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महामहिम का संबोधन

Publish Date: July 26 2017 07:31:33pm

देश के 14वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद श्री रामनाथ कोविंद ने संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में देश के राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों तथा अन्य वर्गों को संबोधित करते हुए कहा कि देश की सफलता का मंत्र उसकी विविधता है। विविधता ही वह आधार है जो हमें अद्वितीय बनाता है। इस देश में हमें राज्यों और क्षेत्रों, पंथों, भाषाओं, संस्कृतियों, जीवन-शैलियों जैसी कई बातों का सम्मिश्रण देखने को मिलता है। हम बहुत अलग हैं, लेकिन फिर भी एक हैं और एकजुट हैं। इक्कसवीं सदी को भारत की सदी बताते हुए उन्होंने कहा कि देश की उपलब्धियां ही इस सदी की दिशा और स्वरूप तय करेंगी। सबको मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करना है जो आर्थिक नेतृत्व देने के साथ ही नैतिक आदर्श भी प्रस्तुत करे। देश के लिए ये दोनों मापदंड कभी अलग नहीं हो सकते। ये दोनों जुड़े हुए हैं और इन्हें हमेशा जुड़े ही रहना होगा। उन्होंने कहा कि देश की चौतरफा प्रगति के लिए एक तरफ जहां ग्राम पंचायत स्तर पर सामुदायिक भावना से विचार-विमर्श से समस्याओं का निस्तारण होगा, वहीं दूसरी तरफ डिजिटल राष्ट्र हमें विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुंचने में सहायता करेगा। ये देश की प्रगति के लिए राष्ट्रीय प्रयासों के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। श्री कोविंद ने कहा, 'मैं एक छोटे से गांव में मिट्टी के घर में पला बढ़ा हूं। मेरी यात्रा बहुत लम्बी रही है, लेकिन ये यात्रा अकेले सिर्फ मेरी नहीं रही है। हमारे देश और हमारे समाज की भी यही गाथा रही है। हर चुनौती के बावजूद, हमारे देश में, संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल मंत्र का पालन किया जाता है और मैं इस मूल मंत्र का सदैव पालन करता रहूंगा।' उन्होंने कहा कि राष्ट्र के तौर पर हमने बहुत कुछ हासिल किया है, लेकिन इससे भी और अधिक करने का प्रयास निरंतर होते रहना चाहिए। यह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2022 में देश अपने स्वतंत्रता के 75वें साल का पर्व मना रहा होगा। इस तरह के कदम उठाए जाने जरूरी हैं जिनसे समाज की आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति और गरीब परिवार की बेटी के लिए भी नई संभावनाओं और नए अवसरों के द्वार खुलें। ये प्रयत्न आखिरी गांव के आखिरी घर तक पहुंचने चाहिए। इसमें न्याय प्रणाली के हर स्तर पर तेजी के साथ, कम खर्च पर न्याय दिलाने वाली व्यवस्था को भी शामिल किया जाना चाहिए।'
महामहिम श्री रामनाथ कोविंद द्वारा प्रकट भावों से उनकी नम्रता के साथ-साथ उनके धरातल से जुड़े होने व देश के संविधान और संविधान द्वारा दी व्यवस्था में अटूट विश्वास स्पष्ट झलकता है।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अपने पद से मुक्त होने की पूर्व संध्या पर देश के नाम अपने संबोधन में कहा कि भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है और सहृदयता और समानुभूति की क्षमता हमारी सभ्यता की सच्ची नींव रही है लेकिन प्रतिदिन हम अपने आसपास बढ़ती हुई हिंसा देखते हैं। इस हिंसा की जड़ में अज्ञानता, भय और अविश्वास है। उन्होंने परोक्ष रूप से देश और दुनिया में बढ़ती हिंसा के संदर्भ में कहा, हमें अपने जन संवाद को शारीरिक और मौखिक सभी तरह की हिंसा से मुक्त करना होगा। राष्ट्रपति ने कहा, एक अहिंसक समाज ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों के सभी वर्गों के विशेषकर पिछड़ों और वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है। हमें एक सहानुभूतिपूर्ण और जिम्मेदार समाज के निर्माण के लिए अहिंसा की