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डा. अम्बेडकर विचार

Publish Date: April 14 2018 05:06:34pm

देश के सर्वोच्च न्यायालय में एक बार फिर केंद्र सरकार ने कहा है कि न्यायालय द्वारा पिछले दिनों अनुसूचित जाति अत्याचार निवारण कानून को लेकर जो निर्णय दिया था उससे एससी/एसटी कानून कमजोर हुआ है। देश की आजादी के 7 दशक बाद भी अभी तक सवर्ण और दलित व पिछड़े हिन्दू के बीच की खाई भर नहीं पाई है। राजनीतिक लाभ-हानि को देखते हुए राजनीतिज्ञ भी खाई को भरने नहीं दे रहे।
समाजिक स्तर पर आज भी देश के कई भागों में दलित व पिछड़़ों को लेकर सवर्ण जातियों का वही संकीर्ण दृष्टिकोण है जो 100 वर्ष पहले था। समय के साथ जो सकारात्मक बदलाव हिन्दू समाज में आना चाहिए था वह नहीं आ पा रहा। सवर्ण और दलित व पिछड़े हिन्दुओं की खाई जब तक समाप्त नहीं होगी, न तो हिन्दू जाति का भला होगा और न ही देश का भला होगा।
डा. भीमराव अम्बेडकर ने उपरोक्त खाई को भरने के लिए दशकों पहले जो प्रयास किए थे उनके परिणामस्वरूप सत्ता में कई महत्वपूर्ण स्थानों पर आज दलित व पिछड़े समाज से जुड़े लोग हैं, इसे एक सकारात्मक परिवर्तन ही कहा जा सकता है। लेकिन सामाजिक स्तर पर अभी भी बहुत कुछ होने वाला है। हिन्दू समाज में सवर्ण व दलित व पिछड़ों के संबंधों को लेकर डा. भीमराव अम्बेडकर ने 1927 में जो भाषण दिया था उसका अंश आप सम्मुख रख रहा हूं:-
''सज्जनों,अछूत और सवर्ण दोनों मानते हैं कि वे एक ही धर्म से तालुल्क रखते हैं। सवर्ण कभी अछूतों से नहीं कहेंगे कि वे हिन्दू नहीं है। 1910 की जनगणना के दौरान जब कुछ मुसलमानों ने सुझाव दिया कि अछूतों को हिन्दुओं में नहीं गिना जाना चाहिए तो सिर्फ सुधारवादी हिन्दुओं ने ही नहीं, बल्कि रूढि़वादी सवर्णों ने भी कहा कि अछूतों को हिन्दू ही माना जाना चाहिए और अछूत भी ऐसा ही चाहते थे। दोनों ही पक्ष पौराणिक समय से मानते आए हैं कि वे एक ही धर्म के हैं। आज हालांकि अछूतों की मानसिकता में काफी परिवर्तन हो गया है जो साफ दिखता है। उन्हें हैरानी होती है कि यदि वे भी हिन्दू हैं तो उन्हें हिन्दुओं की तरह अधिकार क्यों नहीं मिले हैं? वे उसी कुएं या नहर से पानी क्यों नहीं ले सकते जिससे अन्य हिन्दू लेते हैं? वे उस मंदिर में प्रवेश क्यों नहीं कर सकते जहां हिन्दू अपने देवताओं की पूजा करते हैं? वे समानता से जुड़े ये सवाल करते हैं। वे समानता का यह अधिकार प्राप्त करने के लिए जागरूक हुए हैं। कोई भी पुरानी पंरपरा धर्म बन जाती है और हर कोई उसे सच मानने लगता है। कुछ भी नया पुरानी परंपरा की तरह सशक्त नहीं होता, चाहे वह कितना भी आकर्षक क्यों न हो, लोग उसे स्वीकारने में हिचकिचाते हैं। यही वजह है कि समान अधिकारों की बात करने वाले अछूतों को भी इस तरह के संदेह हैं। हम इससे पहले कभी किसी मंदिर में नहीं गए। हम इससे पहले कभी सार्वजनिक कुएं या नहर पर नहीं गए! यदि अब हम इस पर जोर देते हैं, तो क्या यह सही होगा? क्या इसे सत्याग्रह कहा जाएगा? अछूतों के मन में संदेह होना स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी कृति की सफलता या विफलता उसकी नैतिकता और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करती है। लेकिन जब किसी क्रिया की जड़ में सच्चाई हो तो उसकी सफलता पर संदेह नहीं होना चाहिए। सच की हमेशा जीत होती