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लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी

Publish Date: March 22 2018 02:33:18pm

कोई भी सभ्य समाज नियमों से ही चल सकता है। जनहितकारी नियमों को बनाने और उनके परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए शासन की आवश्यकता होती है। राजतंत्र, तानाशाही, धार्मिक सत्ता या लोकतंत्र, नामांकित जनप्रतिनिधियों जैसी विभिन्न शासन प्रणालियों में लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती है एवं उसे भी जन नेतृत्व करने का अधिकार होता है।
विधायिका के जनप्रतिनिधियों का चुनाव आम नागरिकों के सीधे मतदान के द्वारा किया जाता है किंतु हमारे देश में आजादी के बाद के अनुभव के आधार पर, मेरे मत में इस चुनाव के लिए पार्टीवाद तथा चुनावी जीत के बाद संसद एवं विधानसभाओं में पक्ष विपक्ष की राजनीति ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी के रूप में सामने आई है। 

सत्तापक्ष कितना भी अच्छा बजट बनाये या कोई अच्छे से अच्छा जनहितकारी कानून बनाये, विपक्ष उसका विरोध करता ही है। उसे जनविरोधी निरूपित करने के लिए तर्क कुतर्क करने में जरा भी पीछे नहीं रहता। ऐसा केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि वह विपक्ष में है। हमने देखा है कि वही विपक्षी दल जो विरोधी पार्टी के रूप में जिन बातों का सार्वजनिक विरोध करते नहीं थकता था, जब सत्ता में आया तो उन्होंने भी वही सब किया और इस बार पूर्व के सत्ताधारी दलों ने उन्हीं तथ्यों का पुरजोर विरोध किया जिनके कभी वे खुले समर्थन में थे। इसके लिये लच्छेदार शब्दों का मायाजाल फैलाया जाता  है।  ऐसा बार-बार लगातार हो रहा है, अर्थात हमारे लोकतंत्र में यह धारणा बन चुकी है कि विपक्षी दल को सत्ता पक्ष का विरोध करना ही चाहिये। शायद इसके लिये स्कूलों से ही  वादविवाद प्रतियोगिता की जो अवधारणा बच्चों के मन में अधिरोपित की जाती है, वही जिम्मेदार हो।

वास्तविकता यह होती है कि कोई भी सत्तारूढ़ दल सब कुछ सही या सब कुछ गलत नहीं करता। सच्चा  लोकतंत्र तो यह होता कि मुद्दे के आधार पर पार्टी निरपेक्ष वोटिंग होती, विषय की गुणवत्ता के आधार पर बहुमत से निर्णय लिया जाता पर ऐसा हो नहीं रहा है। 

अनुभवों से यह स्पष्ट होता है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में सुधार की व्यापक संभावना है। दलगत राजनैतिक धु्व्रीकरण एवं पक्ष विपक्ष से ऊपर उठकर मुद्दों पर आम सहमति या बहुमत पर आधारित निर्णय ही विधायिका का निर्णय हो, ऐसी सत्ताप्रणाली के विकास की जरूरत है। इसके लिए जनशिक्षा को बढ़ावा देना तथा आम आदमी की राजनैतिक उदासीनता को तोडऩे की आवश्यकता दिखती है।
जब ऐसी व्यवस्था लागू होगी, तब किसी मुद्दे पर कोई 51 प्रतिशत या अधिक जनप्रतिनिधि एक साथ होगें तथा किसी अन्य मुद्दे पर कोई अन्य दूसरे 51 प्रतिशत से ज्यादा जनप्रतिनिधि, जिनमें से कुछ पिछले मुद्दों पर भले ही विरोधी रहे हों, साथ होंगे तथा दोनों ही मुद्दे बहुमत के कारण प्रभावी रूप से कानून बनेंगे। 

क्या हम निहित स्वार्थो से ऊपर उठकर ऐसी आदर्श व्यवस्था की दिशा में बढ़ सकते है एवं संविधान में इस तरह के संशोधन कर सकते हैं। यह खुली बहस का एवं व्यापक जनचर्चा का विषय है जिस पर अखबारों, स्कूल कालेज, बार एसोसियेशन, व्यापारिक संघ, महिला मोर्चे, मजदूर संगठन आदि विभिन्न मंचों पर खुलकर चर्चा होने की जरूरत हैं।     

(युवराज) - विवेक रंजन श्रीवास्तव

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