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चीन का खतरा

Publish Date: July 30 2017 01:12:27pm

सेना और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की दो दिवसीय कांफ्रेंस एमीकोन 2017 के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद ने कहा, भारत से पांच गुनी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद चीन हमारे पड़ोस के हिमालयी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इतनी बड़ी सेना होने और दोनों देशों के बीच हिमालय जैसा पहाड़ होने के बावजूद वह आने वाले वर्षों में हमारे लिए खतरा हो सकता है। ले. जनरल चंद ने कहा, चीन के रक्षा खर्च का एक बड़ा हिस्सा अघोषित है। भारत को मौजूदा परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए अपनी सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। आर्थिक विकास को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सैन्य क्षमता होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक छोटा देश और छोटी अर्थव्यवस्था है। इसलिए वह भारत के साथ बड़ी जंग की बजाय परोक्ष युद्ध लड़ रहा है। यह पाकिस्तान के सदाबहार साथी चीन के लिए भी सुविधाजनक है। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत के ढाई मोर्चों पर युद्ध के लिए तैयार रहने के बयान पर उन्होंने कहा कि उनका आशय युद्ध का उन्माद बढ़ाने के लिए नहीं था। उनके कहने का अर्थ यह था कि भारत को अपनी सुरक्षा पर और ध्यान देने की आवश्यकता है। पिछले महीने चीन की सेना ने जनरल रावत के बयान को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए उनसे युद्ध का शोर मचाना बंद करने को कहा था। भूटान में इंडियन मिलिट्री ट्रेनिंग टीम के कमांडर मेजर जनरल अपूर्व बरदलाई के मुताबिक, दरअसल चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी इस बात से चिंतित है कि भारत के पास अब इस हिमालयी क्षेत्र में काफी अच्छा इंफ्रास्ट्रक्टचर है। यहां भारत ने कई अग्रिम लैंडिंग क्षेत्र तैयार कर लिए हैं। इससे सेना की एयरलिफ्ट क्षमता भी बढ़ गई है। सेना में अमेरिका से मिले ट्रांसपोर्ट विमानों के शामिल हो जाने के बाद हिमालयी इलाके में भारतीय फौज को बढ़त मिल गई है। हर गुजरते दिन के साथ भारत क्षमता के मामले में चीन से अपने अंतर को पाट रहा है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों कैग की रिपोर्ट को आधार बनाकर यह बात सामने आई थी कि भारतीय सेना के पास मात्र 10 दिन के युद्ध के लिए ही गोला-बारुद व हथियार हैं। इस पर राज्यसभा में उत्तर देते हुए रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि भारतीय सेना के पास गोला-बारूद की कोई कमी नहीं है और भारतीय सशस्त्र बल देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।

डोकलाम क्षेत्र को लेकर जिस तरह चीन धमकियां दे रहा है उस कारण सारा देश इस बात को ले चिंतन कर रहा है कि अगर चीन के साथ युद्ध छिड़ गया तो तब हमारी स्थिति क्या रहेगी। इस चिंतन के पीछे चीन की वह धमकी है जो 1962 की याद दिलाती है। 1962 में चीन ने भारत के भरोसे को तोड़ते हुए जो हमला किया था उसे भारत का प्रत्येक नागरिक आज भी नहीं भूला। अब 1962 वाला भारत नहीं रहा। भारत आज सतर्क है और चीन के नापाक इरादों को समझता भी है तथा चीन को ईंट का जबाव पत्थर से देने के लिए भी तैयार है।

उपरोक्त स्थिति को ध्यान में रखने के बावजूद भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा हेतु और सतर्क व सजग होने की आवश्यकता है। भारतीय जवान का लोहा आज देश व दुनिया मानती है, लेकिन जो कार्य तोपों, जंगी जहाजों, हवाइ जहाजों और अन्य हथियारों ने करना है उसको भी भारत को न•ारअंदाज नहीं करना चाहिए। टैंकों, हवाई जहाजों व तोपों तथा अन्य हथियारों की संख्या के मामले में चीन हमारे से काफी आगे है, यह बात जगजाहिर है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के बढ़ते कद व कदम ही चीन के लिए परेशानी का मुख्य कारण हैं। डोकलाम तो भारत के बढ़ते कदमों को रोकनें का बहाना मात्र ही है। भारत को आज नहीं तो कल चीन का हर स्तर पर मुकाबला करने के लिए तैयार होने की आवश्यकता है। विशेषतया सैनिक, राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर भारत की मजबूती आज चीन के लिए बेशक परेशानी का कारण है, लेकिन जितना अधिक भारत

उपरोक्त क्षेत्रों में मजबूत होगा उतनी जल्द चीन सत्य को स्वीकार भी कर लेगा।
भारत को चीन से खतरे को ध्यान में रख कर अपने को राजनीतिक, आर्थिक व सैन्य क्षेत्र में मजबूत करने को प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि चीन कभी भी शरारत कर सकता है।  

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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