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हमारा संविधान

Publish Date: January 27 2018 12:40:58pm

भारतीय संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है-हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का संकल्प करके तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने हेतु बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवम्बर, 1949 ई. को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्म समर्पित करते हैं। • संविधान द्वारा भारत को लोकतांत्रिक राज्य घोषित किया गया है। लोकतंत्रात्मक शब्द का तात्पर्य ऐसी सरकार के निर्माण से है, जिसमें सभी अधिकार जनता में ही निहित हैं। इस व्यवस्था के अन्तर्गत सभी नागरिकों को एकसमान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं और जिनका प्रयोग वे स्वनिर्वाचित प्रतिनिधियों के निर्वाचन में कर सकते हैं। इस प्रकार लोकतांत्रिक राज्य जनता के लिए तथा जनता द्वारा ही स्थापित किया जाता है। प्रभुत्व सम्पन्नता का शाब्दिक अर्थ है पूर्णरूपेण स्वतंत्र अर्थात् बाह्य एवं आन्तरिक मामलों में किसी विदेशी सत्ता के अधीन न होकर पूर्ण रूप से स्वतंत्र होना। प्रभुत्व सम्पन्न देश स्वयं अपनी बाह्य एवं आन्तरिक नीतियों का निर्धारण करते हैं। भारत जब ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब उसे सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र नहीं कहा जा सकता था, तब उसे विदेशी शासन के अन्तर्गत काम करना पड़ता था, लेकिन जब देश 1947 में स्वतंत्र हुआ तो 1950 में संविधान लागू किया गया। इस प्रकार देश अब किसी बाह्य शक्ति के नियंत्रण में नहीं है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत एक प्रभुत्व सम्पन्न देश है। • पंथ निरपेक्ष राज्य का मतलब ऐसे राज्य से है जिसका कोई अपना विशेष धर्म नहीं होता है, वे सभी धर्मों को एकसमान रूप से यानि सभी धर्मों के साथ एक जैसा व्यवहार करने का बल देता है। उसकी नजरों में सभी धर्म समान हैं, यद्यपि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेखित विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता से ही पंथ निरपेक्ष राज्य की बात स्पष्ट होती थी, परन्तु 42वें संविधान संशोधन ने इसे और स्पष्ट कर दिया है। • समाजवादी शब्द को 1976 में 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़ा गया है, यदि समानता हम केवल राजनीतिक स्तर तक ही रखेंगे, तो इसे सम्पूर्ण आदर्श नहीं कहा जा सकता है, इसलिए समानता के आदर्श को सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में भी उतारना होगा। यद्यपि प्रस्तावना में प्रयुक्त शब्द आर्थिक न्यास से भी समाजवाद की पुष्टि होती थी तथापि समाजवाद शब्द को इसमें जोड़कर इसे और अधिक स्पष्ट कर दिया गया है। • 1976 में 42वें संविधान संशोधन के द्वारा संविधान में अखण्डता शब्द को जोड़ा गया है, इसका उद्देश्य अलगाववादी शक्तियों को उभरने से रोकना है। इस प्रकार हर परिस्थितियों में देश की एकता तथा अखण्डता को बनाये रखना है। • गणराज्य शब्द का शाब्दिक अर्थ यह है कि देश किसी राज्य के अधीन नहीं है। गणराज्य का मतलब ऐसा राज्य नहीं का शासनाध्यक्ष वंशानुगत न होकर जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित  होता है। नागरिकों के प्रतिनिधि के रूप में भारत का राष्ट्राध्यक्ष कार्य करता है। इस प्रकार भारत को गणराज्य कहा जाता है। • भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बन्धुता आदि कई महत्वपूर्ण आदर्शों को उल्लेखित किया गया है। स्वतंत्रता से अभिप्राय मात्र विचारों की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता की बात भी की गई है। न्याय से अभिप्राय समाज में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक प्रजातंत्र स्थापित करना है।
सदियों की गुलामी के बाद पाई स्वतंत्रता को स्थाई बनाने हेतु ही हमारे पूर्वजों ने एक संविधान के तहत लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था। संविधान की सफलता को लेकर संविधान के निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि यह उन लोगों पर निर्भर होगी जो यहां संसद में आएंगे।
देश की आजादी के सात दशक बाद स्थिति यह है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में स्पष्ट बहुुमत के साथ भाजपा व उसके सहयोगी दलों की जो सरकार सत्ता में आई है, उसका विरोध केवल विरोध करने के लिए किया जा रहा है। संविधानिक ढंग से चुनी सरकार का जब क्षेत्र और जाति को आधार बनाकर विरोध होता है तो यह भारत के जनमत को अस्वीकार करना ही है जो कि लोकतांत्रिक दृष्टि से गलत है। लोकतंत्र में विपक्षी की महत्वपूर्ण भूमिका है क्योंकि सरकार पर नजर रखने का कार्य सीधे-सीधे विपक्ष ही करता है। लेकिन जब विपक्ष ही देश के जन के भीतर भ्रम और भ्रांतियां पैदा करने लगे तो फिर व्यवस्था पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है। इसी तरह सत्ता पक्ष का भी यह कर्तव्य है कि वह विपक्ष की भावनाओं का सम्मान करें, क्योंकि विपक्ष में जो है वह भी जनप्रतिनिधि ही है।
भारतीय लोकतंत्र का आज का कमजोर पक्ष यह है कि पक्ष और विपक्ष जन भावनाओं की एक सीमा के बाद अनदेखी कर रहे हैं। इसी कारण समाज में तनाव बढ़ रहा है। समाज की संविधान के प्रति आस्था पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहा है। संविधान में अगर नागरिक को कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं तो उसके साथ देश व समाज प्रति कर्तव्य भी बताए हैं। आज की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम अधिकारों का लाभ तो लेना चाहते हैं लेकिन कर्तव्यों के प्रति उदासीन है। इस कारण व्यवस्था दबाव में आ रही है।
समय की मांग है कि हम अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति भी जागरूक रहें। भारत आज विश्व के विकसित देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा है और विश्व में नई भूमिका निभाने की तैयारी में है तो इसका श्रेय यहां के जागरूक नागरिकों को ही जाता है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि देश में हिंसा और अराजकता बढ़ती जा रही है। जिस संविधान ने हमें सबकुछ दिया है, उसी के प्रति उदासीन हो रहे हैं, यह चिंता का विषय है संविधान के प्रति आस्था ही हमारी आजादी का आधार है। इसलिए आज के इस पावन दिवस पर देश के संविधान और व्यवस्था के प्रति आस्था को बनाए रखने का संकल्प लेते हुए एक नए भारत के निर्माण के लिए प्रयत्नशील हों ताकि हमारी भावी पीढिय़ों को एक मजबूत लोकतांत्रिक आधार दे सके और वह विश्व की चुनौतियों का मजबूती के साथ सामना कर सकें।
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ। 


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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