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सूखा-बाढ़ से बचाव को अविरल बहें नदियां

Publish Date: March 20 2018 01:34:42pm

आर्यावर्त को सात नदियों का देश कहा गया है। माना जाता है कि इनमें गंगा, सिंधु, कावेरी, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी और सतलुज नदियां हैं। हकीकत यही है कि आज भी भारत का सांस्कृतिक सामाजिक और आर्थिक जीवन इन सात बड़ी नदियों पर ही निर्भर है। हजारों साल पहले ऋषि अगस्त गंगा का जल लेकर कावेरी तक पहुंचे थे और उत्तर से दक्षिण को सांस्कृतिक रूप से जोडऩे की पहल की थी। वस्तुत: ये नदियां हमारे जीवन की आधार तो हैं ही, हमारे राष्ट्र की एकात्मता की भी प्रतीक हैं- 'गंगा च जमुना चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदा सिंधु कावेरी जलेउस्मिन् सन्निधं कुरू।' लेकिन विडम्बना यह कि सिर्फ एक पीढ़ी में हमारी बारहमासी नदियां मौसमी हो गई है, कई छोटी नदियां पहले ही सूख चुकी है। 
सच यह है कि आजादी के बाद से तीन गुना बढ़ी हमारी जनसंख्या का दबाव नदियों पर आ गया है और उन्हें दबाव मुक्त करना वक्त की मांग है। इस संबंध में सद्गुरू जग्गी वासुदेव का ईशा फाउण्डेशन विशेष रूप से सक्रिय है। इस दिशा मेें सबसे ज्यादा जरूरत पौधारोपण करने की है और निजी खेत मालिकों से अपील की जा रही है कि वे नदी किनारे की जमीन पर बागवानी करें। ईशा फाउण्डेशन के परामर्श के बाद ही मध्य प्रदेश सरकार ने नर्मदा किनारे छ: करोड़ पौधे रोपने का अभियान चलाया। इसी के तहत महाराष्ट्र सरकार ने भी गोदावरी के तट पर 5० करोड़ पौधारोपण का लक्ष्य रखा है पर विडम्बना यह कि आज सरकारी पौधारोपण में नुकसान की दर नव्बे प्रतिशत से ज्यादा है और इसका सबसे बड़ा कारण उचित देखभाल का अभाव है जिस ओर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। नदियों को पुन: जीवित करने के लिए दोनों किनारों पर एक कि.मी. की चौड़ाई में और छोटी धाराओं पर आधा कि.मी. की चौड़ाई में पेड़ लगाने पर जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे नम् मिट्टी से नदियों को साल भर पानी मिलेगा और बाढ़, सूखा तथा मिट्टी के कटाव में भी कमी आएगी। चाहे शरीर हो या पृथ्वी, दोनों में ही पानी की मात्रा तीन चौथाई है और इसकी रक्षा करने से ही जीवन सुचारू रूप से चल सकता है।
एक दुर्भाग्य जनक पहलू यह भी कि बरसात के मौसम में वर्तमान दौर में देश में नदियां बाढ़ की चपेट में होती हैं। कुछ लोग इसे स्वाभाविक प्रक्रिया के बतौर देखते हैं लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि ज्यादातर बाढ़ पीडि़त इलाके बाढ़ आने से पहले सूखे से जूझ रहे होते हैं यानी या तो बाढ़ होगा या सूखा। साल के कई महीनों तक नदियां समुद्र तक नहीं पहुंचती, नतीजन समुद्र जमीन की ओर बढ़ता है जिससे तटीय जीवन खारे पानी के दुष्परिणाम झेलने के लिए मजबूर होता रहा है। कावेरी को तमिलनाडु का फूड बास्केट माना जाता है क्योंकि राज्य का दो-तिहाई अनाज इसी के किनारे उपजता है। तमिलनाडु में 39 प्रतिशत और कर्नाटक में 11 फीसदी सिंचित क्षेत्र कावेरी से पानी लेते हैं लेकिन आज हालात यह है कि कावेरी अपने स्रोत पर ही सूख गई है। विडम्बना यह कि 2०14 में भयानक सूखे को झेलने वाला तमिलनाडु अगले ही साल भीषण बाढ़ की चपेट में आ गया। 
