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युवाओं की उम्मीद को नई उड़ान चाहिए

Publish Date: January 30 2018 01:01:01pm

महात्मा गांधी ने भारत के स्वाधीनता संघर्ष मेें  जिस गरिमामय भूमिका का निर्वाह किया, वह सर्वविदित है। उनके नेतृत्व में चला अहिंसक आंदोलन पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन चुका है। लेकिन, उनका चिंतन-मनन भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य की प्राप्ति के तौर-तरीकों तक सीमित नहीं था। आजादी मिलने के बाद भारत में सरकार की रीति-नीति तथा लोगों का आचार-विचार, व्यवहार कैसा हो, इसके संबंध में उन्होंने अपने विचार बहुत स्पष्ट रखे थे।

स्वाधीन भारत में शासन के स्वरूप, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के आचरण और नागरिक दृष्टिकोण के संंबंध में महात्मा गांधी के विचार विश्व के अनेक दार्शनिकों तथा नीति-निर्देशकों से मिलते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक गेटे का यह मत था कि सबसे अच्छा शासन वही है, जो आत्मशासन की शिक्षा दे। एक प्रख्यात पश्चिमी समाजशास्त्री थोरो ने भी कहा था कि जो सबसे कम शासन करे, वही सबसे उत्तम सरकार है। महात्मा गांधी के विचार भी इन विख्यात दर्शनशास्त्रियों से मिलते थे। वे भी व्यक्ति के आत्म-शासन और राज्य सत्ता के न्यूनतम शासन के पक्ष में थे।

गांधी जी का यह मानना था कि 'मेरी दृष्टि में राजनीतिक सत्ता अपने आप में  साध्य नहीं है। यह जीवन के प्रत्येक विभाग में लोगों के लिये अपनी हालत सुधार सकने का एक साधन है।' उन्होंने स्वराज्य की रूपरेखा कुछ यूं दी थी- 'मेरे सपनों का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपयोग राजा और अमीर लोग करते हैं, वे उन्हें भी सुलभ होनी चाहिए। उसमें फर्क के लिये स्थान नहीं हो सकता।'     
राज्य के कत्र्तव्योंं के साथ ही गांधी जी ने नागरिकों के कत्र्तव्यों पर भी उतना ही जोर दिया था। उन्होंने अपने लेखों में सदैव कत्र्तव्य पालन की भावना को महत्व दिया। उनका मत था कि अधिकारों का सच्चा स्रोत कत्र्तव्य है। अगर हम सब अपने कत्र्तव्यों का पालन करें तो अधिकारों को खोजने बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता मिलने के बाद राजसत्ता के लिए जो नीतिगत सुझाव दिये, उनको अनेक विचारक तथा विश्लेषक गांधी जी की वसीयत का नाम देते हैं। भारत में वर्तमान में जो शासनतंत्र है, उसे संसदीय लोकतंत्र कहा जाता है। यह संसदीय लोकतंत्र, लोकशाही या पार्लियामेन्टरी डेमोक्रेसी अनेक देशों में प्रभावी है। भारत की आजादी के बाद 'हिन्द स्वराज्यÓ शीर्षक से एक आलेख में गांधीजी ने अपना यह विचार व्यक्त किया है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत की शासन व्यवस्था, नागरिक के कत्र्तव्य, अधिकार तथा उत्तरदायित्व तथा राष्ट्र के विकास का क्या स्वरूप होना चाहिए। समय-समय पर अपने लेखों तथा भाषणों में भी उन्होंने इस पर प्रकाश डाला तथा कांगे्रस के नेताओं और देश की जनता को मार्गदर्शन दिया। गांधीजी के हिंद स्वराज संबंधी अवधारणा की उनके शिष्ट संत विनोबा भावे ने 'शोषण रहित, शासनमुक्त अहिंसक समाजÓ के नाम से व्याख्या की। गांधी जी के हिंद स्वराज्य का एक महत्वपूर्ण बिंदु था-'सरकार के नियंत्रण से स्वतंत्र रहने का सतत् प्रयत्न।' यह स्पष्ट करना उचित होगा कि गांधीजी अराजकतावादी नहीं थे लेकिन उनका यह मत था कि जीवन की हर व्यवस्था और नियमन के लिए सरकार की ओर हमें नहीं ताकना चाहिए। प्रख्यात पश्चिमी चिंतक थोरों ने एक बार कहा था- 'जो सबसे कम शासन करें, वही सबसे उत्तम सरकार है।Ó महात्मा गांधी की राजसत्ता के व्यवहार संबंधी विचारधारा थोरों के मत से मिलती-जुलती है।

