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भारत में योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाता भारतीय योग संस्थान

Publish Date: June 20 2017 04:50:06pm

योग क्या है? साधारणतया योग से अभिप्राय हम शरीर के अंगों को विभिन्न दिशाओं में मोडऩे को योग समझते है, जबकि योग एक विज्ञान है। जिस प्रकार बाहरी विज्ञान के क्षेत्र में आइंस्टीन का नाम सबसे ऊपर है, वैसे ही भीतरी विज्ञान की दुनिया के आइंस्टीन है पंतजलि। पंतजलि ने ईश्वर तक, सत्य तक, स्वयं तक, मोक्ष तकया पूर्ण स्वास्थ्य तक पहुंचने की आठ सीढिय़ां निर्मित की हैं आप सिर्फ एक सीढ़ी चढ़ो, पहल करो, उसके बाद दूसरी चढऩे में जोर नहीं लगाना पड़ेगा। शुरूआत शरीर से ही करनी होगी। शरीर को बदलो, मन स्वत: ही बदलेगा। मन के बाद बुद्धि बदलेगी।
    
योग मन और शरीर में संतुलन करना सीखाता है। योग का अर्थ है-जोड़। स्वयं से जुडऩा और फिर समाधि तक पहुँचना। यह अंधविश्वास से दूर एक सीधा विज्ञान है, पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। आजकल हमारे देश में योग के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भी समय-समय पर योग को प्रोत्साहित करते रहते हैं। उनके अथक प्रयास से 21 जून अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित हुआ है। समय-समय पर विभिन्न शहरों में योग शिविर लगाये जाते है। योग से हम सभी रोगों पर नियन्त्रण पा सकते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को योग अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए। नि:शुल्कयोग शिविर चलाने में भारतीय योग संस्थान का विशेष योगदान है। 
    
भारतीय योग संस्थान के संस्थापक प्रकाश लाल जी को योग सीखाने की प्रेरणा बिहार के स्वामी सत्यानन्द जी और मां योग शक्ति जी से मिली। स्वामी जी और माता जी कुछ विदेशी शिष्यों को लेकर दिल्ली आए और बताया कि वे भारतीयों को योग सिखाएंगे। यह सुनकर प्रकाश लाल जी के मन में भाव आया कि भारत की योग विद्या विदेशी क्यों सिखाएंगे भारतीय क्यों नहीं? इस पर स्वामी जी का तर्कथा कि भारतीय अंग्रेजों को देखकर जल्दी प्रभावित होंगे। इस घटना से प्रेरित होकर 10 अप्रैल 1967 में प्रथम भारतीय योग केन्द्र की स्थापना हुई। अब यह केन्द्र एक वट वृक्ष का रूप ले चुका है। भारत में ही नहीं विदेशों में भी योग संस्थान के अनेक शिविर चलते हैं। मुझे करीब एक साल पहले इस संस्थान से जुडऩे का अवसर प्राप्त हुआ। मार्च 2015 से जालंधर के लाजपत नगर पार्क में भारतीय योग संस्थान द्वारा निशुल्क योग शिविर शुरू हुआ। प्रारम्भ में 12-15 लोग ही थे। शिक्षक वहां सैर कर रहे लोगों को प्रेरित करते और योग का महत्व बताते। मैं शुरू से ही योग से दूर रहने वाली थी। योग का समय प्रात: 5:15 से 6:15 बजे था, अत: उठने की भी समस्या थी। पार्क में खुले में योग आसन करने के लिए भी दिमाग तैयार नहीं था। अत: कोशिश होती कियोग शिविर समाप्त होने के बाद ही सैर करने जाऊँ, ताकि शिक्षकों से सामना न हो। बार-बार मना करना भी अच्छा नहीं लगता था, क्योंकि इस में शिक्षकों का कोई स्वार्थ नहीं था, मेरा ही फायदा था। अप्रैल 2016 में मैंने योग शिविर से जुडऩे का मन बनाया और तब से शुरू हो गयी अनुशासित जिन्दगी। पहले दिन तो समय कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। योग भाषा समझ में नहीं आयी। शिक्षकों ने हौंसला दिया कि घबराएं नहीं शुरू-शुरू में कुछ दिन सबके साथ ऐसा ही होता है। मैंने योग संस्थान द्वारा प्रकाशित योग की पुस्तकें पढऩी शुरू की तो, धीरे-धीरे रुची बढऩे लगी। अब हाल यह है कि छुट्टी करना अच्छा नहीं लगता। मुझे योग करते हुए करीब एक साल हो गया है। मेरे घुटनों का दर्द ठीक हो गया है। हाथ की अंगुलियों के जोड़ दर्द करते थे व चुटकी नहीं बजती थी। अब बिल्कुल ठीकहैं। प्रति दिन नियमित रूप से आसन, प्राणायाम व ध्यान की क्रियाएं करने से शरीर की सभी कार्य प्रणालियों में एक सुन्दर सन्तुलन स्थापित हो गया है, जिससे हर समय मन प्रसन्नचित रहता है।

भारतीय योग संस्थान भारतीय संस्कृति में विश्वास रखता है। इस भौतिकयुग में योग संस्थान द्वारा नि:शुल्क, निस्वार्थ सेवा शिविर चलाना अपने आप में एकउदाहरण है। केवल जालंधर में 32 पार्कों में योग केन्द्र चलते हैं। सभी शिक्षकअनुशासित व निष्ठावान हैं। मानव की सेवा ही लक्ष्य है। 'जीओ और जीवन दो' के सिद्धान्त अनुसार प्रत्येकसाधक एकआदर्श जीवन व्यतीत कर समाज कल्याण के कार्य में जुटा है। संस्थान ऐसे कार्यकर्ताओं का निर्माण करना चाहता है जो लेटे को बैठा दें, बैठे को खड़ा कर दें, और खड़े को दौड़ा दें। दूसरों में प्राण फूंक दें, और स्वयं उनके लिए प्रेरणा स्त्रोत बनें।
    
योग संस्थान के सभी केन्द्र 365 दिन चलते हैं। सभी संस्थानों में शिक्षक समय से पहले पहुंचकर योगाभ्यास करते हैं और विशेष आसन सीखने के इच्छुकसाधकों को सीखाते भी हैं। आज संसार में ईष्र्या-द्वेष और तनाव बहुत अधिकहै। इंसान अपने दुख से नहीं बल्कि दूसरे के सुख को देखकर ज्यादा दुखी होता है। ऐसे वातावरण में संस्थान के कार्यकर्ताओं, शिक्षकों की नि:स्वार्थ सेवा भाव देखकर मन श्रद्धा से झुक जाता है। आज बच्चों, गृहस्थी, वृद्ध, व्यापारियों कर्मचारियों व उच्च अधिकारियों सबको योग की आवश्यकता है, क्योंकि स्वस्थ रहकर ही सब सांसारिक कार्यों को कर सकेंगे। प्राणायाम करने से अति क्रोध व अति भावुकता की स्थिति पर नियन्त्रण बनता है, अत: प्रत्येक व्यक्ति को अपने नजदीक के योग केन्द्र में जाकर एकघंटा अपने लिए अवश्य देना चाहिए ताकि उसका जीवन सुखमय बने। योग को अपनी दिनचर्या में शामिल करके देखो, इससे आपके जीवन में अद्भुत परिवर्तन होगा ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
        

  -वीनू खन्ना

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