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हिंसक विरोध

Publish Date: April 04 2018 01:26:07pm

एससी/एसटी एक्ट में संशोधन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में सोमवार को दलितों का भारत बंद के दौरान प्रदर्शन उत्पात में बदल गया। देशभर में जमकर हिंसा हुई, जिसमें 11 से अधिक लोगों की मौत हो गई। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों में सौ से ज्यादा लोग घायल हुए। आंदोलन से मध्य प्रदेश, यूपी, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, गुजरात, झारखंड व महाराष्ट्र सबसे ज्यादा प्रभावित रहे। मध्य प्रदेश के ग्वालियर और भिंड में दो-दो, मुरैना व डबरा में एक-एक, यूपी के मुजफ्फरनगर और फिरोजाबाद में एक-एक तथा राजस्थान के अलवर में एक व्यक्ति की मौत हो गई। यूपी के बिजनौर में जाम में फंसी एंबुलेंस में एक मरीज की मौत हो गई। इसी प्रकार बिहार के हाजीपुर में एंबुलैंस का रास्ता रोकने से नवजात ने दम तोड़ दिया। इन राज्यों में परिवहन व संचार व्यवस्था पूरी तरह ठप रही। लगभग 100 ट्रेनों का परिचालन प्रभावित रहा। आंदोलनकारियों ने बड़ी संख्या में वाहनों को आग के हवाले कर दिया। हालात बेकाबू होते देख ग्वालियर, मुरैना और भिंड के कई इलाकों में कफ्र्यू लगा दिया और सेना बुला ली। राजस्थान के सवाईमाधोपुर गंगापुर सिटी में भी कफ्र्यू लगाया गया। केंद्र ने यूपी और मध्य प्रदेश के लिए दंगा-रोधी 800 पुलिस जवानों को तैनात किया। रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) की दो कंपनियां मेरठ और एक-एक कंपनी आगरा तथा हापुड़ भेजी गई।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार की सोमवार को ही एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी थी। सोमवार सुबह ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की एक अन्य याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। केंद्र ने पुनर्विचार याचिका में कहा है कि 20 मार्च को आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में कानून के कई कड़े प्रावधानों को बदलने के कारण देश की बड़ी एससी/एसटी आबादी प्रभावित हो रही है। केंद्र ने कहा कि यह फैसला उस नीति के विपरीत है, जो उत्पीडऩ की रोकथाम के लिए 1989 में बने अधिनियम में है। सरकार ने खुली अदालत में सुनवाई की आवश्यकता जताते हुए मौखिक बहस को कोर्ट की सहायता के लिए जरूरी बताया। दलितों की स्थिति अब भी कमजोर होने की बात कही। सरकार के अलावा भी एससी/एसटी संगठनों की अखिल भारतीय समिति ने इस याचिका में देश में हिंसा होने की बात कहते हुए तत्काल सुनवाई का आग्रह किया था, लेकिन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने प्रक्रिया के तहत ही सुनवाई की बात कही।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि मोदी सरकार की उपरोक्त कानून को लेकर न्यायालय द्वारा किए बदलाव में कोई भूमिका नहीं थी। कानून अपना काम जैसे पहले करता चला आ रहा था वैसे ही कर रहा है और करता भी रहेगा। कानून को लेकर जब व्यक्ति भावनात्मक होकर सोचता है तब उसका लाभ राजनीतिक दल लेने लगते हैं। भारत बंद का आह्वान विभिन्न दलित संगठनों ने किया था, लेकिन पर्दे के पीछे सक्रिय हो गये वह सभी राजनीतिक दल और संगठन जिनका लक्ष्य नरेन्द्र मोदी सरकार का विरोध करना ही था। 2019 के लोकसभा चुनावों को मद्देन•ार रखते हुए कांग्रेस, बसपा, सपा सहित छोटे-बड़े संगठन जो अपने को दलितों का हितैषी होने का दावा करते हैं, सक्रिय हो गये और अपने अहम को शांत करने हेतु हिंसा पर उतारू हो गए। हिंसा में आगजनी के साथ-साथ तोडफ़ोड़ और बंद के कारण करोड़ों-अरबों रुपए के नुकसान के साथ-साथ 11 से अधिक लोगों की जान भी गई।