गांधी जी का यह विचार लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का आधार होना चाहिए। वे हर व्यक्ति की आंख का आंसू पोंछने की नीति में विश्वास करते थे। हमने आजादी के बाद जिस लोकतंत्र  को अपनाया, वह बहुमत के सिद्धांत पर चलता है। गांधी जी की नजर में लोकशाही वह होगी, जो सबके कल्याण की चिंता करे। वास्तव में गांधी जी एक राजनेता नहीं थे और वोटों की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे।  कांग्रेस संगठन से वे यदि जुड़े रहे तो शायद इसलिए कि भारत की आजादी का आंदोलन चलाने के लिए वे इसे अच्छा माध्यम समझते थे। लेकिन ग्राम स्वराज्य, बुनियादी तालीम, मद्य निषेध, गौ सेवा, हिंदी का उपयोग, गीता तथा रामचरित मानस का भारत के लोक जीवन में सांस्कृतिक महत्व जैसे मुद्दों पर उनका  अभिमत कई नेताओं की राजनीति के अनुकूल नहीं था। भारत को आजादी मिलने के बाद गांधी जी के नीति निर्देशक बिंदुओं की उपेक्षा भी हुई, लेकिन किसी व्यक्ति या सरकार द्वारा महत्व नहीं दिए जाने से गांधी दर्शन की प्रासंगिकता तथा उपयोगिता समाप्त नहीं होती। सरकार कैसी हो, इसके संबंध में गांधी जी की अवधारणा इन शब्दों से प्रतिध्वनित होती है-'राजनीतिक सत्ता का अर्थ है राष्ट्रीय प्रतिनिधियों द्वारा राष्ट्रीय जीवन का नियमन करने की शक्ति। अगर राष्ट्रीय जीवन इतना पूर्ण हो जाता है कि वह स्वयं अपना नियमन कर ले तो फिर किसी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता नहीं रह जाती। उस समय ज्ञानपूर्ण अराजकता की स्थिति हो जाती है। ऐसी स्थिति में हरेक अपना राजा होता है। वह ऐसे ढंग से अपने पर शासन करता है कि अपने पड़ोसियों के लिए कभी बाधक नहीं बनता, इसलिये आदर्श व्यवस्था में कोई राजनीतिक सत्ता नहीं होती परंतु जीवन में आदर्श की पूरी सिद्धि कभी नहीं होती, इसलिये थोरों ने कहा है कि जो सबसे कम शासन करे, वही उत्तम सरकार है।'

महात्मा गांधी का राजनीतिक सत्ता के संबंध में जो दृष्टिकोण था, वह लोकतांत्रिक सरकारों के उस स्वरूप तथा कार्यशैली से भिन्न है, जो हम इन दिनों भारत में तथा विश्व के लोकतांत्रिक देशों में देख रहे हैं। भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान परिस्थितियों में राजनीतिक दलों का एकमात्र लक्ष्य राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति है। गांधी जी इस दृष्टिकोण के विपरीत थे। वे लोकतंत्र के विरोधी नहीं थे, लेकिन उनका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति का उत्थान था। इस कारण उनका यह मानना था- 'बहुमत के नियम का एक हद तक ही उपयोग है। अर्थात मनुष्य को तफसील की बातों मेंं ही बहुमत के सामने झुकना चाहिए, लेकिन बहुमत के चाहे जैसे निर्णयों के लिए अपने को अनुकूल बनाने का अर्थ गुलामी होगा। लोकतंत्र के मानी ऐसी राज्य नहीं, जिसमें लोग भेड़ों की तरह व्यवहार करें। लोकतंत्र में व्यक्ति के मत और कार्य की स्वतंत्रता की सावधानी से रक्षा की जाती है।'

  
गांधी जी ने हिंद स्वराज्य की व्याख्या करते हुए अपने सपनों के भारत का रूप स्पष्ट किया था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद जो योजनाएं और कार्यक्रम बने तथा देश की राजनीतिक सत्ता के लिए जिस तरह की करवट समय-समय पर नेताओं ने बदली, वह गांधी जी के सपनों और सिद्धांत से मेल नहीं खाती। आज हम जीवन के हर क्षेत्र में शासन के हस्तक्षेप के मोहताज होते जा रहे हैं। भारत के संविधान में हुए शताधिक संशोधन तथा प्रतिवर्ष नये-नये अधिनियमों की प्रस्तावना गांधीजी की विचारधारा से सर्वथा प्रतिकूल है। 
लेखक  प्रभुनाथ
 

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