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हज सब्सिडी खत्म करने का ऐतिहासिक फैसला

Publish Date: February 04 2018 12:13:18pm

अदालत के आदेश के मुताबिक केंद्र सरकार ने हज यात्रा पर मिलने वाली रियायत को खत्म करके ऐतिहासिक कदम उठाया है। वैसे खुद मुस्लिम धार्मिक संस्थाएं भी इस पवित्र यात्रा को अपनी ईमान की कमाई से ही करने में यकीन रखती हैं, लिहाजा मुस्लिम धर्मावलंबियों ने इस फैसले पर खुशी ही जाहिर की है। इस साल हज यात्रा पर जाने वाले लगभग दो लाख यात्रियों को रियायत अब नहीं मिलेगी। केंद्र सरकार ने इस सब्सिडी को बंद करते हुए कहा है कि वह मुस्लिम समुदाय के लोगों को बिना तुष्टिकरण के सशक्त बनाना चाहती है। 
प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के बाद हज सब्सिडी खत्म करने का जो सिलसिला शुरू किया था, अब उस पर पूरी तरह ढक्कन लगा दिया गया है। मोदी सरकार ने हज के लिए प्रस्तावित सब्सिडी बिलकुल ही खत्म करने का फैसला लिया है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी का स्पष्टीकरण है कि हज सब्सिडी से मुसलमानों को फायदा होने के बजाय कुछ बिचौलिया एजेंसियों की तिजोरियां भरी जा रही थीं, लिहाजा यह फैसला लेना पड़ा। 
अलबत्ता सरकार गरीब हाजियों की आर्थिक मदद करने पर जरूर कुछ विचार करेगी। इस तरह हज सब्सिडी खत्म होने से भारत सरकार की 700 करोड़ रुपए से ज्यादा की बचत हो सकती है। साथ ही हाजी मुसलमान 'खैरात' की लानत से बच सकेंगे क्योंकि कुरान में लिखा है कि जो समर्थ हैं, वही हज पर जाएं। हज करने के लिए किसी भी तरह की 'खैरात' हराम है। बेशक सब्सिडी भी 'खैरात' ही है। 
मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकता तय की है कि सब्सिडी की राशि को मुस्लिमों के विकास, कल्याण और खासकर मुस्लिम बच्चियों की पढ़ाई पर खर्च किया जाएगा। सच्चर आयोग की रपट के मुताबिक करीब 90 फीसदी मुस्लिम बच्चियां अपनी स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाती और स्कूल छोडऩे को विवश होती हैं। करीब 60 फीसदी मुस्लिम महिलाएं शिक्षा से ही वंचित हैं। मात्र 10 फीसदी औरतें ही उच्च शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं। औसतन 43 फीसदी मुसलमान निरक्षर हैं। 
यह भी आकलन सामने आया है कि अभी तक हज सब्सिडी के नाम पर जो 3000 करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, उनसे 151 स्कूल बनाए जा सकते थे। बहरहाल इस मुद्दे को हिंदू-मुसलमान के चश्मे से न देखा जाए। 8 मई, 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि 10 सालों की अवधि के दौरान हज सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म किया जाए। हालांकि तत्कालीन यूपीए सरकार ने उस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी कि फिलहाल सब्सिडी खत्म न की जाए लेकिन सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर सख्ती से कायम रहा। शायद उसी का नतीजा है कि 2014 में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद सब्सिडी घटाकर 577 करोड़ रुपए कर दी। उसके बाद 2015 में 529 करोड़ और 2016 में 4०5 करोड़ रुपए हज सब्सिडी रह गई थी, जिसे अब पूरी तरह खत्म किया जा रहा है। इस पर मुसलमानों ने तल्ख प्रतिक्रियाएं दी हैं और ओवैसी सरीखे मुस्लिम नेताओं ने भी यह सब्सिडी तुरंत खत्म करने की बात कही थी। मुस्लिम नेताओं का एक तबका ऐसा है जिसका मानना है कि मोदी सरकार मुसलमानों को कुचल-कुचल कर परेशान कर रही है, लिहाजा लगातार मुस्लिम-विरोधी फैसले लिए जा रहे हैं। उनकी दलीलें हैं कि ऐसा कर मोदी सरकार हिंदुओं को संकेत देना चाहती है कि देखिए, वह मुसलमानों से किस तरह निपट रही है! 
