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आरक्षण तथा वोट की राजनीति

Publish Date: April 13 2018 01:38:16pm

स्वतंत्र तथा गणतंत्र भारत के संविधान के लागू होने के साथ ही भारत में सरकारी सेवाओं में अनुसूचित एवं जनजाति के वर्गों के लिए लगभग 23 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई तथा कालान्तर में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण किया तो उन्होंने कमण्डल को ध्वस्त करने की राजनीति के तहत मण्डल का पिटारा खोलकर पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत का आरक्षण लागू कर आरक्षण को 50० प्रतिशत तक पहुंचा दिया। 

आरक्षण नीति से वांछित परिणाम उतने अच्छे नहीं मिल रहे हैं जितने कि मिलने की उम्मीद थी। लोकतन्त्र व्यवस्था में तो आरक्षण नीति वोट की राजनीति की भेंट ही चढ़ गयी है। कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण की वृद्धि की तो बात करता नजर आता है परन्तु इस आरक्षण को घटाने की तथा नीति की समीक्षा करने की कभी नहीं सोचता क्योंकि प्रत्येक राजनीतिक दल को अपनी जातिगत वोट बैंक की अधिक चिन्ता रहती है अपितु दल नई-नई जातियों को खोज कर हैं जिनसे उस दल को वोट मिलने की आशा होती है, आरक्षित जातियों की सूची मेें शामिल करवाना चाहते हैं।

अभी तक किसी भी राजनीतिक दल ने आरक्षण सुविधा प्राप्त सूची में से किसी जाति विशेष को निकालने की बात आरक्षण के पश्चात् 68 वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी नहीं कहीे। इसका तात्पर्य यही निकाला जा सकता है कि जातियों का जो पिछड़ापन 1950 में था, वही 2018 मेें भी है। न ही किसी जाति ने अपनी तरफ से यह मांग की है कि अब हमारी जाति का पिछड़ापन समाप्त हो गया है, हमें आरक्षित सूची से निकाल दिया जाये तथा किसी अन्य जाति को, जो हमसे अधिक पिछड़ी जाति हो, को आरक्षित सूची में शामिल कर लिया जाये तथा किसी आरक्षण से अभी तक किसी भी जाति का आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विकास नही हो पाया है।

आरक्षण नीति से बने आई० ए० एस०, आई० पी० एस०, न्यायमूर्ति, सरकारी अधिकारी जैसी सम्मानित नौकरी प्राप्त जनसेवक भी अपने बच्चों को सभी सुविधायें देते हुए भी आरक्षण की ओर लालायित नजर से देखते रहते हैं तथा वे भी न तो स्वयं तथा न ही अपने आश्रितों को आरक्षण की परिधि से बाहर जाने की मांग सरकार से करते हैं। अन्य निम्न स्तर के जनसेवकों की तो बात ही कुछ और है।

गत कुछ वर्षो से सरकारी सेवाओं, चिकित्सीय, तकनीकी तथा अन्य संस्थानों में जाति आधारित आरक्षण एक ऐसे यन्त्र के रूप में प्रयोग किया जा रहा है जिससे चुनावों में इन जातियों को भारी समर्थन वोट के रूप में प्राप्त हो सके। आरक्षण का मुद्दा अब वोट बैंक की राजनीति से एकीकृत हो चुका हैं। कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण की कोई भी सीमा, न तो संख्यात्मक और न ही समयगत, निर्धारित करने के लिए तैयार हो पा रहा है यद्यपि यह सामान्य रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि जिन पदों पर कुशलता, योग्यता तथा विशेषज्ञता विशेष रूप से आवश्यक होती है वहां केवल जाति को ही वांछित आधार मानकर ही पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति करना किसी तरह से तर्क संगत तथा न्यायोचित नही है तथा इससे न तो उस जाति की और न ही सम्पूर्ण राष्ट्र को कोई अपेक्षित लाभ प्राप्त हो सकेगा।

लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए यह महत्त्वपूर्ण माना गया है कि नीतिनिर्धारणकर्ता किसी न किसी बिन्दु पर तो स्थिर रहें। कोई भी राजनीतिक दल आरक्षण सूत्र का विरोध करने की हिम्मत नही जुटा पा रहा है। राजनीति को परिभाषित करने के लिए न्यायालय का निर्णय मील का पत्थर साबित होगा।

