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चीन की जलनीति से तबाह हो जाएगी विश्व की 50 प्रतिशत जनसंख्या

Publish Date: February 06 2018 02:24:19pm

जिस प्रकार चीन अपनी जलनीति को धारदार तरीके से अंजाम दे रहा है, उससे आने वाले समय में विश्व की लगभग 5० प्रतिशत जनसंख्या तबाह हो सकती है। चीन उस पानी के टंकी के साथ छेड़-छाड़ कर रहा है जो निहायत संवेदनशील है और एशिया के लगभग सभी देशों को प्राकृतिक तरीके से पानी उपलब्ध कराती है और सींचती है। 
तिब्बत एशिया की प्रमुख नदियों का स्रोत है। ये नदियाँ हैं-सिंधु, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, करनाली, अरुणकोशी, घघरा, मानस, दिबांग, लोहित, इरावदी, सालविन, मेकांग, यांगत्से तथा हुआंगहो। ये नदियाँ अंतर्राष्ट्रीय नदियाँ हैं या ऐसा कहें कि वैश्विक नदियां हैं क्योंकि नदियों को किसी देश की सीमा के अंदर नहीं बांधा जा सकता। जिस प्रकार वायु, जल, सूर्य की किरणों को किसी देश की सीमा के साथ नहीं जोड़ा जा सकता, उसी प्रकार नदियों को भी किसी देश की सीमा के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है। ये तमाम नदियां तिब्बत, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, थाललैंड, लास, कम्पुचिया, बियतनाम तथा चीन होकर बहती हैं और यही कारण है कि ये देश विश्व की घनी आबादी वाले उपजाऊ देशों की श्रेणी में आते हैं। यहां विश्व की आधी मानव जाति निवास करती है। ये नदियाँ एशिया के इन देशों की प्राणधारा हैं। विश्व की 47 प्रतिशत जनसंख्या का इन्हीं नदियों के द्वारा भरण-पोषण होता है। ये नदियां एशिया के इन देशों की साझी विरासत है। 
ये नदियाँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। तिब्बत के पठार पर कोई छेड़छाड़ होता है तो इके दुष्परिणाम एशिया के सभी देशों को भुगतना पड़ेगा पर चीन इस ओर ध्यान देने के बजाय पूरे एशिया महाद्वीप को तबाह करने की योजना बना रहा है। चीन तिब्बत में जंगलों की अंधाधुंध कटाई कर रहा है। वहां के खनिज पदार्थों के लिए पर्यावरण का ध्यान न रखते हुये, अनियंत्रित खनन कर रहा है। यही नहीं, इन नदियों पर अनगिनत बांध बनाकर वह एशिया के जल स्रोतों पर नियंत्रण के फिराक में है। चीन अपनी साजिश में कामयाब रहा तो जल्द ही एशिया की यह पानी की टंकी विनष्ट हो जाएगी और पूरे ऐशिया की मानव आबादी भटकने को विवश हो जाएगी। 
तिब्बत से निकलने वाली नदियों के दो मुख्य स्रोत हैं, पहला-उत्त्तर-पश्चिम में कैलाश मानसरोवर और दूसरा-उत्त्तर-पूर्व का आमनेमाछेन पर्वत। कैलाश मानसरोवर में भगवान शंकर तथा देवी पार्वती का निवास माना जाता है। हिंदू, बौद्ध, जैन कैलाश मानसरोवर खण्ड की तीर्थ यात्र व प्रदक्षिणा करते हैं। इसी तरह आमदो के आमनेमाछेन में तिब्बती देवता माछेन पोमरा का निवास माना जाता है। तिब्बत के लोग उनको अपना शुभचिंतक देवता मानते हैं। वे आमनेमाछेन की तीर्थ यात्र के लिये जाते हैं और उसकी परिक्रमा करते हैं।
कैलाश मानसरोवर खण्ड से सिंधु, ब्रह्पुत्र, सतलज तथा करनाली नदियाँ निकलती है। उनका उश्वम स्थान पास-पास ही है पर वे अलग अलग दिशाओं में बहती हैं। सिंधु पहले पश्चिम फिर दक्षिण दिशा में बहती है। ब्रह्मपुत्र, कैलाश मानसरोवर के पहले पूर्व-दक्षिण तथा फिर दक्षिण पूर्व की ओर बह जाती है। सतलुज तथा करनाली दक्षिण की ओर जाती हैं। कई जानकारों का तो यहां तक कहना है कि भारत की सबसे पवित्र मानी जाने वाली गंगा का गुप्त उदगम स्थल भी मानसरोवर ही है। 