है! यदि किसी कार्य में सच नहीं है तो उसकी सफलता कठिन है। लिहाजा हममें से हर एक अछूत को अपने कदम की नैतिकता को समझने की कोशिश करनी होगी। इस समझने के लिए मंदिर में प्रवेश की हमारी मांग को सही अधिकार की मांग या गलत मांग के तराजू पर तोलते हैं। यदि हम कोई सत्याग्रह आरंभ कर रहे हैं तो हमें पता होना चाहिए कि क्या सही है और क्या गलत। यदि आपको पता नहीं है कि सच क्या है तो आपका सत्याग्रह कमजोर नींव पर खड़ी एक इमारत की तरह कमजोर होगा। यदि आपको पता ही नहीं है कि आपका सत्याग्रह सही है या गलत, तो आप सफल कैसे होंगे? सत्याग्रह की सफलता उसे करने वाले व्यक्ति के आत्मविश्वास पर निर्भर होती है और आत्मविश्वास ज्ञान इस विश्वास से आता है कि वह जो कर रहा है, वह पूर्ण सच और नैतिक है। यदि उसे इसमें जरा भी संदेह है तो उसमें जरूरी आत्मविश्वास नहीं आएगा। यही वजह है कि सत्याग्रही को सच के लक्षण और उनकी पहचान के बारे में पता होना चाहिए। मेरी राय में जो कुछ भी बंधुभाव और भाईचारे के लिए है, वह सही है। यदि आप स्वार्थी लक्ष्यों को लेकर चलते हैं तो आप समुदाय के बारे में नहीं सोच सकते, आप लोगों को बांटने के बारे में ही सोचेंगे। लेकिन यदि आपको समानता में भरोसा है तो आप ऐसा कभी नहीं करेंगे। आप उन्हें जोडऩे की कोशिश करेंगे। इन सिद्धांतों के आधार पर जहां समानता है, वहां सामुदायिकता है और जहां सामुदायिक भावना है, वहां सच है। इन सिद्धांतों की प्रतिस्थापना का कोई भी कदम सत्याग्रह है। सत्याग्रह की मेरी परिभाषा यही है। यह मेरी अपनी सोच नहीं है। मैंने यह गीता में पढ़ा है। कुछ लोगों को हैरानी होगी कि मैं अपने सत्याग्रह के लिए गीता का सहारा क्यों ले रहा हूं। कईयों का मानना है कि सत्याग्रह गीता की विषय-वस्तु नहीं है, लेकिन यह सही नहीं है। वास्तव में सत्याग्रह गीता का मूल सिद्धांत है। यदि आप ध्यान से सोचें कि श्रीकृष्ण ने गीता का संदेश क्यों दिया तो आपको पता चलेगा कि जो मैं कह रहा हूं, वह सही है। अर्जुन ने क्या संदेह जताया था और श्रीकृष्ण का जवाब क्या था? जब अर्जुन रथ से उतर गया और युद्ध में अपने सामने अपने बुजुर्गों और गुरुओं को देखकर दु:खी हो गया तब श्रीकृष्ण ने उसे क्या सलाह दी थी? श्रीकृष्ण ने कहा था, दु:खी मत होओ, उन लोगों से अपने अधिकारों के लिए लडऩे को तैयार रहो जिन्होंने तुम्हारा राज्य छीन लिया है। इस पर अर्जुन ने पूछा, मुझे बताइए, आप जो कह रहे हैं, वह सच कैसे है और मेरी मांग किस तरह से सत्याग्रह है। अर्जुन के इस एक सवाल का जवाब ही गीता है। गीता में कोई और सिद्धांत नहीं, बल्कि सत्याग्रह की ही बात है। यही वजह है कि मैंने अछूतों के लिए समानाधिकार की हमारी मांग के लिए गीता को आधार बनाया। एक और वजह है कि मैंने अपने सत्याग्रह का आधार गीता को बनाया। गीता दोनों पक्षों को स्वीकार्य है, अस्पृश्य और सवर्ण दोनों को। यदि हम कोई और धार्मिक ग्रंथ चुनते तो सवर्ण हमेशा बहाना खोजते। वे यह कहकर उसे खारिज कर देते कि यह उन्हें स्वीकार्य नहीं है। यदि अछूतों का सत्याग्रह गीता की परीक्षा से गुजरा है तो इसका विरोध करने के लिए कोई बहाना नहीं होगा, क्योंकि इसे खारिज करना गीता को खारिज करने जैसा होगा। अब देखना यह है कि हमारा सत्याग्रह गीता की कसौटी पर उतरता है या नहीं। पहले, क्या हमारा आंदोलन समुदाय के लिए उठाया गया कदम है? कुछ लोगों का मानना है कि हमारा आंदोलन सिर्फ अछूत का दाग हटाकर हमें सवर्ण बनाने के लिए है। ऐसा नहीं है कि छूआछूत से सिर्फ अछूतों को नुकसान हुआ है, इससे सवर्णों को भी नुकसान हुआ है। और सबसे ज्यादा नुकसान राष्ट्र को हुआ है। जिन लोगों को नीचे देखना पड़ता है, उनका अपमान तो होता ही है, लेकिन जो दूसरों का अपमान करते हैं, वे अपनी नैतिकता का पतन करते हैं। यदि अछूत इस कलंक से बाहर निकलकर देश के निर्माण में योगदान देते हैं तो देश की तरक्की में ही हाथ बटाएंगे। इसलिए छूआछूत के खात्मे का आंदोलन सही मायने में देश के निर्माण का आंदोलन है। यदि अछूतों का लक्ष्य सिर्फ अपने पर लगा अछूत का दाग हटाने के लिए होता तो उन्हें सत्याग्रह जैसा कठिन रास्ता चुनने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि समान और मानवीय व्यवहार का लक्ष्य तो वे किसी और धर्म में परिवर्तित होकर हासिल कर लेते। वे अपनी ऊर्जा अपनी शिक्षा और व्यक्तिगत उन्नति के लिए इस्तेमाल करते। हिन्दुओं का बरताव हैरानी भरा है। जब तक कोई व्यक्ति हिन्दू समाज का हिस्सा होता है तब तक छूआछूत का बर्बर नियम, पाप और धर्म, सार्थक और निरर्थक सब लागू होता है। यदि वह हिन्दू धर्म छोड़ देता है तो ये नियम उस पर लागू नहीं होते हैं। उसके साथ समान व्यवहार होता है। यही वजह है कि हिन्दू मुसलमानों को अछूत नहीं मानते। अछूत हिन्दू धर्म का ही हिस्सा हैं और यही वजह है कि उनके बर्बर नियम उन्हीं पर लागू होते हैं। ऐसा नहीं है कि अछूतों को इसके बारे में पता नहीं है। उन्हें बखूबी पता है। लेकिन यदि कोई अछूत इसलाम या ईसाई धर्म अपना लेता है तो उसके साथ समान और मानवीय व्यवहार किया जाने लगता है। इसके बावजूद अछूत यह सरल रास्ता नहीं अपनाना चाहते। हिन्दू धर्म को छोड़कर उसके पतन का कारण बनने की बजाय वे हिन्दू ही बने रहना चाहते हैं और अपनी सारी ऊर्जा मानवीयता के अधिकार के लिए लडऩे पर खर्च करना चाहते हैं। इसलिए कोई नहीं कह सकता कि उनका आंदोलन सिर्फ उनके फायदे के लिए है। यह हिन्दू धर्म के उद्धार के लिए है। यही सच है। कोई नहीं कह सकता कि अछूतों का आंदोलन समानता के लिए नहीं है। वे कोई विशेष अधिकार या दर्जा नहीं मांग रहे, वे सिर्फ समान अधिकार की मांग कर रहे हैं। अछूत यह नहीं कह रहे कि हिन्दुओं को जो अधिकार मिले हैं, वे किसी और को नहीं, बल्कि सिर्फ उन्हें मिलें। उनकी मांग सिर्फ अछूतों के लिए समान अधिकार की है। यदि आप गीता के सिद्धांतों की विवेचना करें तो पता चलेगा कि अछूतों का यह आंदोलन सत्याग्रह का आंदोलन है।''
डा. भीमराव अम्बेडकर को हिन्दू समाज के तथा देश के भविष्य के बारे कितनी चिंता तथा प्यार था वह आप उनके उपरोक्त प्रकट भावों से समझ सकते हैं। समय की मांग आज भी यही है कि केवल राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर एक सकारात्मक परिवर्तन लाकर दलित, पिछड़े और सवर्ण हिन्दुओं को एक मंच पर लाकर ही समाज व देश का भविष्य उज्जवल बनाया जा सकता है।
डा. भीमराव अम्बेडकर की दूरदर्शिता के कारण ही देश में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। दलित व सवर्ण जब मिलकर समाज व देश हित के लिए कार्य करेंगे, वह समय ही देश का स्वर्णयुग कहलायेगा।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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