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अस्पतालों में भ्रष्टाचार एक बदनुमा दाग

Publish Date: February 07 2018 03:03:01pm

आजकल देश में भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है। एक तरह से भ्रष्टाचार, शिष्टाचार हो गया है। ऐसे-ऐसे घोटाले, काण्ड एवं भ्रष्टाचार के किस्से उद्घाटित हो रहे हैं, जिन्हें सुनकर एवं देखकर शर्मसार हो जाते हैं। समानांतर काली अर्थव्यवस्था इतनी प्रभावी है कि वह कुछ भी बदल सकती है, बना सकती है और मिटा सकती है। भ्रष्टाचार का रास्ता चिकना ही नहीं, ढालू भी है। यही कारण है कि इसने शिक्षा एवं चिकित्सा के क्षेत्र को भी नहीं बख्शा है। हमारा नेतृत्व और देश को संभालने वाले हाथ दागदार हैं इसलिए वे इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई करते हुए दिखाई नहीं देते। दिल्ली सरकार के सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल हों या देश के सर्वोच्च ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीच्यूट या सफदरजंग अस्पताल। इन सभी जगहों पर भ्रष्टाचार का व्याप्त होना बेहद चिंताजनक है। हाल ही में दिल्ली सरकार के जीबी पंत अस्पताल में मरीजों के इलाज में भ्रष्टाचार की खबरों ने न केवल चौंकाया है, बल्कि शर्मसार भी किया है। 
अस्पताल में दलालों का बोलबाला है, जो मरीजों से पैसे लेकर न केवल उनका इलाज कराते हैं, बल्कि ऑपरेशन तक की भी व्यवस्था करते हैं। जहां सरकारी अस्पतालों में मरीजों को इलाज के लिए लंबी लाइन या सिफारिशों की जरूरत पड़ती है। यह सब होने के बावजूद भी इलाज हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जीबी पंत के मामले में भ्रष्टाचारियों एवं दलालों ने दिल्ली सरकार के मंत्री इमरान हुसैन द्वारा भेजे गए असलम नामक मरीज को भी नहीं बख्शा। इससे पता चलता है कि दलालों को किसी का डर नहीं है और वह धड़ल्ले से अपना काम कर रहे हैं। इसमें अस्पताल के कई डॉक्टर व कर्मचारी भी शामिल हैं, क्योंकि इनके बगैर यह अवैध धंधा नहीं हो सकता है। इस मामले में जांच कमेटी की रिपोर्ट में भी यह बात सामने आई है कि अस्पताल भ्रष्टाचार व राजनीति का अड्डा बन गया है। इस तरह का भ्रष्टाचार कोई नया नहीं है। हमारा देश गरीबी और पिछड़ेपन का ही खिताब नहीं पहना है, अब तो वह विश्व के सामने भ्रष्टाचार की सूची में भी नामांकित हो गया है। इससे बढ़कर और क्या दुर्भाग्य होगा? क्या विश्व के हाशिये में उभरती भारत की तस्वीर को हम कुछ नया रंग नहीं दे सकते? 
अस्पताल हों या स्कूल उनमें भ्रष्टाचार का पसरना एक अभिशाप है। आश्चर्य है कि सरकारी अस्पतालों के परिप्रेक्ष्य में कुछ दिनों में दलालों ने इतना मजबूत नेटवर्क बना लिया है कि उनकी सेवाओं के बिना इलाज ही असंभव होता जा रहा है। निश्चित रूप से पिछले कई वर्षों से सरकारी अस्पतालों में यह सब चल रहा है। डॉक्टरों से मिलवाने, ऑपरेशन कराने, किसी तरह की जांच कराने, मरीज के लिए खून की व्यवस्था करने के एवज में पैसे लेने की शिकायतें पहले भी आती रही हैं, लेकिन दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई नहीं होती है। इन अस्पतालों में पहुंचने वाले ज्यादातर गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार के मरीज होते हैं। वे निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। इस स्थिति में सरकारी अस्पताल ही इनके लिए एक मात्र सहारा है, लेकिन वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगती है। इस तरह के भ्रष्टाचार से दिल्ली सरकार के कामकाज पर भी प्रश्न चिह्न लगा है। दिल्ली के लोगों के लिए जीबी पंत अस्पताल के 50 फीसदी बेड आरक्षित करने की घोषणा की गई है, लेकिन इसका लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है। यह दिल्ली सरकार पर एक बदनुमा दाग है। उनकी कथनी और करनी में असमानता का द्योतक है।
हमने आजाद भारत का एक ऐसा सपना देखा था, जहां न शोषक होगा न शोषित और न मालिक होगा न मजदूर। न अमीर होगा और न ही गरीब। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान, सही अवसर और बिना भ्रष्टाचार के सुविधाओं की उपलब्धि का नक्शा हमनें खींचा था। मगर कहां फलित हो पाया हमारी जागती आंखों से देखा गया स्वप्न? कहां सुरक्षित रह पाए जीवन-मूल्य? कहां अहसास हो सकी स्वतंत्र चेतना की अस्मिता? हमारी समृद्ध राष्ट्रीय चेतना जैसे बंदी बनकर रह गयी। शाश्वत मूल्यों की मजबूत नींवें हिल गई। राष्ट्रीयता प्रश्नचिन्ह बनकर दीवारों पर टंग गई। भ्रष्टाचार, शोषण, स्वार्थ और मायावी मनोवृत्ति ने विकास की अनंत संभावनाओं को थाम लिया। चरित्र और नैतिकता धुंधला गई। राष्ट्र में जब राष्ट्रीय मूल्य कमजोर हो जाते हैं सिर्फ निजी हैसियत से ऊंचा करना ही महत्वपूर्ण हो जाता है तो वह राष्ट्र निश्चित रूप से कमजोर हो जाता है। 
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि हम हर स्तर पर वैश्वीकरण कर रहे हैं। व अपने को बाजार बना रहे हैं। यह विरोधाभास नहीं, दुर्भाग्य है। अपने को, समय को पहचानने वाला साबित कर रहे हैं पर हमने अपने आप को, अपने भारत को, अपने पैरों के नीचे जमीन को नहीं पहचानते।
नियति भी एक विसंगति का खेल, खेल रही है। पहले जेल जाने वालों को कुर्सी मिलती थी, अब कुर्सी पाने वाले जेल जा रहे हैं। यह नियति का व्यंग्य है या सबक? पहले नेता के लिए श्रद्धा से सिर झुकता था, अब शर्म से सिर झुकता है। यह शर्म बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के दावानल का परिणाम है। इस पर रोक लगना नये भारत के निर्माण की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए। 
लेखक ललित गर्ग (विनायक फीचर्स)

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