शक्ति को पुनर्जागृत करना होगा। हमारे समाज के बहुलवाद के निर्माण के पीछे सदियों से विचारों को आत्मसात करने की प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि संस्कृति, पंथ और भाषा की विविधता ही भारत को विशेष बनाती है। प्रणब ने अपने भाषण में कहा, जैसे-जैसे इंसान की उम्र बढ़ती है उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ती है। परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं है। पिछले 50 सालों के सार्वजनिक जीवन के दौरान भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है, भारत की संसद मेरा मंदिर रहा है और जनता की सेवा मेरी अभिलाषा रही है।
वर्तमान और पूर्व महामहिम ने जो भाव प्रकट किये हैं उनमें संविधान निर्माता डा. भीम राव अम्बेडकर की छाप हमें स्पष्ट दिखाई देती है। डा. भीमराव अम्बेडकर ने 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुए लोकतंत्र को किस तरह सफल बनाया जा सकता है इस पर कहा था 'लोकतंत्र टिकाये रखना हो तो जो पहला काम करना चाहिए वह यह कि अपने सामाजिक और आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए हमें केवल विधिसम्मत मार्ग को ही अपनाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि खूनखराबे के रास्ते वर्जित कर देने चाहिए। नियम-भंग, असहयोग और सत्याग्रह हमें वर्जित कर देना चाहिए क्योंकि संविधानेतर मार्ग अराजकता का ही व्याकरण है।' यह कहते हुए कि लोकतंत्र को दूसरा खतरा व्यक्तिपूजा से होता है, उन्होंने जान स्टुअर्ट मिल के विचारों की याद दिलायी। मिल कहते हैं- 'कोई व्यक्ति कितना भी महान हुआ तो भी उसके चरणों में लोगों को अपनी स्वतंत्रता अर्पित नहीं करनी चाहिए, या फिर अपनी संस्थाओं का वह नाश करने में समर्थ हो जाये इतनी बड़ी सत्ता उसके हाथों में नहीं सौंपनी चाहिए।' उन्होंने आगे कहा-'जिन महान लोगों ने जीवनभर राष्ट्र की सेवा की, उनके प्रति कृतज्ञता रखने में कोई हर्ज नहीं है, मगर ऐसी कृतज्ञता की कुछ सीमायें होती हैं। आयरिश देशभक्त ओकोनील के कथानानुसार अपनी आत्मप्रष्ठिता की बलि चढ़ा कर कोई भी राष्ट्र कृतज्ञ नहीं रह सकता। अन्य किसी भी देश की तुलना में भारत में यह सतर्कता रखनी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि भारत की राजनीति में व्यक्तिपूजा का इतना जबरदस्त परिणाम होता है कि दुनिया के किसी भी दूसरे देश की राजनीति में नहीं होता। राजनीति में भक्ति या व्यक्तिपूजा अधोगति का और अंतत: तानाशाही का निश्चित मार्ग है यही समझना चाहिए।' लोकतंत्र का अस्तित्व अक्षुष्ण बनाये रखने के लिए जो तीसरी बात करनी है वह यह कि केवल राजनीतिक लोकतंत्र से वे संतुष्ट होकर न रह जायें। राजनीतिक लोकतंत्र का उन्हें सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र में रूपांतरण करना चाहिए। सामाजिक लोकतंत्र याने यह मान्य करने वाली पद्धति है कि समता, स्वतंत्रता और बंधुता प्रत्येक व्यक्ति के जीवन-तत्व हैं। स्वतंत्रता, समता और बंधुता एक अखंड और अविभाज्य त्रिमूर्ति हैं। यदि सामाजिक समता नहीं होगी तो स्वाधीनता का अर्थ होगा कि मुठ्ठी भर लोगों का जनता पर शासन, समता यदि स्वाधीनता से रहित होगी तो वह व्यक्तियों के जीवन की आत्मप्रेरणा नष्ट कर देगी। यदि बंधुता नहीं होगी तो समता और स्वतंत्रता की स्वाभाविक वृद्धि नहीं होगी।
आजादी के 70 वर्ष जिस तरह महामहिम का आना और जाना हुआ है और जो विचार विशेषता विविधता, समानता और स्वतंत्रता को लेकर दिए उससे दोनों महानुभवों पर डा. भीमराव अम्बेडकर के विचारों का प्रभाव दिखाई देता है, वहीं भारतीय लोकतंत्र की सफलता को भी देखा व समझा जा सकता है। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत ही है।  

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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