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सीलिंग का कहर बरपा

Publish Date: April 03 2018 01:52:05pm

देश की राजधानी दिल्ली में जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से बुनियादी सुविधाओं को जुटाना कोई आसान काम नहीं है। इस आबादी में देश के अन्य राज्यों से आए लोगों की भी एक बड़ी संख्या है। आबादी को रहने के लिए घर चाहिए, रोजगार चाहिए, बिजली-पानी चाहिए, शैक्षिक, स्वास्थ्य व परिवहन की सुविधाएं चाहिएं यानी घर-परिवार के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं चाहिएं। जनता को ये सब सुविधाएं मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सरकार की है, प्रशासन की है। 
किसी भी शहर के सतत योजनाबद्ध विकास का मार्गदर्शन करने के लिए एक योजना होती है। इस मास्टर प्लान को बनाते वक्त इस बात का ख्याल रखा जाता है कि जिस समयावधि के लिए यह बनाया जा रहा है, उस वक्त शहर की आबादी कितनी होगी और उसकी जरूरतें क्या-क्या होंगी।  मास्टर प्लान 2021 भी एक ऐसी ही योजना है, जिसके मुताबिक दिल्ली को एक ऐसा विश्वस्तरीय शहर बनाना है जिसमें यहां के बाशिन्दों को तमाम सुविधाएं मुहैय्या हो सकें।
गौरतलब है कि देश की राजधानी दिल्ली पिछले दिसम्बर माह से सीलिंग के साये में है। सुप्रीम कोर्ट की मानिटरिंग कमेटी के आदेश पर राजधानी में सीलिंग का काम चल रहा है। इस सीलिंग की वजह यही मास्टर प्लान 2021 है।  यह मास्टर प्लान साल 2001 में आ जाना चाहिए था लेकिन वह छह साल बाद 2007 में आया। दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबिक हर पांच साल के बाद इस प्लान की समीक्षा की जानी थी। इसके तहत साल 2012 के शुरू माह जनवरी में इसमें बदलाव के लिए जनता से सुझाव मांगे गए थे। इस सुझावों के हिसाब से मैनेजमेंट एक्शन कमेटी का भी गठन किया गया। सुझावों को अमल में लाने के लिहाज से इनका विश्लेषण किया गया। इसी के आधार पर मास्टर प्लान में बदलाव किया गया। इसे दिल्ली विकास प्राधिकरण ने पास भी कर दिया। दिल्ली विकास प्राधिकरण के इस मास्टर प्लान में 18 क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है जिनमें भू-नीति, सार्वजनिक भागीदारी और योजना के कार्यान्वयन, पुनर्विकास, आश्रय, गरीबों के लिए आवास, पर्यावरण, अनधिकृत कालोनियों, मिश्रित उपयोग विकास, व्यापार और वाणिज्य, अनौपचारिक क्षेत्र, उद्योग, विरासत का संरक्षण, परिवहन, स्वास्थ्य, शैक्षणिक व खेल सुविधाएं, आपदा प्रबंधन आदि शामिल हैं।
दिल्ली विकास प्राधिकरण के मुताबिक साल 2021 तक दिल्ली की आबादी 225 लाख तक पहुंच जाएगी।  मास्टर प्लान के हिसाब से इसे 220 लाख से कम रखने की कोशिश की जाएगी। यह योजना इस आबादी को घर बनाने के लिए  एक तीन-आयामी रणनीति को अपनाने पर जोर देती है। इसके तहत लोगों को उपनगरों में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित करना, शहर की सीमा का विस्तार और मौजूदा क्षेत्रों की आबादी-धारण क्षमता को बढ़ाकर उनका पुनर्विकास किया जाएगा। 
इसके अलावा सरकार के मालिकाना हक वाली खाली जमीनों का इस्तेमाल किया जाएगा। साल साल 2०21 तक 6० साल से ज्यादा उम्र के लोगों की तादाद 24 लाख से ज्यादा होने की उम्मीद है और वह कुल आबादी का 10.7 फीसद हिस्सा होगा।  ऐसे में उनके लिए भी विशेष सुविधाओं की जरूरत होगी।  गौरतलब है कि जब 2००5 में सार्वजनिक सुझावों को आमंत्रित करने के लिए ड्राफ्ट को अधिसूचित किया गया था, तब उसे सात हजार आपत्तियां और सुझाव मिले थे जबकि 611 लोगों और संगठनों को इस पर व्यक्तिगत सुनवाई दी गई थी। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने साल 2००7 में इस योजना के मौजूदा रूप को मंजूरी दे दी थी।  