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हिन्दू-मुसलमान संबंध

Publish Date: January 30 2018 12:57:44pm

दक्षिण अफ्रीका में भारतीय मूल के लोगों के अधिकारों की रक्षा हेतु महात्मा गांधी 1909 में लंदन गये थे। वहां पर गांधी जी का कई स्वराज प्रेमी भारतीय युवकों से संवाद हुआ था। भारत लौटते हुए उन्होंने लंदन में युवा भारतीयों व अन्य से हुए संवाद को एक काल्पनिक संवाद के रूप में 'हिन्द स्वराज' पुस्तक में दिया। इस पुस्तक में गांधी जी हिन्दू-मुसलमान संबंधों के बारे क्या सोचते थे आप सम्मुख रख रहा हूं-

प्रश्न: मुसलमानों के आने से हमारा एक राष्ट्र रहा या मिटा?
उत्तर: हिन्दुस्तान में चाहे जिस धर्म के आदमी रह सकते हैं, उससे वह एक राष्ट्र मिटने वाला नहीं है। जो नए लोग उसमें दाखिल होते हैं, वे उसकी प्रजा को तोड़ नहीं सकते, वे उसकी प्रजा में घुल-मिल जाते हैं। ऐसा हो, तभी कोई मुल्क एक-राष्ट्र माना जाएगा। ऐसे मुल्क में दूसरे लोगों का समावेश करने का गुण होना चाहिए। हिन्दुस्तान ऐसा था और आज भी है। यों तो जितने आदमी उतने धर्म ऐसा मान सकते हैं। एक राष्ट्र होकर रहने वाले लोग एक-दूसरे के धर्म में दखल नहीं देते, अगर देते हैं तो समझना चाहिए कि वे एक राष्ट्र होने लायक नहीं है। अगर हिन्दू माने कि सारा हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुओं से भरा होना चाहिए, तो यह एक निरा सपना है। मुसलमान अगर ऐसा मानें कि उसमें सिर्फ मुसलमान ही रहें, तो उसे भी सपना ही समझिए। फिर भी हिन्दू, मुसलमान, पारसी, ईसाई, जो इस देश को अपना वतन मानकर बस चुके हैं, एक देशी, एक मुल्की हैं, वे देशी भाई हैं, और उन्हें एक-दूसरे के स्वार्थ के लिए भी एक होकर रहना पड़ेगा। दुनिया के किसी भी हिस्से में एक राष्ट्र का अर्थ एक धर्म नहीं किया गया, हिन्दुस्तान में तो ऐसा था ही नहीं। 

प्रश्न: लेकिन दोनों कौमों के कट्टर बैर का क्या?
उत्तर: 'कट्टर बैर' शब्द दोनों के दुश्मन ने खोज निकाला है। जब हिन्दू-मुसलमान झगड़ते थे तब वे ऐसी बातें भी करते थे। झगड़ा तो हमारा सबका बंद हो गया है। फिर कट्टर बैर काहे का? और इतना याद रखिए कि अंग्रेजों के आने के बाद ही हमारा झगड़ा बंद हुआ, ऐसा नहीं है। हिन्दू लोग मुसलमान बादशाहों के मातहत और मुसलमान हिन्दू राजाओं के मातहत रहते आए हैं। दोनों को बाद में समझ में आ गया कि झगडऩे से कोई फायदा नहीं, लड़ाई से दोनों, अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे और कोई अपनी जिद भी नहीं छोड़ेंगे। इसलिए दोनों ने मिलकर रहने का फैसला किया। झगड़े तो फिर से अंग्रेजों ने शुरू करवाए। मियां और महादेव की नहीं बनती। इस कहावत को भी ऐसा ही समझिए। कुछ कहावतें हमेशा के लिए रह जाती हैं और नुकसान करती ही रहती है। हम कहावत की धुन में इतना भी याद नहीं रखते कि बहुतेरे हिन्दुओं और मुसलमानों के बाप-दादे एक ही थे, हमारे अंदर एक ही खून है। क्या धर्म बदला। इसलिए हम आपस में दुश्मन बन गए? धर्म तो एक ही जगह पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हम दोनों अलग-अलग रास्ते लें, इससे क्या हो गया? उसमें लड़ाई काहे की? और ऐसी कहावतें तो शैवों और वैष्णवों में भी चलती हैं, पर इससे कोई यह नहीं कहेगा कि वे एक राष्ट्र नहीं है। वेदधर्मियों और जैनों के बीच बहुत फर्क माना जाता है, फिर भी इससे वे अलग राष्ट्र नहीं बन जाते। हम गुलाम हो गए हैं, इसीलिए अपने झगड़े हम तीसरे के पास ले जाते हैं। जैसे मुसलमान मूर्ति खंडन करने वाले हैं, वैसे हिन्दुओं में भी मूर्ति का खंडन करने वाला एक वर्ग देखने में आता है। ज्यों-ज्यों सही ज्ञान बढ़ेगा, त्यों-त्यों हम समझते जाएंगे कि हमें पसंद न आने वाला धर्म दूसरा आदमी पालता हो, तो भी उससे बैरभाव रखना हमारे लिए ठीक नहीं, हम उस पर जबरदस्ती न करें।
गांधी के उपरोक्त विचार समय की कसौटी पर असफल रहे हैं। आज केवल भारत ही नहीं विश्वभर के लोग इस्लाम के कट्टरपंथियों की नीतियों से परेशान ही नहीं दु:खी है। इस्लामिक देशों में स्थिति तो बद से बदतर होती चली जा रही है। जिन देशों में मुस्लिम अल्पमत में हैं वहां शांतिपूर्वक रह रहे हैं और संविधान द्वारा दिए अधिकारों का इस्तेमाल कर शांतमय और सुखपूर्वक रह रहे हैं। अब वहां भी कट्टरपंथी हिंसात्मक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। गांधी जी ने शायद कुरान का वह भाग नहीं पढ़ा होगा जिसमें हिन्दू क्या दूसरे किसी भी धर्म में आस्था रखने वाले का या तो धर्म परिवर्तन की बात कही गयी या फिर जजिया लेने की अगर दोनों में से कोई भी बात स्वीकार करने को व्यक्ति इंकार करता है तो उसकी हत्या करने का भी आदेश है।
धर्म के नाम पर भारत का विभाजन हुआ, भारत में तो इस्लाम में विश्वास रखने वालों की संख्या करोड़ों में बढ़ गई, जबकि इस्लामिक देशों विशेषतया पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं की संख्या करोड़ों में कम हो गई हैं।
गांधी का इस्लाम के बारे जो नजरिया था वह उस समय भी गलत था और आज भी। गांधी जी को लगता था कि वह मुस्लिम समाज की सोच में बदलाव लाने में सफल रहेंगे लेकिन हुआ उलट। देश का विभाजन हुआ और आजादी के सात दशक बाद भी हिन्दू-मुस्लिम के संबंधों में कोई बड़ा सकारात्मक बदलाव दिखाई नहीं देता। गांधी ने हिन्दू-मुसलमान के संबंधो को जितना अधिक सामान्य बनाने की कोशिश की जिन्ना उतना ही अंदरगति से महात्मा की सोच को काटता चला गया। अविश्वास की जो दीवार आजादी से पहले थी वह आज पहले से भी अधिक मजबूत हो चुकी है और देश में ही नहीं दुनियाभर में आज जेहाद के नाम पर, इस्लाम के नाम पर कट्टरपंथी निर्दोषों का खून बहा रहे हैं। गांधी की हत्या का मूल कारण गांधी जी की मुस्लिमों प्रति सोच ही कहा जा सकता है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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