बंद के दौरान हिंसा फैलना कोई पहली बार नहीं हुआ, देश में ऐसे बंद के दौरान हमेशा तनाव व तोडफ़ोड़ की घटनाएं आम हो गई हैं। पिछले दिनों कश्मीर में आतंकवादियों के एंकांऊटर में मारे जाने के बाद घाटी में बंद के दौरान हिंसा व तोडफ़ोड़ के समाचार मिले थे। पंजाब में पंजाबी भाषा को उचित स्थान न मिलने को लेकर तोडफ़ोड़ का होना, दिल्ली में सीलिंग के विरोध में व्यापारियों का बंद और उसमें हिंसक घटनाओं का होना दर्शाता है कि जन साधारण की भावनाओं को भड़काने के प्रत्येक अवसर को राजनीतिक दल अपने हाथ से जाने नहीं देते।
भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसमें प्रत्येक को अपनी बात कहने और विरोध करने व रोष प्रकट करने का अधिकार है, लेकिन इसके साथ एक कत्र्तव्य भी जुड़ा है कि दूसरे का नुकसान न हो। हम अधिकार की बात करते हैं लेकिन कत्र्तव्य निभाने को तैयार नहीं है। यह सोच ही आज समस्या का कारण बनी हुई है।
न्यायालय द्वारा लिया निर्णय हमेशा एक के पक्ष और दूसरे के विरुद्ध जाता है। अगर हर निर्णय से प्रभावित लोग या संगठन अपना विरोध या रोष प्रकट करने के लिए कानून को ही अपने हाथ में लेने लगे तो देश में अराजकता फैलते देर नहीं लगेगी। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अतीत में भी एक से एक बढ़कर ऐतिहासिक फैसला लिया है जिससे देश की दशा और दिशा दोनों पर एक सकारात्मक छाप पड़ी है। प्रत्येक फैसले से पहले दोनों पक्ष अपनी बात रखते हैं। तथ्यों के आधार पर न्यायालय फैसला देता है। ठीक उसी तरह एससी/एसटी एक्ट के मामले में भी तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने अपना फैसला दिया था। केंद्र सरकार ने दलित व पिछड़े समाज की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही न्यायालय में रिव्यू पिटीशन डाली थी जो न्यायालय ने यह कहकर खारिज कर दी कि उसने केवल एक बेगुनाह के हित को सुरक्षित रखने हेतु ही कदम उठाए है, एक्ट में कोई तबदीली नहीं की है।
न्यायालय तो प्रत्येक निर्णय तथ्यों के आधार पर ही करता है भावना को न्यायालय तरजीह नहीं देता। बहुमत हिन्दू समाज हो या कोई भी अल्पमत समाज हो उनसे संबंधित मामलों में भी तथ्यों को और समाज व देशहित को प्राथमिकता देते हुए न्यायालय अपना निर्णय देता है। उस निर्णय का विरोध अपील द्वारा करने का सबको अधिकार है, उस अधिकार को छोड़ लाठी के बल पर न्याय लेने का प्रयास तो अलोकतंत्रीय ही है। हिंसक विरोध को लोकतंत्र में उचित करार नहीं दिया जा सकता।
भारत बंद के दौरान जो हिंसा हुई उसका राजनीतिक लाभ किस राजनैतिक दल को मिलेगा यह तो आने वाले चुनाव व समय ही बतायेंगे, लेकिन आज तो यह ही कहा जा सकता है कि केवल राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करना गलत है। हिंसा का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है, देशहित तो कानून के दायरे में रहकर अपनी बात कहने में ही है।
हिंसक विरोध में जिन लोगों की जानें गई हैं उनके परिवारों को और जिनकी दुकानें व घर तथा वाहन अग्नि भेंट चढ़े हैं उन्हें तत्काल राहत मिलनी चाहिए। जन साधारण को भी समझना होगा कि हिंसा की राह पर चलकर वह अपना व देश का ही नुकसान कर रहे हैं।
उपरोक्त हिंसक विरोध से एक बात तो स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी और मोदी सरकार अब राजनीतिक दलों के निशाने पर है। मोदी विरोधी अब कमर से नीचे वार करने से भी नहीं हिचकिचा रहे, इस बात से मोदी विरोधियों की हताशा को समझा जा सकता है।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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