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कृषि संकट का दीर्घकालिक समाधान खोजे सरकार

Publish Date: April 04 2018 01:29:05pm

देश के किसान आंदोलित हैं। इस बार देश की वित्तीय राजधानी मुंबई ने फिलहाल किसानों और आदिवासियों की मांगों की धमक महसूस की। अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में छह मार्च को हजारों की तादाद में किसान महाराष्ट्र के नासिक और आसपास के इलाकों से निकले और दो सौ किलोमीटर पैदल चलकर मुंबई पहुंचे थे। 
महाराष्ट्र में बीती 6 मार्च से किसान आंदोलित और लामबंद हुए थे। एक अनुशासित ताकत के तौर पर पैदल चलते हुए उन्होंने 6 दिनों में 180 किलोमीटर की यात्र की। ऐसा नहीं है कि राजनीतिक और सत्तारूढ़ ताकतों ने उन्हें तोडऩे और बिखेरने की कोशिश नहीं की होगी। जब ऐसा नहीं हो पाया, तो महाराष्ट्र सरकार बात करने को तैयार हुई। वार्ता और आश्वासन के बाद किसान आंदोलन समाप्त हो गया और करीब 35,000 किसान अपने घरों को वापिस लौट गए। कई राज्यों में किसान बेहतर मूल्य तथा कर्जमाफी के लिए आवाज उठा रहे हैं। 
इन सबके बीच अहम सवाल यह है कि आखिर वो क्या कारण हैं कि देश के किसान बार-बार आंदोलन की राह पर चलने को मजबूर हो जाते हैं? क्या सरकार के पास धरतीपुत्रों की समस्याओं के लिये कोई प्रभावी कार्ययोजना नहीं है? क्या सरकार किसान हितैषी नीतियां बना पाने में असफल है? क्या सरकार के पास खेती-किसानी से जुड़ी परेशानियों के हल के लिये कोई व्यापक और दूरगामी दृष्टिकोण नहीं है? आखिरकर क्यों धरतीपुत्र व्यवस्था जनित समस्याओं से तंग आकर नाराज होकर सड़कों पर उतरने पर विवश हो जाते हैं?  
इस बार का राष्ट्रीय बजट तो बुनियादी तौर पर 'किसान बजट' करार दिया गया है। उसमें किसानों के कल्याण के लिए 11 लाख करोड़ रुपए का फंड बनाया गया है। फसल की लागत की डेढ़ गुना कीमत किसान को मिलेगी। राष्ट्रीय बांस योजना भी तय की गई है। बुनियादी वायदा और लक्ष्य 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का है। ऐसे आश्वासनों के बावजूद किसान आंदोलित और आक्रोशित क्यों है? 
धरतीपुत्रों की समस्याओं को आंकड़ों के आलोक में देखें तो देश के 17 राज्यों में किसान परिवार की औसत आय 2०,००० रुपए है। करीब 4० फीसदी किसानों को साहूकारों, महाजनों से कर्ज लेना पड़ता है और उन्हें 24 से 50 फीसदी तक ब्याज दर चुकानी पड़ती है। देश के औसत किसान परिवार पर 47,000 रुपए का कर्ज है। कर्जदार किसान परिवारों की संख्या 48 फीसदी से बढ़कर करीब 52 फीसदी हो गई है। सरकारी कर्ज मिलने की मुश्किलों के कारण अक्सर उन्हें भारी सूद पर महाजनों से उधार लेना पड़ता है। किसान की इच्छा होती है कि वह उपज को जल्दी बेचकर नकदी जुटा ले। ऐसे में वह खुले बाजार का मोहताज होता है। समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और भंडारण की लचर व्यवस्था उसकी बेचारगी को और बढ़ा देती है। यही पैटर्न देश के अलग-अलग हिस्सों में है।
यह भारत के किसान का काला यथार्थ है तो मायने साफ  हैं कि किसी भी सरकार ने ठोस कृषि नीति तैयार ही ही नहीं की। भारतीय अर्थव्यवस्था का एक कड़वा सच यह है कि ज्यादातर आबादी जीविका के लिए किसानी और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है लेकिन कुल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में कृषि तथा संबंधित गतिविधियों का योगदान लगातार कम होता जा रहा है। उदारीकरण के दौर में खेतिहर आबादी की आमदनी अन्य पेशेवर तबकों की तुलना में बड़ी धीमी गति से बढ़ रही है। खेती घाटे का सौदा बन गयी है और ज्यादातर किसान परिवार जीविका का कोई अन्य विकल्प मौजूद न होने की मजबूरी में ही खेती में लगे हैं। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि देश के अधिकतर किसान सीमांत किसान हैं, यानी उनकी जोत बहुत अधिक नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के बाद से खेती-किसानी को लेकर जो घोषणाएं की जाती रही हैं, वे महज लालीपाप रही हैं। यूपीए सरकार के दौरान करीब 7०,००० करोड़ रुपए का किसानों का कर्ज माफ  करने का ऐलान किया गया था। वे कौन से किसान थे? और इस दौर में देश के विभिन्न हिस्सों में जो किसान कर्जमाफी की लगातार मांग करते रहे हैं, वे किसान कौन हैं? क्या कर्जमाफी की घोषणाएं करने के बावजूद किसानों के कर्ज माफ  नहीं किए जाते या कोई और कारण हैं?