इलाकों के विकास के लिए नियम शहर के अन्य इलाकों से अलग होंगे। इसके मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कोई नया केंद्रीय और सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम कार्यालय नहीं बनाया जाएगा। दिल्ली में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या आबादी में बढ़ोत्तरी, शहरीकरण, जीवन शैली और उपभोग के तरीके और यहां से निकलने वाले कचरे से निपटने के लिए लैंडफिल की स्थापना का प्रस्ताव भी किया गया है। आवास के लिए बने इलाकों में गैर-रिहायशी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए, योजनाओं में एक मिश्रित उपयोग नीति की परिकल्पना की गई है जो दिल्ली को बेहतर शहर बनाने में मदद करेगी हालांकि लुटियन के बंगला जोन, सिविल लाइंस बंगला जोन, सरकारी आवास, सार्वजनिक और निजी एजेंसियों की संस्थागत, स्टाफ आवास और विरासत संरक्षण समिति द्वारा सूचीबद्ध इमारतों, परिसरों में मिश्रित उपयोग की अनुमति नहीं दी गई है।
दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का आरोप है कि सीलिंग अभियान के जरिये भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के लिए रास्ता बनाना चाहती है।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का कहना है कि दिल्ली में सीलिंग के मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का नाटक बंद कर देना चाहिए। भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी की मिलीभगत और फर्जी लड़ाई में व्यापारियों को बहुत नुकसान हो रहा है। दोनों पार्टियों को राजनीतिक रोटी सेंकने के बजाय इस समस्या का जल्द से जल्द समाधान निकालना चाहिए।
केंद्रीय आवास एवं शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी का कहना है कि सीलिंग का हल ढूंढ लिया गया है। इस बाबत जल्द ही सर्वोच्च न्यायालय में एक हल्फनामा दाखिल किया जाएगा। इसमें मास्टर प्लान में संशोधन के कानूनी अधिकारों का का इस्तेमाल किया गया है। अगर सर्वोच्च न्यायालय मान जाता है तो सीलिंग का मसला हल हो सकता है। इसके साथ ही दिल्ली सरकार द्वारा मिक्स लैंड यूज वाली 351 सड़कें भी जल्द ही अधिसूचित कर दी जाएंगी। खैर, सीलिंग रोकने की नूराकुश्ती जारी है लेकिन यह इतना आसान नहीं है।
बहरहाल, सीलिंग की वजह से काराबोर ठप्प होकर रह गया है। बड़े व्यापारियों का तो नुकसान हो ही रहा है, वहीं सड़क के किनारे बैठकर सामान बेचने वाले लोग भी परेशान हैं। दुकानों पर काम करने वाले लोग भी खाली घूम रहे हैं। उनके समक्ष रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है। कंफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स ने दिल्ली बाजार बंद का आह्वान किया था। इसके अलावा एक अन्य कारोबारी संगठन चैंबर आफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने भी अलग से बाजार बंद की घोषणा की थी। 
काबिले-गौर है कि व्यापारियों के सामने सीलिंग की आज जो सबसे बड़ी समस्या पैदा हो गई है, उसके लिए पूरी तरह से तत्कालीन सरकारें ही जिम्मेदार हैं। साल 1962 में राजधानी के लिए एक मास्टर प्लान बनाया गया था लेकिन उस पर सहे तरीके से अमल नहीं किया गया। इसलिए लोगों को जहां जगह मिली, वे वहां मकान और दुकानें बनाते चले गए। यह काम कोई एक दिन में तो हुआ नहीं है, इसमें बरसों लग गए। दिल्ली नगर निगम और दिल्ली विकास प्राधिकरण की नाकामी की वजह से उतने व्यापारिक परिसर नहीं बन पाए, जितने बनने चाहिए थे। मास्टर प्लान 1962 पूरा हो नहीं पाया था कि उसके बाद मास्टर प्लान 1981 आ गया जो नौ साल बाद 199० में अमल में आया। फिर एक लम्बी जद्दो-जहद के बाद  वर्ष 2००7 में मास्टर प्लान 1921 आया। आज इसी मास्टर प्लान की वजह से दिल्ली के व्यापारिक प्रतिष्ठान सीलिंग के साये में हैं।     
    (युवराज) लेखक फिरदौस खान
 

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