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बढ़ती बेरोजगारी का सत्य

Publish Date: March 28 2018 02:16:48pm

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार बेरोजग़ारी की बढ़ती दर के मामले में भारत 8.0 प्रतिशत की दर के साथ एशिया में पहले स्थान पर पहुँच गया है। उप-राष्ट्रपति के पद को शोभायमान कर रहे वेंकैया नायडू ने हालिया दिनों में बयान दिया था कि सभी को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती व स्वरोजग़ार भी काम ही है तथा साथ ही कह दिया कि चुनाव में हर पार्टी रोजग़ार देने जैसे वायदे कर ही दिया करती है। तो कहने का मतलब भाजपा ने भी तो इसी गौरवशाली परम्परा को ही आगे बढ़ाया है! 'न्यूज़ रूम' से लेकर राज्यसभा और वहाँ से लेकर नेताओं-मन्त्रियों और सरकारी दरबारों तक हर जगह पकौड़े का ख़ूब महत्व गाया जा रहा है। आप बेशक मशहूर शायर दुष्यन्त कुमार के विचारों से इत्तेफ़ाक न रखते हों, पर उनका एक शेर हुक्मरानों की अच्छी कलई खोलता है। शेर है- 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर घर के लिए / कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए'। हालिया अख़बारी ख़बरों के हवाले से यह बात सामने आयी है कि केन्द्र में बैठी भाजपा नीत राजग सरकार पाँच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त करने की ठान चुकी है। केन्द्र सरकार के द्वारा कुल 36 लाख 33 हज़ार 935 पदों में से 4 लाख 12 हज़ार 752 पड़ ख़ाली पड़े हैं तथा इनमें से कऱीब आधे पद ख़ाली हैं। कहाँ तो चुनाव से पहले करोड़ों रोजग़ार देने के ढोल बजाए जा रहे थे कहाँ अब ख़ाली पदों पर काबिल युवाओं को नियुक्त करने की बजाय पदों को ही समाप्त करने के लिए कमर कस ली गयी है। 
देश के प्रधानमन्त्री से लेकर सरकार के आला मन्त्रीगण बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि 'शाम तक 200 रुपये के पकौड़े बेचना भी काफ़ी बेहतर रोजग़ार हैÓ और इसके लिए भी सरकार बहादुर अपनी पीठ थपथपा रही है! अब 'मरता क्या न करताÓ अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फ़ाके करके और किसी-न-किसी तरह छोटे-मोटे काम-धन्धे करके जैसे-तैसे लोग गुजऱ-बसर कर रहे हैं, किन्तु आम जन की हालत का मज़ाक़ उड़ाते हुए सत्ताधारियों द्वारा कहा जा रहा है कि 'स्वरोजग़ार भी तो नौकरी ही है। नौकरी के लिए सरकार का मुँह ताकने की क्या ज़रूरत है?' लेकिन बजट बनाते समय करों का बोझ जब जनता की कमर पर लादना हो तब सरकार को क़तई अहसास नहीं होता कि यह जो जनता की जेब से एक-एक दमड़ी निचोड़ी जा रही है, इसके बदले में जनता को वापस कुछ देने का भी फज़ऱ् बनता है!
आम मेहनतकश लोग व्यवस्था का बोझ भी उठायें और कुछ माँग भी न करें! यह कहाँ का न्याय है? आज देश एक अभूतपूर्व दौर से गुजऱ रहा है। शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजग़ार के हालात भयंकर बुरे हैं, किन्तु दूसरी ओर साम्प्रदायिक और जातीय मतभेदों को बढ़ावा दिया जा रहा है। गुजरात चुनाव प्रचार में सबके सामने आ गया है कि विकास व गुजरात मॉडल के नाम पर झूठ बोलकर लोगों को अब नहीं ठगा जा सकता, इसलिए वोट की राजनीति फिर से धर्म पर केन्द्रित हो चुकी है। इसलिए अब यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि 2019 में चुनावी प्रचार का ऊँट किस करवट बैठने वाला है। 
देश में लम्बे समय से बेरोजग़ारी का संकट बढ़ता ही चला जा रहा है। तमाम सरकारें आयीं और चली गयीं, किन्तु आबादी के अनुपात में रोजग़ार के अवसर बढऩा तो दूर उल्टा घटते चले गये। सरकारी नौकरियाँ नाममात्र के लिए निकल रही हैं, सार्वजनिक क्षेत्रों की बर्बादी जारी है। केन्द्र और राज्यों के स्तर पर लाखों-लाख पद ख़ाली पड़े हैं। भर्तियों को लटकाकर रखा जाता है, सरकारें भर्तियों की परीक्षाएँ करने के बाद भी उत्तीर्ण उम्मीदवारों को नियुक्तियाँ नहीं देतीं! 