उप्र, पंजाब, मप्र, राजस्थान आदि राज्यों में किसानों के कर्ज माफ  करने के ऐलान किए जाते रहे हैं। तो फिर नए कर्ज किसानों पर कैसे चढ़ जाते हैं? ये कर्ज ही बुनियादी तौर पर किसानों की आत्महत्याओं के कारण हैं। महाराष्ट्र में जो हजारों किसान लामबंद हुए थे, उनकी भी पहली मांग कर्जमाफी की है। इसके अलावा, वन अधिकार कानून लागू करना, किसानों के लिए पेंशन, उपज की कीमत पर 5० फीसदी मुनाफा, बिजली-पानी बिल माफ  किए जाएं, स्वामीनाथन आयोग की रपट लागू की जाए-किसानों की प्रमुख मांगें थी। 
महाराष्ट्र से पहले दिल्ली के करीब फरीदाबाद, पलवल में किसानों को आंदोलित होते देखा गया। मप्र के मंदसौर में तो किसान आंदोलन हिंसक ही हो गया। कुछ स्वर उप्र से भी उठे हैं। यदि किसानों की भरपाई के लिए मोदी सरकार ने बजट में ही प्रावधान किए हैं तो उन्हें लागू करने का विश्वास दिलाया जाए। किसान खेत-खलिहान छोड़कर सड़कों पर नारे क्यों लगाए? फिर कुछ पार्टियां उसका राजनीतिक लाभ क्यों उठाएं? हर बार स्वामीनाथन आयोग की रपट की चर्चा सालों से सुन रहे हैं। आखिर उसकी सिफारिशें ऐसी कैसी हैं कि लागू न की जा सकें? कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि स्वामीनाथन आयोग की रपट किसी भी सरकार ने पूरी तरह पढ़ी ही नहीं है। उसमें 50 फीसदी लागत से अधिक की बात ही ऐसी है जिसका किसानों से वादा किया जाता रहा है। 
दरअसल सरकारें किसानों की फसल के दामों को मुद्रास्फीति से जोड़ कर देखती रही हैं। यदि 50 फीसदी लागत के अतिरिक्त दाम दिए जाएं तो उत्पाद भी उतना ही महंगा बाजार में उपलब्ध होगा। मध्यवर्ग उसका विरोध कर सकता है। उद्योग जगत भी ऐसा नहीं चाहता है, लिहाजा आजतक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हो पाई। किसानों को उम्मीदें बंधाई जाती रहीं लेकिन लागू कुछ भी नहीं किया गया। यह सिर्फ  किसानों की ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय समस्या है। 
किसानों की स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल लगभग 12 हजार किसान अपनी जान दे देते हैं। भारत के करीब नौ करोड़ खेतिहर परिवारों में से करीब 70 फीसदी परिवार कमाई से अधिक उपज पर खर्च कर देते हैं। बीते एक दशक में कृषि क्षेत्र में बजट आवंटन में बढ़ोत्तरी तो हुई है पर उसका लाभ किसानों के बजाय कृषि उत्पादों के कारोबार को मिल रहा है। सरकार को तुरंत ही किसानों को फौरी राहत देने तथा उपज के उचित दाम पर ध्यान देना चाहिए। बजट के प्रावधानों को कागजों से उतारकर खेतों और मंडियों तक ले जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 
विशेषज्ञों का दावा है कि स्वामीनाथन आयोग की रपट से ही किसानों की समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। सरकारों को ही ठोस नीतियां बनानी पड़ेंगी और ईमानदारी से उन्हें लागू करना पड़ेगा। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो किसान सड़कों पर आंदोलित ही दिखाई देंगे। यदि मौजूदा आंदोलन सफल हो गए तो देश के अन्य राज्यों में भी आंदोलनों का विस्तार होगा। मुंबई की जुटान किसान असंतोष का एक संकेत भर है। सरकार को कृषि संकट के दीर्घकालिक समाधान के लिए विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों के आधार पर तथा किसानों से सलाह-सुझाव लेकर ठोस नीतिगत पहल करनी चाहिए।
 
लेखक राजेश माहेश्वरी (अदिति)
 

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