितु यह मानते हैं कि आलोचना के लिए एक उपयुक्त अवसर प्राप्त हो गया। याद रखना होगा अगर ऐसी दुर्घटनाएं राष्ट्रीय शर्म का विषय हैं तो हम सभी राष्ट्रवासी इसके लिए शर्मसार हैं और हमें राजनीतिक मतभेद से ऊपर उठकर ऐसा काम करना चाहिए जिससे देश शर्मिंदा न हो और देशवासी संकट ग्रस्त न रहें। 

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प्रो. लक्ष्मीकांता चावला, लेखिका पंजाब की पूर्व केबिनेट मंत्री एवं भाजपा की वरिष्ठ नेत्री हैं।

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