रोजग़ारहीनता के मामले में आम जनता कम-से-कम स्वयं को तो कोसना बन्द ही कर दे! बहुत समय नहीं हुआ, जब राज्यसभा ने माना था कि कुल 4,20,547 पद तो अकेले केन्द्र में ख़ाली पड़े हैं। देशभर में प्राइमरी-अपर-प्राइमरी अध्यापकों के कऱीब 10 लाख पद, पुलिस विभाग में 5 लाख 49 हज़ार 25 पद, 47 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हज़ार पद, 363 राज्य विश्वविद्यालयों में 63 हज़ार पद रिक्त हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार चलने पर तो देश भर में 5 लाख डॉक्टरों की तुरन्त ज़रूरत है, इन मानकों को पूरा करना तो दूर की कौड़ी है, यदि 36 हज़ार सरकारी अस्पतालों के 2 लाख से ज़्यादा ख़ाली पड़े डॉक्टरों के पदों पर नियुक्तियाँ कर दी जायें तो गनीमत हो। केन्द्र और राज्यों के स्तर पर कऱीब बीसियों लाख पद ख़ाली हैं। एक ओर पाखण्डी गोबर-गणेशों को भारत विश्वगुरू बनता दिख रहा है, दूसरी ओर यहाँ शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों में आधे से अधिक पद तो ख़ाली ही पड़े हैं! भाजपा के दिग्गजों ने कभी एक करोड़ तो कभी दो करोड़ रोजग़ार देने के चुनावी जुमले उछाले थे, किन्तु साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद अधिकारिक श्रम ब्यूरो के आँकड़ों के मुताबिक़ सिफऱ् 5 लाख नयी नौकरियों को जोड़ा गया है। वर्ष 2012 में भारत की बेरोजग़ारी दर 3.8 प्रतिशत थी जो 2015-16 में 5 प्रतिशत पहुँच गयी। श्रम ब्यूरो सर्वेक्षण 2013-14 और 2015-16 के बीच 37.4 लाख नौकरियों की कमी दर्शाता है। रोजग़ार में कमी 53 लाख तक पहुँच गयी है। केन्द्रीय श्रम मन्त्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2015 और 2016 में क्रमश: 1.55 लाख और 2.31 लाख (पिछले आठ सालों में सबसे कम) नयी नौकरियाँ सृजित हुईं। 1991 में लागू की गयी उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने रोजग़ार पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया था। मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2009 में 10 लाख नयी नौकरियाँ सृजित हुई थीं, जोकि 'ऊँट के मुँह में जीराÓ थीं किन्तु इसके बाद तो हालत बद से बदतर होती चली गयी। सर्वे बताते हैं कि मोदी राज में संगठित-असंगठित क्षेत्र में 2 करोड़ रोजग़ार छीने गये हैं। सेवा आयोग ने 2013 में राज्य स्तर पर इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिए फ़ॉर्म निकाले थे, जैसे-तैसे परीक्षा 2015 में हो गयी किन्तु सरकार बदल गयी पर परीक्षा परिणाम के इन्तज़ार में अभ्यर्थियों की उम्र पाँच बरस बढ़ चुकी है।
क्या किया जाये?
जरा दिमाग पर जोर डालकर सोचने पर हम समझ सकते हैं कि सभी को रोजगार देने के लिए तीन चीजें चाहिए (1) काम करने योग्य हाथ (2) विकास की सम्भावनाएँ (3) प्राकृतिक संसाधन। क्या हमारे यहाँ इन तीनों चीज़ों की कमी है? अब सवाल सरकारों की नीयत पर उठता है। पूँजीपरस्त और जनविरोधी नीतियों को लागू करने में कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम रंगों-झण्डों वाले चुनावी दल एकमत हैं, विरोध की नौटंकी केवल विपक्ष में बैठकर ही की जाती है! धर्म, जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली चुनावी पार्टियाँ केवल अपनी गोटियाँ लाल करने के लिए हमें आपस में बाँटती हैं। ये किसी की सगी नहीं, अन्यथा ये ख़ाली पदों को भरतीं और शिक्षा-रोजग़ार-स्वास्थ्य के लिए नीतियाँ बनातीं। 
असल बात यह है कि मौजूदा तमाम चुनावी पार्टियों का मक़सद ही आम जनता को ठगना है। और आज भाजपा ही पूँजीपतियों को अधिक रास आ रही है। यह अनायास ही नहीं है कि अकेली भाजपा को ही कुल कॉर्पोरेट का 2012-13 में 89 प्रतिशत और 2015-16 में 87 प्रतिशत चन्दा प्राप्त हुआ है। अब आप ही सोचिए कि इन्हें आपकी फि़क्र होगी या फिर अपने आकाओं की?  हर अँधेरे दौर की तरह मौजूदा दौर भी बीत जाना निश्चित है, यह आम जन की नियति नहीं है। किन्तु यह भी उतना ही सच है कि यह दौर भी अपने आप नहीं बीतेगा बल्कि जन आन्दोलनों का दबाव ही सत्ताधारियों के घुटने टिका सकता है। इस या उस चुनावी मदारी की पूँछ पकडऩे की बजाय जन आन्दोलनों के द्वारा ही आम जन अपने हक़-अधिकार हासिल कर सकते हैं। सरकारी अन्याय और अन्धेरगर्दी के खि़लाफ़ आवाज़ उठानी होगी। 
धर्म-जाति-आरक्षण के नाम पर किये जा रहे बँटवारे की राजनीति को समझना होगा। केवल और केवल अपनी एकजुटता के बल पर शिक्षा-स्वास्थ्य-रोजग़ार से जुड़े अपने हक़-अधिकार हासिल किये जा सकते हैं। छात्रों-युवाओं और मेहनतकशों को इस बात को गहराई से समझना होगा।  इन बातों को जितना जल्दी समझ लिया जाये उतना बेहतर होगा वरना आने वालीं पीढिय़ों के सामने जवाब देने के लिए हमारे पास शब्द नहीं होंगे। 

लेखक इन्द्रजीत (विनायक फीचर्स)

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