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स्वामी विवेकानंद का सन्देश

Publish Date: January 12 2018 01:25:54pm

भारत एक बार फिर राजनीतिक, आर्थिक परिवर्तन के साथ-साथ वैचारिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। भारत आज विश्व मंच पर अपनी पहचान बनाने में सफल हो रहा है। भारत के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए भारत विरोधी शक्तियां सक्रिय हैं। भारत विरोधी शक्तियां जहां विदेशी मंचों पर भारत विरुद्ध बोल तथा कार्य कर रही हैं, वहीं भारत की भीतर की कमजोर कड़ी पर दबाव बनाकर उसे तोडऩे का प्रयास भी कर रही हैं। भारत की सबसे कमजोर कड़ी जातिवाद पर आधारित समाज तथा देश की राजनीति है। जहां हम सब के सुखी और निरोगी होने की कामना करते हैं, वहीं अपने ही देशवासियों व भाई बन्धुओं विरुद्ध जहर उगलते हैं। उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं और उनसे नफरत करते हैं। जब हिन्दू धर्म सभी में उस परमात्मा के अंश के रूप में आत्मा को देखता है तो फिर यह भेदभाव और नफरत क्यों?
पिछले दिनों देश में एक बार फिर जातिवाद के कारण नफरत की आग जलाने की कोशिश की गई। महाराष्ट्र से उठी इस नफरत की आग को देश के अन्य हिस्सों में भी लगाने का प्रयास किया गया, लेकिन असफल रहा। आग बेशक समाप्त हो गई है लेकिन धूआं तो अभी भी निकल रहा है और जातिवाद पर आधारित यह नफरत की आग कब फिर धू-धू कर जलने लगे इस बारे अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। हां अगर यह नफरत की आग पुन: धधकती है तो जहां हमारे पूर्वज रोयेंगे वहीं हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य भी धूमिल हो जाएगा।
भारत व भारतीयों के विकास तथा उज्जवल भविष्य को सम्मुख रख वर्षों पहले स्वामी विवेकानंद ने हम भारतीयों को यह संदेश दिया था 'मुझे विशेष दु:ख इस बात पर होता है कि वर्तमान समय में भी जातियों के बीच में इतना मतभेद चलता रहता है। इसका अन्त हो जाना चाहिए। यह दोनों ही पक्षों के लिए व्यर्थ है, खासकर ब्राह्मणों के लिए, क्योंकि इस तरह के एकाधिकार और विशेष दावों के दिन अब चले गए। हर एक अभिजात वर्ग का कर्तव्य है कि अपने कुलीन तंत्र की कब्र वह आप ही खोदे, और जितना शीघ्र इसे कर सके, उतना ही अच्छा है। जितनी ही वह देर करेगा, उतनी ही वह सड़ेगी और उसकी मृत्यु भी उतनी ही भयंकर होगी। अत: यह ब्राह्मण जाति का कर्तव्य है कि भारत की दूसरी सब जातियों के उद्धार की चेष्टा करे। यदि वह ऐसा करती है और जब तक ऐसा करती है, तभी तक वह ब्राह्मण है, और अगर वह धन के चक्कर में पड़ी रहती है, तो वह ब्राह्मण नहीं है।..... आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमी भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने से कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ है, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं। समझ लो कि दूसरे देवी-देवता सो रहे हैं। जिन व्यर्थ के देवी-देवताओं को हम देख नहीं पाते, उनके पीछे तो हम बेकार दौड़ें और जिस विराट देवता को हम अपने चारों ओर देख रहे हैं, उसकी पूजा ही न करें? जब हम इस प्रत्यक्ष देवता की पूजा कर लेंगे, तभी हम दूसरे देव-देवियों की पूजा करने योग्य होंगे, अन्यथा नहीं। आध मील चलने की हममें शक्ति ही नहीं और हम हनुमान जी की तरह एक ही छलांग में समुद्र पार करने की इच्छा करें, ऐसा नहीं हो सकता। जिसे देखों, वही योगी बनने की धुन में है, जिसे देखो, वही समाधि लगाने जा रहा है। ऐसा नहीं होने का। दिन भर तो दुनिया के सैकड़ों प्रपंचों में लिप्त रहोगे, कर्मकांड में व्यस्त रहोगे और श्याम को आंख मूंदकर, नाक दबाकर सांस चढ़ाओ-उतारोगे, क्या योग की सिद्धि और समाधि को इतना सहज समझ रखा है कि ऋषि लोग, तुम्हारे तीन बार नाक फडफ़ड़ाने और सांस चढ़ाने से हवा में मिलकर तुम्हारे पेट में घुस जाएंगे? क्या इसे तुमने कोई हंसी-मजाक मान लिया है? ये सब विचार वाहियात हैं। जिसे ग्रहण करने या अपनाने की आवश्यकता है, वह है चित्तशुद्धि और उसकी प्राप्ति कैसे होती है? इसका उत्तर यह है कि सबसे पहले उस विराट की पूजा करो, जिसे तुम अपने चारों ओर देख रहे हो-उसकी पूजा करो। वर्शिप ही इस संस्कृत शब्द का ठीक समानार्थक है, अंग्रेजी के किसी अन्य शब्द से काम नहीं चलेगा। ये मनुष्य और पशु, जिन्हें हम आस-पास और आगे-पीछे देख रहे हैं, ये ही हमारे ईश्वर हैं। इनमें सबसे पहले पूज्य हैं, हमारे अपने देशवासी। परस्पर ईष्र्या-द्वेष करने और झगडऩे के बजाय हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। यह अत्यन्त भयावह कर्म है, जिसके लिए हम क्लेश झेल रहे हैं। फिर भी हमारी आंखें नहीं खुलतीं।'
स्वामी विवेकानंद ने वर्षों पहले अपने देशवासियों को ईश्वर रूप मानकर देश को पूजने का जो संदेश दिया था वह आज भी सार्थक है। देश है तो हम, अगर भारत कम•ाोर होता है तो हम कैसे मजबूत हो सकेंगे, इस बात पर विचार कर कर्म करने की आवश्यकता है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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