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अंतर-धर्म विवाह पर विवाद नहीं, संवाद होना चाहिए

Publish Date: January 28 2018 01:56:18pm

हाल के दिनों में अंतर-धर्म विवाह व धर्म-परिवर्तन जैसी घटनाओं के परिपेक्ष्य में किए गए शोर तथा सांप्रदायिक तनाव के चलते यह जरूरी हो जाता है कि इस मामले पर आम बहस की जाए और ऐसा रास्ता अपनाया जाए कि समाज में धार्मिक-कटुता और असहिष्णुता न बढ़े। यह प्रश्न बार-बार उठता है कि धर्म-परिवर्तन की आवश्यकता क्यों पड़ती है जबकि दो व्यक्ति शादी के पवित्र बंधन में बंधने के लिए स्वेच्छा से निर्णय लेते हैं?ऐसे ढेरों मामले हैं जहां विभिन्न धर्मों के लोगों ने एक दूसरे को अपना जीवन साथी चुना। ऐसे लोगों में अनेक सामाजिक-राजनीतिक शख्सियतें, सिने-कलाकार और सामुदायिक नेता शामिल हैं।
इन सामुदायिक नेताओं और ऐसे अन्य लोगों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह के मौके का इस्तेमाल दो समुदायों के लोगों के जज्बातों को अपने निजी हितों को साधने के लिए न हो जिसके कारण इन दोनों में सांप्रदायिक दुर्भावना बढऩे की आशंका हो। एक हल के तौर पर ऐसे लोगों को अपने विवाह को पंजीकृत करवाने के लिए सिविल कोर्ट का आश्रय लेना चाहिए तथा धार्मिक-आयोजनों में हिस्सा लेना चाहिए। विगत दिनों पटना उच्च न्यायालय के एक वकील साहब मेरे से मिलने मेरे घर पर आए। आजकल अंतरपांथिक, अंतरधार्मिक विवाह पर बड़ी चर्चा हो रही है।
इत्तफाकन मैंने उनसे पूछ लिया कि विवाह संबंधों में धर्म परिवर्तन कराना कानूनन बाध्यता है क्या? वकील साहब ने सिरे से खारिज कर दिया। चंूकि वे मुसलमान ही थे, इसलिए थोड़ी खुलकर चर्चा होने लगी। मैंने पूछा यदि कोई मुस्लिम लड़की हिन्दू या अन्य धर्म के लड़के के साथ शादी करना चाहती हो तो उसे अपना धर्म बदलना पड़ेगा या फिर उस लड़के को अपना धर्म बदलना पड़ेगा कि दोनों अपनी-अपनी मान्यताओं के साथ वैवाहिक जीवन जी सकते हैं?
वकील साहब ने कहा कि कानून में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है लेकिन समाज इसकी इजाजत नहीं देता। हिन्दू हो या मुसलमान, मान्यताओं को तो बदलना ही पड़ता है। बदलना लड़की को होता है क्योंकि हमारे समाज में लड़कियों को लड़के वाले के यहां रहना होता है। लड़के के परिवार का वह अंग हो जाती है इसलिए देर-सबेर लड़कियों को अपनी मान्यताओं को छोडऩा ही पड़ेगा, इसलिए बढिय़ा यही होता है कि शादी के समय से मान्यता बदल ली जाए नहीं तो समस्याएं होती है और वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है। 
परंतु मैं वकील साहब की बातों से सहमत नहीं हूं। यदि मान्यताएं बदलना जरूरी है तो फिर विवाह संबंध धोखा है। कानून में इसकी कोई जगह नहीं है तो हमें एक बार विचार करना चाहिए कि दोनों अपनी-अपनी मान्यताओं के साथ जिएं या फिर दोनों मिलकर संयुक्त मान्यता विकसित कर ले।भारतीय इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं। मुसलमान और हिन्दू दो मान्यताओं का समाज है। दोनों को किसी कीमत पर मिलाया नहीं जा सकता है लेकिन भारतीय समाज में दोनों एक दूसरे के पूरक बनकर उभरे हैं। यहां तक कि पूजा पद्धति पर भी इसका प्रभाव पड़ा है।
अभी-अभी एक और मामला मेरे सामने से गुजरा। उत्तर प्रदेश की एक हिन्दू लड़की किसी मुसलमान लड़के के साथ शादी करना चाह रही थी। हालांकि उसके माता-पिता सहमत नहीं थे लेकिन लड़की पीछे हटने के पक्ष में नहीं थी। चुनांचे दोनों ने तय किया कि वे न तो हिन्दू धर्म के तहत शादी करेंगे न ही मुस्लिम मान्यताओं के साथ शादी करेंगे। शादी न्यायालय में पंजीकृत होगी।
याद रहे जब शादी किसी मान्यताओं के साथ होती है तो हमारे देश में उस मान्यता के कानून भी हावी होते हैं। यदि न्यायालय में शादी पंजीकृत होती है तो फिर देश के कानून के तहत सारे मामले तय होते हैं। अब संसद भवन में तलाक पर कानून पास किया जा रहा है लेकिन इसे प्रभावी होने में एक-दो साल लगेंगे।
अभी तक तो तीन तलाक कह देने मात्र से मुस्लिम समाज में विवाह विच्छेद हो जाता है। यदि न्यायालय में विवाह का पंजीकरण करा दिया जाए तो इस प्रकार की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है। सो उस लड़की ने चतुराई की और अपनी शादी का पंजीकरण न्यायालय में करवा लिया। हालांकि लड़का इस पक्ष में नहीं था लेकिन लड़की के दबाव के आगे लड़के को झुकना पड़ा।
मेरा मानना है कि जब शादी हो तो पुरूष और स्त्री आपस में प्रेम के साथ अपनी-अपनी मान्यताओं को लेकर जिएं। दोनों ऐसा कर सकते हैं। यदि एकल परिवार है तो इसकी बड़ी गुंजाइश है लेकिन संयुक्त परिवार में थोड़ी दिक्कत होगी लेकिन वहां भी प्रयास करें तो मान्यताओं को बचाकर रखा जा सकता है। अब सवाल उठता है कि बच्चों की मान्यता क्या होगी?
इसका भी समाधान है। बच्चों को दोनों ही मान्यताओं की जानकारी दी जाए। बड़े होने पर बच्चे जिन मान्यताओं को अपनाना चाहेंगे, अपना लेंगे। इस प्रकार समाज में कटुता का वातावरण उत्पन्न नहीं होगा। कुल मिलाकर प्रेम विवाह में विवाद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। समाज के नेता और समझदार लोगों को अंतरधार्मिक विवाहों का उपयोग आपसी कटुता मिटाने के लिए करना चाहिए।
इससे समाज में एक नए प्रकार की संस्कृति उत्पन्न होगी। ऐसा नहीं है कि अन्य मान्यताओं में अच्छी बात नहीं होती है। प्रत्येक मान्यताओं में कुछ न कुछ अच्छाई जरूर होती है। इसे अपना लेना चाहिए और समाज को एक सूत्र में बांधने के लिए ऐसे मौके और संबंधों का उपयोग करना चाहिए। 

लेखक हसन जमालपुरी
 

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