यह अनोखी बात है कि उत्तर भारत की चार प्रमुख नदियों का उश्वम एक ही स्थान। कैलाश मानसरोवर की हिम नदियों से हुआ है और वे विभिन्न दिशाओं में बहती है। सिंधु उत्तर की ओर जाकर फिर पश्चिम की ओर, ब्रह्मपुत्र पूर्व की ओर जाकर फिर दक्षिण की ओर, सतलुज दक्षिण की ओर जाकर फिर पश्चिम की ओर, करनाली दक्षिण की ओर। सिंधु का उश्वम स्थल 5183 मीटर पर, ब्रह्मपुत्र का 5,300 मीटर, सतलज का 5,200 मीटर। सतलज की लम्बाई 1448 किलो मीटर (9०० मील)। पंजाब की पाँच नदियों में यह सबसे लम्बी नदी है।
पूर्वगामी ब्रह्मपुत्र में मानसरोवर तथा पे के बीच (1623 किलो मीटर) 14 नदियाँ उत्तर दिशा से आकर मिलती है। जिसमें प्रमुख है रोंगोछू, ज्ञमल बीन, जियाम्बदा छू आदि। ये नदियाँ पूरब में बहने वाले शांको से 30 किलो मीटर उत्तर दिशा में जो हिमाद्रि श्रृंखला है जो मेन वाटरशेड है। वहीं भारत के इतिहास पुराण के अनुसार भारत की उत्तरी सीमा है। 
इसी तरह तीन महानदियाँ यांगत्से, मेंकांग, सालविन, आननेमाछेन क्षेत्र से निकलकर विभिन्न दिशाओं में बहती हैं लेकिन तिब्बत के खाम प्रदेश तथा म्यांमार बोर्डर के निकट ये एक दूसरे के समानान्तर पांच डिग्री के अंतर पर बहते हैं। इनके तीन समानांतर नदियों के पश्चिम अरुणाचल प्रदेश के सामने तीन बड़ी नदियाँ लोहित, दिवांग समानान्तर दक्षिण दिशा में अरुणाचल होकर असम में जाती है। लोहित तथा दिवांग के पश्चिम थोड़ी दूर पर अरुणाचल प्रदेश के सिंयाग जिले के सामने कैलाश से सीधा पूरब 16०० किलोमीटर आकर ब्रह्पुत्र अचानक दक्षिण की ओर मुड़ जाता है तथा लोहित और दिवांग के समानान्तर अरुणाचल होकर असम में चली जाती है तथा ये तीनों नदियाँ असम में सदिया के पास एकाकर होकर ब्रह्पुत्र के नाम से दक्षिण पश्चिम की ओर प्रस्थान करती है।
तिब्बतन वाटरशेड से निकलने वाली नदियों में एशिया की प्रमुख नदियाँ जैसे-सिंधु (कुल लम्बाई-2900 किलो मीटर, जिसमें 800 किलोमीटर तिब्बत में है), सिंधु भारत की सात पवित्र नदियों-सप्त सिंधुओं में एक है। इसके तट पर भारत की सभ्यता विकसित हुई बताई जाती है। सिंधु पंजाब-सिंध (पाकिस्तान) के 80 प्रतिशत भाग को सींचती है। सिंध को सिंधु नदी का दान कहते हैं। सिंधु विश्व की उन दस नदियों में जिनके आगामी 20 वर्षों में सूख जाने की आशंका है। सिंधु बेसिन के 90 प्रतिशत वन काट डाले गये हैं। अब यहाँ केवल 04 प्रतिशत वन हैं। सिंधु बेसिन में चीन 60 मीटर से अधिक ऊँचाई के तीन डैम बना रहा है। सिंधु का तिब्बती नाम सिंगेखबाब है। 
चंूकि तिब्बत पर चीन का अवैध कब्जा है इसलिए वह इन नदियों पर भी अपना ही प्रभुत्व मानता है। वह तिब्बत की सीमा में बड़ी तेजी से तिब्बत के संसाधनों का शोषण कर रहा है। दुनिया के देश देख कर भी अनदेखी कर रहे हैं। जिस प्रकार चीन अपनी योजना में आगे बढ़ रहा है उसमें वह सफल रहा तो वह न केवल अपने देश का अहित करेगा अपितु एशिया के एक बड़े भूभाग को संकट में डाल देगा। इसलिए इस मामले पर भारत गंभीरता से सोचे और इन बिन्दुओं को केन्द्र में रखबर हिमालय की नदियों से संपोषित देशों का एक मोर्चा बनावे। यह तभी सफल होगा जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान एक मंच पर आगर पर्यावरण के मुद्दों पर सोचेंगे और आपसी कटुता मिटाएंगे। चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन को उकसा रही है। वह उन्हीं राक्षसी प्रवृत्ति वाली कंपनियों की चाकरी में व्यस्त है। 
चीन को इससे निजात दिलाने के लिए चीनी जनता को भी साथ लेना होगा। इसके लिए चीन में बड़ी तसल्ली से इस बात का प्रचार करना होगा कि चीन जिस प्रकार तिब्बत के वाटर टैंक को तबाह करने की योजना बना रहा है, उससे न केवल अन्य देशों को अपितु चीन की जनता को भी घाटा होगा। चीन में जो बहुराष्ट्रीय पैसा लगा है, वे तो अपना मुनाफा कमाकर चले जाएंगे लेकिन भुगतना चीन की जनता को पड़ेगा। इस दिशा में भारत को भी सतर्क रहना चाहिए और चीनी मॉडल से दूर रहनी चाहिए।            
लेखक गौतम चौधरी
(अदिति)

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