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धू-धू जलता तिब्बती हित

Publish Date: February 05 2018 01:02:08pm

चीन में अराजकता चरम पर पहुंच गई है। चीन जहां एक ओर अपनी राजनीतिक व कूटनीतिक हरकतों से तृतीय विश्वयुद्ध की परिस्थितियां निर्मित कर रहा है, वहीं वह वैश्विक संबंधों को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। आंतरिक रूप से भी चीन धू-धू कर जल रहा है। चीन में सरकार का दमन चक्र इतना ज्यादा व्यापक व भयानक है कि आंदोलनकारी अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए चार बार सोचते हंै। जो नागरिक आवाज उठाता है, वह एक तरह से शहादत को प्राप्त करता है। 

तिब्बतियों पर चीनी सरकार का खौफ बहुत ज्यादा डरावना व रोंगटे खड़े करने वाला है। चीन में हर रोज कोई न कोई नागरिक या व्यक्ति चीनी आतंक से त्रस्त होकर आत्मदाह कर रहा है। शहादत दे रहा है।

चीन की अपनी कुछ राजनीतिक व आर्थिक यातनाएं हैं। वह तिब्बत में अपना दबदबा स्थापित कर बैठा है। चीन को तिब्बत के निरीह नागरिकों का मर-मिटना अपनी जीत के पक्ष में ही लगता है। वह विश्व समुदाय की आंखों में पर्दा तो डाल ही रहा है, सीधे सेना बुलाकर तिब्बती जनता को मौत के घाट उतारने से भी नहीं चूक रहा है। चीन तिब्बत के मूलनिवासियों के ऊपर जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक दबाव डाल रहा है। इतना जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक दबाव कि लोगों अर्थात वहां के मूलनिवासियों का जीना दूभर हो रहा है। जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक कूटनीति के तहत चीन कम्युनिस्ट व अतिवादी नागरिकों को तिब्बत में बसा रहा है। यह एक इस तरह का सिद्धांत है- कमजोरों का सफाया करना है तो बलवानों का घेरा बनाना हैं। बलवान खुद-ब-खुद कमजोरों के लिए मौत बन जाएंगे। कमजोर खत्म हो जाएंगे। तिब्बत के मूल व जन्मजात नागरिकों को तिब्बत में रहकर या तो आत्महत्या करनी पड़ रही है या देश छोड़कर पलायन करना पड़ रहा है।

तिब्बत के मामले में यह यक्ष प्रश्न बनकर उभरता है कि क्या किसी देश की सरकार भी आतंकवादी सरकार बन सकती है? चीन की सरकार तिब्बत में आतंकवादी की भूमिका ही निभा रही है। उसने ऐसा आतंक मचा रखा है कि तिब्बतियों का पुर्जा-पुर्जा कांप जाए। एक ऐसा आतंक जिसके बारे में सोचकर लोकतंत्र व जनतंत्र के हिमायतियों, मानवतावादियों का दिल थर्रा जाए। मगर विश्व समुदाय कुछ कर नहीं पा रहा है, सिवाय आलोचना के। चीन को पाकिस्तान व उत्तरी कोरिया का समर्थन मिल रहा है। तिब्बत में अराजकता व आतंक का माहौल बनाने के लिए ये कट्टरपंथी व तानाशाही राष्ट्र चाहते हंै कि मानवाधिकारों को बुरी तरह से कुचल दिया जाए। अतिवादी राजनीति को बल दिया जाए।

भारत, अमेरिका, रूस, ब्रिटेन तमाम राष्ट्र चीन के तिब्बती उत्पीडऩ से भली-भांति परिचित हैं, मगर तिब्बत में हस्तक्षेप करना व सैनिक कार्यवाही करना इसका मतलब है तृतीय विश्वयुद्ध का बिगुल फूंकना। और चीन भी इस बात से वाकिफ है कि महज तिब्बती समस्या को लेकर तृतीय विश्वयुद्ध की भूमिका गढऩा अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय के लिए बेहद मुश्किल है और चीन यह सोचकर भी आश्वस्त है कि अगर तृतीय विश्वयुद्ध आतंकवाद या तिब्बती दमन के कारण छिड़ता है तो पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया सहित खुद चीन परमाणु हथियारों व अत्याधुनिक हथियारों से लैस है और अन्तर्राष्ट्रीय आक्रमण का सामना करने में सक्षम है। कुल मिलाकर तिब्बती हित धू-धू कर जल रहा है। चीन में बौद्ध घटते-कमते जा रहे हैं। जानवरों पर भयंकर अत्याचार हो रहा है। दुनिया में सबसे ज्यादा जानवर चीन में काटे जा रहे हैं। चीन सीलबंद मांस का आयात भी बड़ी मात्रा में करता है। 

- लेखक आर.सूर्य कुमारी (विनायक फीचर्स)  

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