सबसे बड़ी प्रायद्वीपीय नदी गोदावरी की स्थिति भी दयनीय है। नर्मदा की 1०1 सहायक नदियों में से 6० सहायक नदियां या तो मौसमी बन गई हैं या सूख गई हैं। नर्मदा पर डैम की श्रृंखला बनी हुई है जो अरब सागर तक जाती है जिसके कारण नर्मदा समुद्र तक नहीं पहुंच पाती जिससे समुद्र के आगे बढऩे के कारण खारापन बढ़ रहा है। मिट्टी का क्षरण हो रहा है और वृक्षों को भारी नुकसान हुआ है। इस वर्ष गुजरात के कई हिस्से सिर्फ तीन दिन में सूखे से बाढ़ की चपेट में आ गए, जब नर्मदा और बाकी नदियों का जल स्तर एकाएक बढ़ गया। विडम्बना यह कि जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ में डूबा था, उस समय गुजरात का चालीस फीसदी हिस्सा बारिश की कमी से जूझ रहा था। मई 2०17 में प्रयाग में लोग गंगा को पैदल पार कर रहे थे तो अगस्त माह में बाढ़ में मरने वालों का आंकड़ा रोज ही बढ़ता गया। यह स्थिति भारत की तकरीबन हर नदी में देखी जा सकती है। कुल मिलाकर कावेरी अपना चालीस फीसदी जल प्रवाह खो चुकी है, नर्मदा में पानी 6० फीसदी तक कम हो चुका है। गंगा का पानी भी 44 प्रतिशत कम हो चुका है। स्थिति की भयावहता यह है कि देश का 25 प्रतिशत हिस्सा तेजी से रेगिस्तान बनने की ओर अग्रसर है जिसका एकमेव समाधान वृक्षारोपण है। पेड़ की जड़ें मिट्टी को छेददार बना देती है जिससे मिट्टी बारिश के समय पानी को सोख लेती है और उसे थाम कर रखती है। मिट्टी में मौजूद यह जल साल भर धीरे-धीरे नदी में मिलता रहता है। इस तरह से अगर पेड़ नहीं होंगे तो मिट्टी बारिश के पानी को नहीं सोखेगी और बाढ़ आएगी। बारिश के बाद सूखा आएगा क्योंकि मिट्टी में नमी नहीं आएगी, इसलिए जल संकट से बचने का सबसे सरल और प्रभावशाली तरीका है-जलाशयों के आसपास पेड़ों की संख्या बढ़ाई जाय। 
     वस्तुत: नदियां हमारे अस्तित्व का ही दूसरा नाम हैं। उनके बहते रहने से ही सभ्यता पनपी। हकीकत यही है कि विश्व की सभी महान सभ्यताएं नदियों के किनारे ही पनपीं पर वर्तमान में नदी सूख रही है और सभ्यता ठहरी हुई है। उन बाधाओं को त्वरित हटाने की आवश्यकता है जो नदियों के प्रवाह में बाधा डालकर हमारी जीवन धारा को रोक रही हैं। नदियों को बनाने और उन्हें अविरल प्रवाहित करने के प्रयास में सद्गुरू जग्गी वासुदेव ने 3 सितंबर से लेकर 2 अक्टूबर तक कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक यात्र कर व्यापक स्तर पर जन जागरण फैलाया। इस बात को उन्होंने सिर्फ वाणी से नहीं, अपने कृत्यों से सार्थक कर दिखाया है। 
जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि जहां सरकारी पौधारोपण में कैजुअल्टी की दर नव्बे प्रतिशत से ज्यादा है, वहीं इनके ईशा फाउण्डेशन द्वारा तमिलनाडु में किए गए पौधारोपण की कैजुअल्टी दर मात्र बीस फीसदी है। नदियों को भारत की लाइफलाइन भी कहा जाता है। हर्ष का विषय यह है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय और ईशा फाउण्डेशन के बीच सहयोग का नया दौर शुरू हो रहा है। इस दिशा में डा० हर्षवर्धन के मंत्रालय में एक विशेष टीम कार्ययोजना पर काम कर रही है। सद्गुरू का कहना है कि अगर इस गंभीर स्थिति को बदलने के लिए अभी कदम नहीं उठाया तो फिर काफी देर हो जाएगी। 
