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चीन की घेराबंदी-आसियान के माध्यम से

Publish Date: February 14 2018 12:32:36pm

इस बात पर मोदी विरोधी भले ही सहमत न हों मगर यह कठोर सत्य है कि मोदी के रूप में भारत को एक कुशल प्रशासक ही नहीं, एक दूरदर्शी राजनेता भी मिला है जो केवल चुनाव जीतने की रणनीति में ही नहीं उलझा रहता अपितु देश के विकास के साथ साथ उसकी सुरक्षा के लिए भी उतना ही जागरूक है जितना आंतरिक शान्ति और सुव्यवस्था के प्रति। वह जहां सबका विकास के मूल मन्त्र को लेकर चल रहे हैं, वहीं पड़ोसियों के अनेक कटु अनुभवों और पूर्वाग्रहों के चलते उनसे मित्रता बनाने और उसे चिरस्थायी बनाने की नीति का भी अनुगमन करते नजर आते हैं। 

भारत के चिर शत्रुओं चीन और पाकिस्तान के प्रति मोदी ने बहुआयामी कूटनीतिक चालों का जाल बुना। पाकिस्तान को उसी के बुने जाल में उलझा कर अब मोदी ने चीन की ओर अपनी कूटनीति का तो मुहाना कर दिया है। चीन के लगभग सारे पड़ोसी देश उसकी विस्तारवादी नीति के चलते उससे परेशान, डरे और नाराज हैं। मोदी ने इसी लूपहोल का लाभ उठाया और एक सशक्त और दुनिया के सशक्त देशों की मित्रता प्राप्त राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बना चुके भारत की दोस्ती का पैगाम समय-समय पर उन तक पहुंचाना प्रारम्भ कर दिया। चीन के आतंक से परेशान राष्ट्रों को भारत के रूप में एक आशा की किरण दिखाई देने लगी और नतीजे सकारात्मक रहे। 

मोदी के दूरगामी और अनूठी सोच की बानगी तब सामने आई जब उन्होंने गणतन्त्र दिवस पर एक राष्ट्राध्यक्ष को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने की परम्परा को तोड़ कर चीन की घेराबंदी के कूटनीतिक प्रयास के रूप में आसियान के सभी राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित किया। किसी भी राष्ट्राध्यक्ष के लिए इस अवसर पर आमन्त्रण उस राष्ट्र प्रमुख के प्रति सर्वोच्च सम्मान माना जाता है क्योंकि वह राष्ट्राध्यक्ष भारत के राष्ट्रपति के साथ मंच साझा करता है इसलिए इस सम्मान के लिए उसी राष्ट्राध्यक्ष का चयन किया जाता है जिससे भारत के निकट के मधुर सम्बन्ध होते हैं और जो भारत के हितों के प्रति उदारता रखता है। आसियान के सभी राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रण इस बात का द्योतक है कि भारत आसियान के सदस्य देशों के प्रति सम्मान का भाव रखता है और उनकी भारत के हितों के प्रति उदारता से संतुष्ट है। 

राजनीति केवल एक ही उद्देश्य को लेकर नहीं चलती। उसकी हर चाल में कई निहितार्थ छिपे होते हैं। विगत तीन वर्षों से चीन से दुश्मनी के चलते भारत सरकार 'पूरब की ओर देखो (लुक ईस्ट पालिसी) नीतिÓ पर विशेष बल दे रही है। इस नीति के माध्यम से पूर्व के उन विकासशील देशों के साथ प्रगाढ़ सम्बन्धों पर बल दिए जाने का प्रावधान किया गया है जहां पर पारस्परिक सहयोग व पारस्परिक आर्थिक लाभ की सम्भावनाएं मौजूद हों। मोदी के आने के बाद इस ओर विशेष प्रयास हुए हैं और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के सम्बन्धों ने नये आयामों को छुआ है। दोनों पक्ष पिछले कुछ समय से ईमानदारी से इस दिशा में प्रयास भी कर रहे हैं। 