आरक्षण का विरोध संविधान निर्माता डा० अम्बेडकर ने किया था परन्तु बाद में मात्र दस वर्षो के लिए आरक्षण नीति को लागू करने पर अपनी सहमति दी थी, आरक्षण नीति को लागू हुए 50 वर्ष हो गये हैं। अब इस नीति पर पुन: विचार करने का समय आ गया है। मात्र यह कह कर कि जिन सवर्ण जातियों ने हजारों वर्षों में जिन जातियों का शोषण किया है उनके विरूद्ध तथा उनसे बदला लेने के लिए आरक्षणा को भी अभी समाप्त नहीं किया जा सकता, मात्र समाज में वैमनस्यता तथा कुंठा ही उत्पन्न करता है। जब एक योग्य युवा की मात्र किसी जगह इस कारण से नियुक्ति नही हो पाता कि वह एक विशेष जाति का सदस्य है तो वह कुण्ठित होकर विदेश पलायन कर जाता है। अमेरिका, कनाडा, तथा अन्य देशों में भारी संख्या में आये भारतीयों ने उन देशों को उन्नति के शिखर पर पहुंचाया है तथा इन पचास वर्षो में भारत ने उतना विकास नहीं किया जितना होना चाहिए था तथा हम पिछड़ गये।

सरकार को दबी कुचली पिछड़ी जातियों को शिक्षा, प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सम्बन्धी सम्पूर्ण सुविधायें देनी चाहिए तथा वे सब उपाय करने चाहिएं जिससे यह जातियां भी अपने बच्चों को पढ़ा सकें तथा स्वस्थ रख सकें परन्तु जब नौकरियों का वक्त आये तो जो व्यक्ति सर्वोत्तम योग्य हों, उसे ही नौकरी दी जानी चाहिए। योग्य में योग्य व्यक्ति को नौकरी देना सामाजिक धन का सदुपयोग ही माना जायेगा। जिन व्यक्तियों को एक बार आरक्षण सुविधा प्राप्त हो गई हो तथा उनके पास धन, दौलत, मान सम्मान सभी कुछ प्राप्त हो गया है, उनको आरक्षण देना व्यवस्था का अपमान करना है। अब यदि एक जिलाधीश भी अपने पुत्र अथवा पुत्री को आरक्षण दिलाने की बात करता है तो आरक्षण बेमानी हो जाता है।

आखिर कभी न कभी तो आरक्षण की बैशाखी को समाप्त करना ही पड़ेगा, तभी दबे कुचले वर्गो के लोग अपने पैरों पर खड़ा हो सकेंगे वरना जब तक यह बैशाखी दिखाई पड़ती रहेगी, उन्हें दौडऩे की चेष्टा करने की प्रेरणा ही नहीं मिलेगी। आरक्षण यदि जरूरतमन्द को दिया जाये तो समाज तरक्की करता है। अब तो जिन लोगों ने आरक्षण प्राप्त कर समाज में जगह बना ली है, वे लोग अपने भाइयों को अपने बराबर नही आने देना चाहते। आरक्षित समाज में भी दो वर्ग बन गये हैं, एक वो जिन्हें आरक्षण मिल चुका है, दूसरे वो जिन्हें आरक्षण नहीं मिला है। जो भीड़ में रेल के डिब्बे में स्वयं तो सवार हो चुके हैं वे अन्य को उसी डिब्बे में नहीं आने देना चाहते।

प्रत्येक भारतीय को भारतीय समझा जाये। उनको हिन्दू, मुसलमान, बनिया, क्षत्रिय, ब्राहमण तथा अन्य पिछड़े वर्ग का मानकर उनकी संख्या के आधार पर उनको महत्त्व प्रदान करने की प्रवृत्ति देश का विकास रोक रही है तथा देश को पिछड़ा बना रही है। दलितों की सुरक्षा तथा उनका मान सम्मान कायम करना सम्पूर्ण समाज का उत्तरदायित्व है।     

लेखक  डा. सूर्य प्रकाश अग्रवाल, (अदिति)

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