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झुकते नवजोत सिद्धू

Publish Date: March 21 2018 12:35:58pm

कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन के समापन से पहले पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने अपने ही अंदाज में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी तथा पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की तारीफ करते हुए कहा कि डा. मनमोहन सिंह ने मौन रहकर जो काम किया है शोर मचाने वाले वह सोच नहीं सकते। नवजोत सिंह सिद्धू ने आगे कहा कि डा. मनमोहन सिंह ने मौन रहकर जो काम किए वह शोर मचाकर और खुद का प्रचार कर नहीं किए जा सकते। सिद्धू ने कहा कि मैं आदर के साथ कहता हूं डा. मनमोहन सिंह सरदार हैं और बेहद असरदार हैं। उन्होंने मनमोहन सिंह से माफी मांगी और कहा कि मुझे आपको पहचानने में 10 वर्ष का समय लग गया, मैं उसके लिए माफी मांगता हूं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस में उनका आना 'घर वापसी है।' पूर्व क्रिकेटर ने श्रीमती सोनिया गांधी की तुलना अपनी मां से की और कहा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने असाधारण मजबूती और ऊंचाई हासिल की है। उन्होंने प्रियंका गांधी वाड्रा की भी तारीफ की और कहा कि उनसे मिलने के बाद उन्हें भरोसा हो गया था कि कांग्रेस देश का भविष्य तय करती रहेगी। कार्यकर्ताओं को पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बताते हुए उन्होंने कहा कि कार्यकर्ता ही पार्टी के ब्रांड हैं और वही कांग्रेस की आन-बान-शान हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी की वापसी की उम्मीद व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि उनका संकल्प है कि जब तक राहुल गांधी को लाल किले पर तिरंगा फहराते नहीं देखेंगे वह चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने कहा, 'यह मेरा प्रण है और यही मेरी सौगंध है।'
जब नवजोत सिंह सिद्धू भाजपा में थे तब उन्होंने राहुल गांधी और मनमोहन सिंह बारे टिप्पणी करते हुए इस प्रकार कहा था - 
४ कांग्रेस के पास नेतृत्व नहीं है, पप्पू प्रधानमंत्री है कांग्रेस का। मजबूर प्रधानमंत्री ईमानदार नहीं हो सकता।
४मुझे तो शक है कि मनमोहन सिंह सरदार भी है कि नहीं। सरदार हो, ना हो असरदार बिल्कुल नहीं है।
४कहते हैं मनमोहन अर्थशास्त्री है, मैं कहता हूं व्यर्थ शास्त्री है।
४महात्मा गांधी के भारत में छोड़े गए तीन बंदरों में मुंह पर हाथ रखने वाला मनमोहन सिंह है। मजबूर प्रधानमंत्री है, जो अपनी सरकार में ही होने वाले घोटालों को ना रोक पाया।
सिद्धू को शायद अपने उपरोक्त कहे शब्दों के लिए माफी न मांगनी पड़ती, अगर भारतीय जनता पार्टी नवजोत सिद्धू की भावनाओं का सम्मान करते हुए पंजाब की राजनीति में सिद्धू को उचित स्थान देती। भाजपा के नीतिकारों ने नवजोत सिद्ध्रू के प्रति जब उदासीन रवैया अपनाया तो नवजोत के पास भाजपा छोडऩे के सिवा कोई और विकल्प नहीं रह गया था। नवजोत सिद्धू ने भाजपा से बाहर निकल कर अलग पार्टी बनाने तथा लुधियाना के बैंस बंधुओं तथा आम आदमी पार्टी के साथ भी तालमेल बनाकर चलने की कोशिश की थी, लेकिन राजनीति की राहों में आ रही बाधाओं को देखते हुए उन्होंने कांग्रेस की ओर रुख कर लिया।
पंजाब की राजनीति को मद्देनजर रखें तो नवजोत सिद्ध्रू के पास अपना राजनीतिक संघर्ष जारी रखने के लिए अब कांग्रेस में शामिल होने के सिवा कोई और रास्ता था ही नहीं। पंजाब की राजनीति में रहकर स. प्रकाश सिंह बादल तथा उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल तथा बिक्रम मजीठिया को चुनौती देना कोई साधारण आदमी का काम नहीं, यह काम सिद्धू ने किया और अपने लक्ष्य को सामने रखते हुए सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थाम लिया।
कांग्रेस में अब सिद्धू ने अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए गांधी परिवार और मनमोहन सिंह सहित उन सबको तो खुश करना ही था जो कांग्रेस में उनकी निगाह में आज महत्व रखते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कहे अनुसार राजनीति की इन रपटीली राहों पर चलना कोई आसान कार्य नहीं है। नवजोत सिद्धू को अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए झुकना तो पडऩा ही था, लेकिन वह कुछ ज्यादा झुक गए और इसी कारण अब उन पर उंगली उठ रही है।
राहुल गांधी को लाल किले से तिरंगा फहराने के लिए शपथ लेने की बात कह सिद्धू अपनी मर्यादा से बाहर हो गए। भारत एक लोकतांत्रिक देश है इसमें कोई भी कुछ कह सकता है। इस अधिकार अनुसार सिद्धू को भी जो अच्छा लगा उसने कह दिया, लेकिन लोकतंत्र में होता तो वही है जो जनता चाहती है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर बिठाने के लिए सिद्धू को पंजाब की राजनीति में तथा विशेषतया बादल परिवार प्रति अपनाई नीति में बड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता होगी। केवल बादल व मजीठिया का विरोध कर तो सिद्धू राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचाने में सफल नहीं हो सकते।
हर इंसान की अपनी एक सीमा होती है और नवजोत सिद्धू की भी एक सीमा है। उससे आगे जाना इंसान के लिए मुश्किल होता है। सिद्धू की भाषा में सिद्धू को समझाना चाहता हूं। नवजोत सिद्धू ने भाजपा की बांस के साथ और राहुल गाधी की मीठे गन्ने के साथ तुलना की है। एक प्रसंग है कि जब नदी समुद्र से मिलने को पहुंचती है तो समुद्र पूछता है कि इतनी वस्तुएं अपने साथ लेकर आती हो कभी बांस साथ नहीं लाई। नदी उत्तर देती है मैं तो उन्हीं वस्तुओं को उखाड़ कर लाती हूं जो अकड़ कर खड़ी रहती हैं। बांस तो मेरे उफान को देखकर झुक जाता है नम्र हो जाता है। इसलिए उसे उखाड़ पाना मेरे लिए संभव नहीं। भाजपा ने जब राजनीतिक उफान का सामना अतीत में किया था तो वह नम्र हो गई थी और यही कारण है कि भाजपा 2 सांसदों से आज देश की सत्ता की यात्रा तय करने में सफल रही है। गांधी परिवार तथा कांग्रेसी नेता देश में आ रहे राजनीतिक तथा वैचारिक परिवर्तन को समझने में असफल हो रहे हैं और गन्ने की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं। यह बात 'आप' को तथा राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व को समझनी पड़ेगी।
'आप' अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए तो झुक गया लेकिन क्या 'आप' के साथी समय और परिस्थतियों को समझते हुए ऐसा कर पाएंगे?
 


- इरविन खन्ना, मुख्य संपादक,
दैनिक उत्तम हिन्दू।

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