यह कटु सत्य है कि पहले ऐसा बिलकुल नहीं था। पिछली भारत सरकार की निष्क्रियता और अनिश्चित विदेश नीति के कारण और कुछ अयाचित कटु अनुभवों के चलते ये देश भारत की ओर बहुत शंका और अविश्वास की दृष्टि से देखते थे। मोदी सरकार के इस दिशा में किये गये प्रयासों को भी शंका की दृष्टि से देखा गया। इसे भारत में परम्परागत संकीर्ण सोच और प्रक्रियागत पेचीदगियों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा गया। इसका असर भारत पर हुआ और उसने मोदी की विदेश नीति के परिप्रेक्ष्य में अपनी अर्थव्यवस्था को उदार स्वरूप में ढाला और प्रक्रियागत पेचीदगियों को लचीला बना कर एक नया स्वरूप प्रदान करने में सफलता प्राप्त की। परिणामस्वरूप आसियान देशों ने भी विश्वासपूर्वक भारत के साथ अपने हितों को साझा करना उचित समझा और तारतम्य बनता चला  गया। इसी तारतम्य को चिरस्थायी और सबल बनाने के दृष्टिकोण से मोदी सरकार ने यह अनूठा पग उठा कर एक के स्थान पर दस राष्ट्राध्यक्षों को मुख्य अतिथि बनाने का परम्परा से हट कर कार्य किया है। इस पग के भारत के पक्ष में विरल और अनूठे परिणाम आएँगे, ऐसा भारतीय नीतिनियन्ताओं का अनुमान है। 

स्वयं को एशिया ही नहीं, विश्व का महादेश समझने वाले चीन के पड़ोसियों पर दबाव बनाए रखने की नीति पर चलने के कारण चीन का हरएक पड़ोसी सशंकित और डरा हुआ है। अपने क्षेत्र, जनसंख्या और भारी युद्धशक्ति क्षमता के कारण चीन का हर पड़ोसी देश आशंकाओं के बीच जीते रहने को मजबूर है। ऐसी परिस्थितियों में उनमें सामूहिक प्रतिरोधक्षमता निर्माण की नितांत आवश्यकता हर स्तर पर महसूस हो रही है। इन में से अकेले कोई भी देश चीन के सामने एक दिन क्या, एक घंटे भी ठहरने की स्थिति में नहीं है। इन परिस्थितियों के चलते आसियान को भी जो भले ही चीन से उन्नीस हो, एक पड़ोसी सशक्त देश के सहारे की आवश्यकता है। हर दृष्टिकोण से भारत इन देशों की कसौटियों पर खरा उतरता है। इधर भारत भी चीन की दबंगई और उसकी विस्तारवादी नीति से परेशान है। वह भी अकेला चीन से लड़ कर टक्कर तो दे सकता है किन्तु जीत नहीं सकता इसलिए भारत को भी चीन को घेरने के लिए कुछ मित्र पड़ोसी देशों की आवश्यकता है। समान हितों के चलते मित्रता स्वाभाविक है। 

मोदी सरकार ने सही निर्णय लेते हुए इसी सिद्धांत को आजमाना उचित समझा और पड़ोसियों की ओर मित्रता का हाथ बढ़ा दिया जिसे सबने स्वीकार भी कर लिया। आमंत्रित दसों राष्ट्राध्यक्ष आये। भारत की क्षमताओं से प्रभावित हुए और मित्रता के पुष्ट बंधन में बंध गये। मोदी उन्हें विश्वास दिलाने में सफल रहे हैं कि पड़ोसियों में अगर कोई उनके हितों की रक्षा में अनवरत सहायक हो सकता है तो वह भारत ही है। इस कूटनीतिक चाल से भारत ने चीन पर दोहरी मार की है एक ओर तो इन देशों में से कुछ को चीनी अजगर के जबड़ों से बचाकर अपने प्रभावक्षेत्र में अभिवृद्धि की है वहीं मेक इन इंडिया नीति के तहत एक बड़े बाजार का भी प्रबंध कर लिया है। यह चीन के आर्थिक साम्राज्य में एक सेंध के समान है। 
 इन परिस्थितियों में भी वे भारत और भारत उनकी ओर देख रहा है। इन दस राष्ट्राध्यक्षों की गणतन्त्र दिवस परेड में अतिथि के रूप में सहभागिता सोने में सुहागा साबित होगी। एक नये अध्याय का प्रारम्भ होगी। इसे मोदी की वैश्विक कूटनीति की समझ और सफलता के रूप में भी देखा जाना चाहिए।                 

राज सक्सेना, लेखक (अदिति)

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