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शिक्षा का स्तर

Publish Date: January 20 2018 12:30:49pm

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा 14 से 18 वर्ष के छात्रों के बीच शिक्षा के स्तर को लेकर कराये गये सर्वेक्षण में जो तथ्य सामने आये हैं वह इस प्रकार हैं 'लगभग 60 प्रतिशत ग्रामीण युवाओं ने कभी कंप्यूटर या इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं किया, 57 प्रतिशत एक साधारण सा गणितीय भाग करने में असमर्थ हैं, 40 प्रतिशत को घंटे और मिनट में समय बता पाने में परेशानी होती है और 14 प्रतिशत के करीब पैमाने का प्रयोग करके सही से लंबाई भी नहीं माप सकते। योग्यता के साधारण से परीक्षण में केवल 54 प्रतिशत ही खाने के पैकेट पर लिखे चार निर्देशों में से तीन ही पढ़ पाए। उसकी कीमत पर छूट देने के बाद केवल 38 प्रतिशत ही नया मूल्य बता पाए। वहीं, केवल 18 प्रतिशत युवा ही कर्ज चुकाने के प्रश्न को हल कर पाए। हालांकि इसमें भी दो तरह के युवाओं में एक बड़ा अंतर देखने को मिला। एक, जिन्होंने आठ वर्ष या उससे अधिक समय तक शिक्षा ग्रहण की और जिन्होंने इससे कम शिक्षा प्राप्त की। अर्थात, इसमें शिक्षा के अधिकार ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पहले समूह में से 46 प्रतिशत गणितीय भाग को हल करने में समर्थ थे तो वहीं, दूसरे समूह में से केवल 29 प्रतिशत। इसी तरह, पहले समूह में से 63 प्रतिशत एक छोटा वाक्य सही तरीके से पढऩे में समर्थ थे तो वहीं, दूसरे समूह में से केवल 36 प्रतिशत। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में लगभग 12 करोड़ युवा 14-18 वर्ष की उम्र के हैं। यह सर्वेक्षण 24 राज्यों के 26 ग्रामीण जिलों में 28,000 से अधिक युवाओं पर कराया गया था। एएसईआर सर्वे का यह 13वां वर्ष था, जो देश में शिक्षा के स्तर की जमीनी हकीकत से रूबरू कराता है। लेकिन इस सर्वे में पहली बार बच्चों के बजाय 14-18 वर्ष के युवाओं पर यह सर्वे कराया गया। प्रथम संस्था की मुख्य कार्याधिकारी रुक्मणी बनर्जी कहती हैं शिक्षा का अधिकार कानून 2009 में लाया गया था और आठ वर्ष बाद 2017 में पहली बार ऐसी स्थिति आई है जब इस कानून के तहत दाखिला लिए छात्रों ने आठवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली। हमें लगता है कि यह उनकी क्षमताओं और आकांक्षाओं को परखने का एक बेहतर अवसर था। शिक्षा के लिए जिला सूचना केंद्र से मिले आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट बताती है कि कक्षा 8 पास करने वाले विद्यार्थियों की संख्या 2004 के 1.1 करोड़ से बढ़कर 2014 में दोगुनी (2.2 करोड़) हो गई। रिपोर्ट ने सभी पैमानों को 4 क्षेत्रों में बांट दिया था, गतिविधि, क्षमता, जागरूकता और आकांक्षाएं। इनमें मूल रूप से नामांकन, गणितीय गणनाएं करना, पढ़ाई की क्षमता, कम्प्यूटर का प्रयोग, महत्वाकाक्षाएं आदि शामिल हैं। सर्वे में शामिल 74 प्रतिशत युवाओं का बैंक खाता है। 51 प्रतिशत इन खातों का उपयोग रुपया जमा कराने और निकालने में करते हैं। 15 प्रतिशत एटीएम का इस्तेमाल करते थे तो वहीं 5 प्रतिशत से भी कम इंटरनेट बैंकिंग का प्रयोग करते हैं।  कम साक्षरता दर वाले मध्य भारत के जिलों में काफी कम संख्या में युवा रुपये गिनने और वजन जोडऩे में समर्थ थे।'

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि 14 से 18 वर्ष के अधिकतर छात्रों का स्तर काफी कमजोर है। यह वो छात्र हैं जिन पर भारत का आने वाला कल निर्भर है। देश का भविष्य यही छात्र हैं। भारत एक युवा देश है लेकिन भारत के अधिकतर छात्रों का शिक्षा स्तर इतना कमजोर है तो फिर भारत का भविष्य मजबूत कैसे होगा।

बच्चों को शिक्षित क्यों करते हैं, इसको लेकर बुद्धिजीवी एवं शिक्षाविद् जे. कृष्णमूर्ति कहते हैं 'बच्चे को हम इसलिए शिक्षित करते हैं कि वह आंतरिक रूप से समृद्ध हो सके। इसका परिणाम यह होगा कि वह अपनी संपत्ति को भी सही मूल्य देगा। आंतरिक समृद्धि के बिना सांसारिक वस्तुएं अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं और इससे तमाम तरह के विनाश एवं कष्ट पैदा होते हैं। बच्चे को शिक्षा हम इसलिए देते हैं कि वह अपनी उचित वृत्ति खोज सके तथा उन व्यवसायों से बच सके जो व्यक्ति और व्यक्ति के बीच बैर का कारण बनते हैं। हम बच्चों को शिक्षा इसलिए देते हैं कि वे आत्मज्ञान की ओर बढ़ें, जिसके बिना न तो शांति संभव है और न आनंद। शिक्षा आत्म-तुष्टीकरण के लिए नहीं, बल्कि आत्मपरित्याग के लिए होती है। सही शिक्षा के अभाव में भ्रम को वास्तविकता समझ लिया जाता है और तब व्यक्ति आंतरिक रूप से सदा द्वंद्व में रहता है। इसी से दूसरों के साथ यानी समाज के साथ संघर्ष जारी रहता है। हम इसलिए शिक्षा का पेशा अपनाते हैं क्योंकि हमें यह सा$फ दिखलाई देता है कि संगठित धर्मों के सिद्धांतों या कर्मकांडों से नहीं बल्कि आत्मज्ञान से ही मन शांत होता है, और वह सृजन, सत्य, ईश्वर केवल तभी प्रकट होता है जब 'मैं' और 'मेरा' का अंत हो जाता है।'
शिक्षा लक्ष्य केवल धन कमाना नहीं बल्कि व्यक्ति का विकास है। लेकिन जो तथ्य सामने आये हैं उससे लगता है कि शिक्षा के नाम पर खानापूर्ति ही हो रही है। ऐसी शिक्षा से व्यक्ति विकास की बात तो दूर व्यक्ति के लिए दो वक्त की रोटी कमाना भी मुश्किल होगा। शिक्षा जगत से जुड़े सभी संगठनों व लोगों को उपरोक्त आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन लाकर छात्रों का आधार मजबूत करना चाहिए। मजबूत आधार ही उज्जवल भविष्य दे सकेगा।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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