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कोई भी दल गरीबी नहीं मिटाना चाहता

Publish Date: February 10 2018 12:23:03pm

देश के इतिहास पर नजर डालें तो प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वाधीन भारत में अपने सबसे पहले भाषण मेें यही कहा था कि उनका प्रमुख लक्ष्य गरीबी को मिटाना होगा। इसके बाद देश में जितने भी सत्ताधारी नेता आये उन सबने गरीबों की स्थिति सुधारने की बात कही। यहां बात केवल एक दल की नहीं अपितु सारे दलों की है। किसी भी दल के नेता ने यह नहीं कहा कि गरीबी को समाप्त करने के लिए अपनी ओर से प्रयास नहीं करेगा।
गरीबी के नाम पर इस देश में अनगिनत योजनाएं बनाई गईं और चलाई भी गईं परंतु आज दशा क्या है। देश के स्वाधीन होने के बाद उसकी जितनी कुल जनसंख्या थी उससे कहीं अधिक गरीब इसमें निवास कर रहे हैं। गरीबी तो मिटी नहीं, लेकिन जनसंख्या बढ़कर तिगुने के करीब पहुंच गई और जहां तक आम आदमी के जीवन स्तर का सवाल है तो वह तुलनात्मक रूप से कहीं और नीचे चला गया। कुछ लोग इस बारे में यह कुतर्क प्रस्तुत करते हैं कि पराधीन भारत की तुलना में आज के लोग कहीं बेहतर अवस्था में हैं।
आज पहले के समान भुखमरी नहीं है और न ही देश का आधारभूत ढांचा उतना पिछड़ा है जितना पराधीन भारत में हुआ करता था। वस्तुत: विकास के पैमाने से देखा जाये तो स्पष्ट होगा कि विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रकृति में हर विधा के समय के साथ अपने आप विकास अथवा बदलाव आता है। दूसरे इसे भी स्मरण रखना चाहिए कि जहां तक मनुष्य के ज्ञान का सवाल है तो वह भी निरंतर बढ़ता ही है। नये आविष्कारों और अनुसंधानों के साथ विभिन्न क्षेत्रों में नई तकनीक से जब काम किये जायेंगे तो उनका फल पहले की तुलना में अधिक मिलेगा। इस दृष्टि से भारत का विकास हुआ है, आज देश में एक आधारभूत इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है और उसमें निरंतर सुधार भी हो रहा है।
 आज कृषि में यदि  देश आत्मनिर्भर है तो विज्ञान के क्षेत्र में इसमें नये आयाम स्थापित किये हैं। सड़कों, बिजली और पानी के हिसाब से आज का भारत कहीं बहुत आगे है परंतु जहां तक सामान्य लोगों केे जीवन स्तर का सवाल है तो वहां यह आज भी बहुत पिछड़ा हुआ है। विकास के पैमाने से यदि भारत के उन अन्य देशों से तुलना की जाये जो समकालीन परिस्थितयों में आगे बढ़े हैं तो मालूम होगा कि किसी भी देश के विकसित होने से वहां के सत्ताधारियों की कैसी भूमिका हुआ करती है। इस मामले में सबसे पहले पड़ोसी चीन को लिया जा सकता है। 
सच तो यह है कि 1947 में जब भारत स्वाधीन हुआ, तब चीन हर दृष्टि से उससे 100 साल से भी अधिक पीछे था। वहां न कोई आधारभूत ढांचा था, न कोई औद्योगिक आधार और न ही शिक्षा तथा स्वास्थ्य की सुविधाएं। चीन के लोगों को उस समय सबसे अधिक आलसी माना जाता था और इसका कारण यह था कि वहां जिस तरह की सरकारें थीं, उसने कभी सर्वहारा के विकास के बारे में कुछ नहीं किया।
 चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में एक सशस्त्र क्रांति के बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी सेना में आई तो उसके नायकों ने यह पहले ही तय कर लिया था कि देश के विकास की प्राथमिकताएं क्या होंगी। उन्होंने तय कर लिया था कि सत्ता में आते ही वे सबसे पहले जनसंख्या नियंत्रण को हाथ में लेंगे तो भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ कठोर कदम उठाये जाएंगे। नतीजा यह था कि चीन में 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी  ने सत्ता में आते ही एक परिवार और एक संतान की कठोर नीति का पालन किया और आज नतीजा यह है कि जिस चीन की आबादी 1947 में 60 करोड़ थी, आज वह 130 करोड़ तक ही पहुंच पाई है और यह देश उस मुकाम पर पहुंचा है, जहां अगले 10 साल में इसकी आबादी इस तरह स्थिर हो जाएगी, जो वहां की जमीन और उत्पादन की दृष्टि से संतुलित रहेगी। 
यह बताने की जरूरत नहीं है कि चीन के पास भारत की तुलना में चौगुनी भूमि है और वहां प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। विकास के इस एक छोटे से उदाहरण से ही मालूम हो जायेगा कि भारत की समस्याओं का मुख्य कारण बेहताशा बढ़ती आबादी ही है, जिसके भोजन, पानी और रहन-सहन में ही सारे संसाधन लगे हुए हैं। 70 वर्ष बाद चीन में आज न तो इतने भिखारी हैं और न ही ऐसी योजनाएं, जो लोगों को अपंग बनाने के साथ उनको सरकार पर आश्रित करती हों। चीन में आज गरीबी की रेखा जैसा कोई पैमाना नहीं है और सारी योजनाएं किसानों से लेकर आम लोगों के विकास पर ही केंद्रित रहती हैं।
 वहां भारत जैसी ऐसी किसी योजना की कल्पना नहीं की जा सकती, जहां सरकार 30 रुपए किलो का अनाज खरीदकर लोगों को एक रुपए किलो में इसलिए दे, ताकि वे जिंदा रह सकें। भारत में यह योजना भी इसलिये चलाई जा रही है क्योंकि जिस तरह व्यापार के लिए लोगबाग पोल्ट्री फॉर्म चलाते हैं, वैसे यहां के राजनीतिक दल वोटरों को पालने के लिए ऐसी योजनाएं चला रहे हैं, जो मुफ्तखोरी और आलस को बढ़ा रही हैं। चीन में किसान तक अपने विकास के लिए प्रयास करता है परंतु यहां हालात ऐसे हैं कि हर वर्ष हजारों किसान आत्महत्या कर लेते हैं। 
वस्तुत: भारत में गरीबी के समाप्त न होने का सबसे बड़ा कारण ही यह है कि यहां हर दल की राजनीति का प्रमुख आधार यह गरीबी ही है। गरीबी, भ्रष्टाचार, महंगाई और जनसंख्या विस्फोट ऐसे विषय हैं, जिनको कोई भी राजनीतिक दल इसलिये कभी भी हल नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा होने के साथ ही उनकी प्राणवायु अपने आप समाप्त हो जाएगी।
 वे इनके आधार पर जिंदा हैं और इसीलिए हर चुनाव के मौके पर इनको समाप्त करने का वादा जरूर करते हैं परंतु व्यवहार में क्या होता है, इसे देश पिछले कई दशकों से देख रहा है। इसलिए राष्ट्रपति कोविंद ने भले ही गरीबी को समाप्त करने की बात कही हो परंतु यह तय है कि यहां के राजनीतिक दल उसे कभी समाप्त नहीं होने देंगे।      
गणेश  शंकर भगवती, लेखक (विनायक फीचर्स) 

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