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केंद्र में कैसे सरकार बना पायेगी कांग्रेस पार्टी?

Publish Date: March 27 2018 01:06:31pm

गत दिनों मुम्बई में कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी नेता सोनिया गांधी ने पत्रकारों से बात करते हुये कहा था कि 2019 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी एक बार फिर से केंद्र में सरकार बनाकर वापसी करेगी मगर सोनिया गांधी ने यह नहीं बताया कि कांग्रेस किस फार्मूले से भाजपा को लोकसभा चुनाव में हरा पायेगी। कांग्रेस की वर्तमान स्थिति देखें तो सोनिया गांधी की बात में दम कम ही नजर आता है। देश में आज कांग्रेस के स्थिति किसी से छुपी हुयी नहीं हैं। एक दो उपचुनाव जीतकर कांग्रेस का इतराना शायद ही किसी के गले उतर रहा हो। 
कांग्रेस आज पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, ओडि़सा, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, झाारखण्ड, त्रिपुरा, नागालैण्ड, अरूणाचल प्रदेश में बहुत ही कमजोर हालात में हैं। इसी कारण कांग्रेस छोटे-छोटे दलो के आगे समर्पण कर रही है। बंगाल में कांग्रेस कभी ममता बनर्जी के नेतृत्व में तो कभी वामपंथियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है। महाराष्ट्र में शरद पवार की पार्टी तो तमिलनाडु में द्रमुक, झारखण्ड में शिबू सोरेन के नेतृत्व में, बिहार में लालू यादव तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती के नेतृत्व में चुनाव लडऩा चाहती है। स्थिति यहां तक आ गयी है कि आज राजनीति के हाशिये पर पहुंच चुके अजीतसिंह जैसे नेता भी अपनी शर्तो पर कांग्रेस से तालमेल करना चाहते हैं। तेलंगाना में कांग्रेस के सहयोगी रहे असदुद्दीन ओवैसी ने भी भविष्य में कांग्रेस से किसी तरह का तालमेल न करने की घोषणा कर दी है। 
चुनावों में लगातार मिल रही हार के बाद भी कांग्रेस के बड़े नेता वस्तुस्थिति से अनजान बने हुये हैं। गुजरात में 25 साल से शासन कर रही भाजपा को सत्ता विरोधी लहर होते हुये भी कांग्रेस नहीं हरा पायी जबकि वहां चुनाव के लिये कांग्रेस ने पार्टी से बाहर के कुछ नये जातिवादी राजनीति करने वाले युवा नेताओं के इशारों पर पर चुनाव लड़ा था। राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद एकमात्र सत्ता के केंद्र बिन्दु बन चुके हैं। पूरी पार्टी पर उनका नियंत्रण तो पहले से ही था। राहुल गांधी द्वारा अब तक की जा रही राजनीति में परिपक्वता कम ही नजर आती है। गुजरात चुनावों में उनका मन्दिरों में जाना व कुर्ते के ऊपर से जनेऊ पहनकर प्रदर्शन करना लोगों के कम ही गले उतरा था। 
आज यूपीए गठबंधन में नाम मात्र के दल रह गये हैं। उनके साथी रहे शरद पवार अपनी अलग ही खिचड़ी पका रहें हैं। त्रिपुरा में भाजपा सरकार बनने से डरी हुयी ममता बनर्जी हर दिन नया रंग बदल रही है। कभी वो कांग्रेस के साथ दिखती हैं तो कभी पवार के। हाल ही में वो तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.चन्द्रशेखर राव के नये मोर्चे के साथ नजदीकियां दिखा रही थी। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में तो कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर बड़ी लड़ाई चल रही है। पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी कांग्रेस से गठबंधन करना चाहते हैं तो पूर्व महासचिव प्रकाश करात कांग्रेस से किसी भी तरह का रिश्ता नहीं रखना चाहते। इस बात को लेकर माकपा की सर्वोच्च बाडी में मतदान तक हो चुका है जिसमें कांग्रेस समर्थक कामरेडों को 31 व विरोधी खेमे को 55 मत मिले थे। इससे माकपा के कांग्रेस से गठबंधन के प्रयास पर रोक लग गयी लगती है।
कांग्रेस पार्टी को निर्धारित संख्या नहीं होने के कारण लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद नहीं मिला, वहीं राज्यसभा में में भी सीटों की संख्या में भाजपा, कांग्रेस से आगे निकल चुकी है। आज कांग्रेस में वरिष्ठ नेता मुख्यधारा से कट गये हैं। छुटभैय्ये नेता ज्यादा छाये हुये हैं जिनके मनमाने बयानों के कारण पार्टी को अक्सर खामियाजा भुगतना पड़ता है। आज कांग्रेस सिर्फ गठबंधन के सहारे राजनीति करना चाहती है। ऐसे में कांग्रेस के पारम्परिक मतदाता अन्य दलों से जुडऩे लगे हैं। कांग्रेस संगठन में जनाधार वाले कम व कागजी नेता ज्यादा काबिज होने से संगठन लगातार कमजोर होता जा रहा है।
अपनी पारिवारिक राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाते हुये राहुल गाांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष तो बन गये मगर 1952 के बाद सबसे बुरे दौर में गुजर रही कांग्रेस पार्टी के अच्छे दिन कैसे लाये जा सकते हैं, इस बात पर अभी गंभीर मंथन करना बाकी है। कांग्रेस संगठन में वार्ड पंच के चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले लोगों को उनकी क्षमतानुसार संगठन में पदाधिकारी बनाना चाहिये। धनबल से पार्टी पदाधिकारी बने हुये सत्ता के दलालों से पार्टी को मुक्त करवाना होगा। जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करना होगा। पार्टी को परिवारवाद, रिश्तेदारी प्रथा से कुछ समय के लिये दूर करना होगा तभी कांग्रेस पार्टी की वापसी की कुछ संभावना बन सकती है। 
लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद  चुनावों में जनता से जुड़े लोगों को प्रत्याशी बनाने से लोगों को पार्टी में हो रहा बदलाव नजर आ सकता है। बदलाव होता नजर आने से ही कांग्रेस अपना खोया जनाधार पुन: प्राप्त कर सकती है। कांग्रेस को गठबंधन की बजाय अपना खुद का जनाधार बढ़ाने का प्रयास करना चाहिये। ऐसा नहीं होने पर तो शायद ही सोनिया गांधी का सपना 2019 में पूरा होता लगता है।  

लेखकरमेश सर्राफ धमोरा 
 

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