निराश और हताश होने की आवश्यकता नहीं, कभी इग्लैण्ड की प्रमुख नदी टेम्स भी बहुत बदतर स्थिति में थी। लेकिन अब वह पूरी तरह स्वच्छ है और पर्यटकों के आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र है। नरेन्द्र मोदी ने भी गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए साबरमती नदी जो एक मृत नदी हो गई थी, उसे पुनर्जीवित कर उसे साफ-स्वच्छ और अविरल तो बना ही दिया, वर्तमान में वह पर्यटकों के आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र है। निस्संदेह इस दिशा में सूखे और बाढ़ से निपटने की दिशा में नदियों को जोडऩे की योजना भी महत्त्वपूर्ण है। इसके चलते जिन नदियों में बरसात में ज्यादा पानी के चलते व भयावह बाढें़ आती हैं, उनका पानी दूसरी नदियों एवं नहरों में डाला जा सकता है। इस योजना को 198० में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी ने तत्कालीन सिंचाई मंत्री डा० के.एल.राव के सुझाव पर राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी का गठन किया गया था लेकिन इस दिशा में कोई खास कार्य नहीं हो सका। 1999 में एन.डी.ए की सरकार के वक्त तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने गम्भीरता के साथ नदियों को जोडऩे के लिए राष्ट्रव्यापी परियोजना बनाने की दिशा में कार्य शुरू किया। इस तरह से हिमालय से निकलने वाली 14 नदियों और भारतीय प्रायद्वीप की 16 नदियों को जोडऩे का मसौदा तैयार कर लिया गया था जिसे 2०15 तक पूरा किया जाना था लेकिन वर्ष 2००9 में यू.पी.ए. सरकार ने अचानक ही यह घोषणा कर दी कि देश में नदियों को जोडऩे की योजना पर्यावरण, भौगोलिक एवं अन्य दृष्टियों से अनुपयुक्त ही नहीं घातक भी है। फलत: 'नदी-जोड़ोÓ योजना को रद्द किया जाता है। 
इसके पीछे वास्तविकता यह थी कि ऐसी दीर्घकालीन और दूरगामी हितों वाली योजना की तुलना में यू.पी.ए सरकार ने रोजगार गारंटी जैसी लोक लुभावन योजना को प्राथमिकता दी क्योंकि उनकी दृष्टि वोट की राजनीति को सार्थक करने में थी जबकि इसी अवधि में गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में साबरमती नदी को नर्मदा से जोड़कर इसकी उपयोगिता ओर महत्ता सिद्ध कर दी थी। 
इस देश में नर्मदा परियोजना के माध्यम से गुजरात भी 23 नदियां जुड़ गई, जो गुजरात को खासा लाभ पहुंचा रही है। गुजरात में इन नदियों को जोडऩे से सिर्फ नदियां ही नहीं, अन्य जलाशय, कुएं और ट्यूबवेल भी रिचार्ज रहते हैं। इसके चलते नर्मदा में जब कभी बाढ़ आती है तो वह पानी नहर के माध्यम से अन्य नदियों में डाल दिया जाता है। बेहतर बात यह कि मोदी सरकार ने नदियों को जोडऩे की योजना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए उस दिशा में प्रयास शुरू कर दिया है। उम्मीद है कि इसके चलते पूरे देश में देर-सबेर नदियों का अविरल प्रवाह देखने को मिल सकेगा। 

लेखक वीरेन्द्र सिंह परिहार(अदिति)
 

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