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ऑर्बिट बस कांडः अपने ही मुकर गए गवाही से, इंसाफ की जंग हारी मोगा की अर्शदीप 

Publish Date: July 17 2017 06:57:08pm

मोगा (उत्तम हिन्दू न्यूज) : बहुचर्चित ऑर्बिट बस कांड में सोमवार को उस समय नया मोड़ अा गया जब मामले से जुड़े सभी अारोपियों को अदालत ने बरी कर दिया। एडिशनल जिला एवं सेशन जज लखविंदर कौर दुग्गल की अदालत ने बादल परिवार की मालकियत वाली ऑर्बिट बस कांड में नामजद चारों आरोपियों को सबूतों के अभाव कारण बरी कर दिया है। मोगा के थाना बाघापुराना में सवा 2 साल पहले ऑर्बिट बस के ड्राइवर, कंडक्टर और दो सहायकों खिलाफ कथित छेड़छाड़ बाद चलती बस में से नाबालिग दलित लड़की को फेंककर मारने का आरोप लगा था। इस कांड की देश और दुनिया के हिस्सों में निंदा की गई। इस मामले पर तत्कालीन सीएम प्रकाश सिंह बादल की सरकार भी बैकफुट पर आ गई थी।

29 अप्रैल 2015 को हुई इस घटना के बाद बस चालक रणजीत सिंह पुत्र प्यारा सिंह निवासी बठिंडा, कंडक्टर सुखविंदर सिंह उर्फ पंमा पुत्र इकबाल सिंह निवासी बहावल वाली थाना अबोहर जिला फाजिल्का, हाकर गुरदीप सिंह उर्फ जिम्मी पुत्र सुरिंदर सिंह गली नंबर 6 दशमेश नगर मोगा और अमर राज उर्फ दाना पुत्र नूरा राम निवासी चक्कबखतू जिला बठिंडा खिलाफ थाना बाघापुराना में भारतीय दंडवली की धारा 302,307,354,120-बी, 34 एवं जुर्म एससी/एसटी एक्ट तहत केस दर्ज करके उनको गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना में मृतका अर्शदीप की मां छिंदर कौर गंभीर घायल हो गई थी। यहां एडिशनल जिला एवं सेशन जज की अदालत में बस कांड की सुनवाई दौरान मृतक नाबालिग दलित का पिता सुखदेव सिंह और उसकी पत्नी छिंदर कौर पुलिस के पास दिए बयानों से पल्ट (मुकर) गया था। अदालत में सुखदेव सिंह ने पुलिस की कहानी से पलटते कहा कि उसे घटना बारे कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी। इस चश्मदीद दंपति की गवाही बाद ही कानूनी माहरों ने आरोपियों को बड़ी राहत मिलने की बात कह दी थी। इस घटना की जांच के लिए सरकार की ओर से स्थापित जस्टिस वीके बाली आयोग आगे भी यह दंपति पेश हो कर पक्ष रखने से टालमटोल करता नजर आया था। 

इस घटना को लेकर मोगा राजनीतिक अखाड़ा बन गया था। इस मौके बादल सरकार ने इस घटना की वास्तविकता ओर अन्य तथ्य जानने के लिए जस्टिस वीके बाली आयेाग को नियुक्त किया गया था। इस दौरान पीडित परिवार को भत्तों के अलावा ऑर्बिट कंपनी को जिला रेड क्रॉस जरिये पीडित परिवार को मुआवजे के तौर पर तकरीबन 20 लाख रुपये चेक जरिए अदा करने पड़े थे। सरकार ने इस कांड को ठंडा करने के लिए पीडि़त परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी. सरकारी स्कूल,लंढेके का नाम मृतक नाबालिग दलित लड़की अर्शदीप के नाम रखने और गांव में उचित यादगार बनाने का ऐलान किया गया था। हालांकि मौके पर 20 लाख मुआवजे देने के अलावा बाकी कोई भी और वादा अभी तक पूरा नहीं हो पाया है। 

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