दरअसल यह हिंदू-मुसलमान का मामला नहीं है। देश की आर्थिक स्थिति को बचाने की कोशिश है। सवाल है कि देश की आजादी के बाद हज सब्सिडी लगातार क्यों दी जाती रही है? यदि मुसलमान सरीखे अल्पसंख्यकों को यह सरकारी सुविधा दी जाती रही है तो जैन, बौद्ध, सिख, पारसी आदि अन्य अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं दी गई? उनके भी धर्मस्थल हैं, वे भी तीर्थयात्र पर जाना चाहते हैं। सवाल तो यह भी है कि पूरी हिंदू जमात को 'धार्मिक सब्सिडीÓ क्यों नहीं दी जाती? 
जब कैलाश मानसरोवर की यात्र के लिए विभिन्न राज्य सरकारें 20,000 रुपए से एक लाख रुपए तक के अनुदान देती हैं तो उन पर आपत्ति की जाती है। इस यात्र में हिंदू और मुसलमान सभी को अनुदान दिए जाते हैं। कुंभ मेले में भी केंद्र और राज्य सरकारें विस्तृत बंदोबस्त करती रही हैं। स्वच्छ पेयजल से लेकर सुरक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य सेवाओं के लिए डाक्टर और विशेष प्रकार के इंजेक्शन आदि भी मुहैय्या कराए जाते हैं। वे सरकारों के सामाजिक दायित्व हैं न कि सब्सिडी के माध्यम हैं जिनके जरिए सरकारें तुष्टिकरण की राजनीति खेलती रही हैं। क्या हज सब्सिडी भी तुष्टिकरण का एक जरिया रही है? सरकारी रिकार्ड के मुताबिक करीब 40 लाख मुसलमानों ने हज के लिए आवेदन किया है। लाटरी के जरिए इजाजत मिलेगी लेकिन बिना हज सब्सिडी के 1.75 लाख मुस्लिम ही मक्का-मदीना जा सकेंगे। सब्सिडी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ है। मोदी सरकार के आने से पहले करीब दो लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी दी जाती थी। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान पर लोगों ने गैस सिलेंडर पर सब्सिडी छोड़ी। अब भी एक मोटी सब्सिडी मुहैय्या कराई जा रही है। यह खत्म होनी चाहिए। यदि कोई गरीब, असहाय है, तो उसकी मदद करना सरकार का सामाजिक दायित्व है लेकिन 'खैरात' उन तबकों को भी क्यों दी जाए जो सक्षम और समर्थ हैं? 
यह भी सच है कि सब्सिडी का असल फायदा गरीबों के बजाय बिचौलिए ही उठा रहे थे। दरअसल सब्सिडी की यह 700 करोड़ रुपए की रकम अल्पसंख्यक समुदाय की आधी आबादी के शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक सशक्तिकरण के लिए खर्च होगी। सरकार ने हज यात्र के लिए दी जाने वाली सब्सिडी बंद करने और पैसे को मुस्लिम वर्ग के कल्याण के लिए लगाने का फैसला लिया है। सरकार ने हज यात्र के लिए दी जाने वाली सब्सिडी में गड़बड़ी का अंदाजा लगाया होगा, तभी सरकार ने सब्सिडी बंद करने का मन बनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी धीरे-धीरे हज सब्सिडी खत्म करने का आदेश दिया था। सरकार के इस फैसले पर कुछ राजनीतिक पार्टियां या मुस्लिम वर्ग के लोग इस पर आपत्ति जताते हुए बेतुकी बयानबाजी कर रहे हैं जो कतई उचित नहीं। 
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई सरकार मुसलमानों को मुख्य धारा में लाना चाहती है, वह भी बिना किसी भेदभाव के? यदि हां, तो सरकार क्यों नहीं 2002 में आये सच्चर कमेटी की सिफारिशों को लागू करती है? इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मुस्लिम समुदाय दलितों से भी ज्यादा पीछे हैं, चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या फिर सरकारी नौकरी की बात हो। हज सब्सिडी अब नहीं मिलेगी जबकि चार महाकुंभ मेले में सरकार लगभग चार हजार आठ सौ करोड़ रुपये खर्च करती है। कैलाश मनसारोवर यात्र में सरकार डेढ़ लाख रुपये प्रति व्यक्ति का खर्च करती। 
अगर मोदी सरकार नेक दिल से मुस्लिम समुदाय का सशक्तिकरण करना चाहती है तो प्रधानमंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद। उम्मीद है कि बचत के पैसों से मुस्लिम वर्ग का भला ही होगा। यकीनन सरकार के इस फैसले से मुस्लिम वर्ग की गरीब तबके की मातृशक्ति को संबल मिलेगा। पक्ष-विपक्ष भी इस फैसले को सियासत का अखाड़ा बनाकर वोट बटोरने का जरिया न बनाएं। उम्मीद है कि इस बचे धन का इस्तेमाल अल्पसंख्यक तबके की बालिकाओं की जिंदगी में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा।

(अदिति) लेखक तारकेश्वर मिश्र
 

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