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भाजपा से दूर क्यों होते जा रहे हैं सहयोगी दल

Publish Date: April 05 2018 01:32:38pm

शिवसेना के बाद एक और बड़े सहयोगी दल टीडीपी ने भाजपा से किनारा कर लिया। बीजद, टीएमसी, इनेलोद, अगप, बसपा , शिअद, जदसे  आदि के बाद अब राजग से शिवसेना और टीडीपी ने अपना नाता तोड़ लिया है। शिवसेना ने महाराष्ट्र  में आगे स्वतंत्र चुनाव लडऩे का निर्णय लिया है, वहीं टीडीपी के दो मंत्रियो ने मोदी सरकार से इस्तीफा दे दिया। दोनों घटनाक्रमों से भाजपा सरकार के सामने आफत की स्थिति आ गई है। 
पूर्व पीएम अटल बिहारी बाजपेई के समान सबको साथ लेकर चलने की शक्ति पीएम नरेंद्र मोदी में नहीं हैं। पहले ही शिवसेना के साथ छोडऩे से महाराष्ट्र की राजनीति में भूचाल आ गया है और वहां भाजपा के देवेंद्र फडणवीस की सरकार खतरे में पड़ गई है। हालांकि शिवसेना के इस कदम से केंद्र की सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा किंतु महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार के सम्मुख विकट स्थिति आ गई है और जब केंद्र से दोनों दल जब पूर्णत: नाता तोड़ लेंगे, तब मोदी सरकार मुश्किल में पड़ जाएगी । अटल - आडवाणी ने अपने समय में अपने सहयोगियों, साथियों एवं पार्टीजनों को बखूबी साध - बांध कर रखा था। हालांकि तब भी मायावती, ममता एवं जयललिता के नाज नखरों को अटल बिहारी बाजपेई की सरकार को कई बार झेलना पड़ा  था किंतु तब अटल - आडवाणी मिलकर उनको किसी भी तरह से हर बार मना लेते थे।
सन 2०14 में आम चुनाव के समय भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम सामने आने के बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलती गई। जिस बिहार के पूर्व सीएम लालू यादव ने आडवाणी की रथयात्रा को रोका था, उसी बिहार के नीतीश कुमार ने तब आडवाणी का रथ हांकने वाले साथी नरेंद्र मोदी का विरोध करते भाजपा से नाता तोड़ लिया था।
2०14 में नरेंद्र मोदी एवं भाजपा का अनेक दलों ने विरोध किया। बसपा, बीजद, जदसे, टीएमसी, इनेलोद, अगप, जो भाजपा के पूर्व  सहयोगी थे उनसे दूर होते चले गए थे। हालांकि मोदीे छोटे दलों को साथी बनाकर भाजपा को कीर्तिमान  सफलता दिलाते अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो गए। केंद्र में मोदी अर्थात भाजपा की सरकार बनी किंतु कभी भी परिस्थितियां भाजपा के अटल बिहारी बाजपेई सरकार या उनके शासनकाल जैसी नहीं रही। मोदी सदैव अपने अकेले के दम पर भाजपा को देश में सर्वत्र सफलता दिलाने के दम्भ और मद में चूर रहे और इसमें कोई दो राय नहीं कि केंद्र एवं अनेक राज्यों में भाजपा को अकेले नरेंद्र मोदी एवं उनकी रणनीति की बदौलत सफलता मिली। 
 नरेंद्र मोदी केंद्र में कोई भी छोटा- बड़ा कदम उठाते  हैं तो उसके पहले कभी भी किसी साथी सहयोगी नेता एवं पार्टी से सलाह मशवरा नहीं करते और ना उनसे सहमति लेते हैं। यह सहयोगी साथी दलों के लिए पीड़ादायी बात नहीं तो और क्या है। यदि नरेंद्र मोदी का आगे भी यही हाल रहा तो भाजपा का भविष्य काटो भरा हो सकता है। नरेंद्र मोदी यह न भूलें कि उन्हें आगे भी कई राज्यों में सहयोगी दलों से पाला पड़ेगा। 
भाजपा के लिए सहयोगी दलों एवं अपनी पार्टी के शीर्ष नेताओं की जरुरत सदैव बनी रहेगी। फिलहाल महाराष्ट्र में भाजपा सरकार अल्पमत में हो गई है और किसी से सहयोग  के बिना यहां सरकार नहीं बचेगी। शिवसेना ने आगे अपने अकेले के दम पर सभी चुनाव लडऩे का निर्णय लिया है। उद्धव ठाकरे अभी पार्टी अध्यक्ष एवं उनके पुत्र आदित्य पार्टी नेता हैं। 
 दोहरे मापदंड अपना रही है। एक  तरफ भाजपा से नाता तोडऩे की बात बार-बार करती है तो दूसरी तरफ भाजपा की बदौलत सत्ता का स्वाद चख रही है। शिवसेना सदैव धमकी - चमकी की राजनीति करती आ रही है। बाल ठाकरे ने जो किया, वही अब उद्धव ठाकरे कर रहे हैं।
 भाजपा शिवसेना के बीच में पूर्व में कई बार ऐसी स्थिति आ चुकी है, किन्तु हिन्दू मतों का चुनाव में विभाजन न हो,  इसी अंदेशे से अंत में दोनों एक हो जाते है। आकड़े और इतिहास गवाह है कि भाजपा कई बार झुक चुकी है किंतु तब अटल की सरकार थी, अब नरेंद्र मोदी की सरकार है। बस अंतर यही है कि नरेंद्र मोदी अपनी दूरगामी  सोच एवं रणनीति  से कोई मुकम्मल मार्ग तलाश लेंगे। वे इसमें भी माहिर हैं। सत्ता तो आती जाती रहती है पर यहां बात विश्वास और विश्वसनीयता की है। मोदी को लंबी पारी के लिए सहयोगी जरूरी है और उनका विश्वास भी जरूरी है।
उधर टीडीपी के दो मंत्रियों ने केंद्र में मंत्रीपद त्यागा है किन्तु पार्टी ने पूरी तरह से नाता अभी नहीं तोड़ा है। टीडीपी का समर्थन अब भी जारी है। आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं मिलने के कारन टीडीपी मंत्रियों ने ऐसा किया है।
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाषण कला में माहिर हैं। वह सामने वाले सभी नेताओं एवं जनता को अपनी बातों से अपने पक्ष में सम्मोहित करने की क्षमता रखते हैं। देश में उनकी सरकार एवं शासन काल का चौथा वर्ष पूर्ण हो रहा है किंतु जनता के बीच उनकी विश्वसनीयता में रंच मात्र भी फर्क नहीं पड़ा है। जनता के बीच मोदी मैजिक अभी भी प्रभावी है और वह आगे भी चुनाव में बरकरार रहेगा। 
सीतेश कुमार द्विवेदी लेखक (अदिति)

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