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खेल और खिलाड़ी

Publish Date: July 31 2017 04:40:15pm

भारतीय क्रिकेट टीम ने श्रीलंका में श्रीलंका की क्रिकेट टीम को पहले पांच दिवसीय टेस्ट में 304 रनों से हराकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। भारतीय टीम की सफलता करीब-करीब देश के सभी समाचार पत्रों में सुर्खियां बनीं हैं। इससे पहले भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वल्र्ड कप के फाइनल जिसमें वह हार तो गई पर एक अच्छा खेल खेलने के कारण उन्हें देशभर में सराहा भी गया। महिला क्रिकेट खिलाडिय़ों की यह शिकायत थी कि जो धन व शोहरत पुरुषों की क्रिकेट टीम के सदस्यों को मिलते हैं, वह महिलाओं को नहीं दी जाती। महिला खिलाडिय़ों की बात उचित ही है और धरातल का सत्य भी यही है। 


क्रिकेट के अलावा जब हम दूसरें खेलों विशेषतया एथलेटिक्स के खिलाडिय़ों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि उनको आर्थिक सहायता व मान-सम्मान क्रिकेट के खिलाडिय़ों से काफी कम मिलता है। पिछले कुछ वर्षों से कुश्ती, मुक्केबाजी, बैडमिंटन तथा टैनिस के खिलाडिय़ों की आर्थिक स्थिति पहले से काफी बेहतर दिखाई देती है, लेकिन यह कुछ चुनिंदा खिलाड़ी हैं, विशेषतया वो हैं जो विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने में सफल हुए हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले खिलाडिय़ों की स्थिति उपरोक्त स्तर के खिलाडिय़ों से काफी कमजोर है। कटु सत्य यह है कि कुछ समय पश्चात खिलाडिय़ों को भुला भी दिया जाता है। राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समय-समय पर अच्छा खेल प्रदर्शित करने वाले खिलाड़ी जो आर्थिक स्थिति से कमजोर होते हैं उनकी स्थिति समय के साथ दयनीय हो जाती है। 

पिछले दिनों राष्ट्रीय स्तर के तीन खिलाडिय़ों की दयनीय स्थिति को लेकर समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार अनुसार गरीबी और आर्थिक मदद न मिल पाने के कारण नेशनल टूर्नांमेंट में गोल्ड मेडल जीत चुके खिलाड़ी खेल छोडऩे को मजबूर हैं। ये तीन खिलाड़ी हैं पॉवर लिफ्टर विनोद नाथ, विजय यादव और बॉडी बिल्डर जुबेर कुरैशी। ये तीनों खिलाड़ी पैसे न होने के कारण अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सके। इनके पास तो डाइट तक के लिए पैसे नहीं हैं, इसलिए कोई घर चलाने के लिए मजदूरी कर रहा है तो किसी ने चाउमीन का ठेला लगाया है।

विनोद नाथ राज्य स्तरीय ओपनर पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता में 9 गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। उन्होंने नेशनल प्रतियोगिता में भी गोल्ड जीता। उनका चयन द. अफ्रीका में इंटरनेशनल पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता के लिए हुआ। वहां जाने के लिए 60 हजार रुपये की जरूरत थी। सरकार से मदद मांगी, लेकिन नहीं मिली। इस कारण टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं ले सके। चाउमीन का ठेला लगाकर घर का खर्च चला रहे हैं।
विजय यादव ने नेशनल स्कूल गेम्स में पॉवर लिफ्टिंग में गोल्ड जीता। इसके अलावा राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में भी 12 गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। अपने खर्च पर ही हमेशा तैयारी की और टूर्नामेंट में हिस्सा लिया। खेल विभाग की ओर से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली। अब विजय मजदूरी कर  अपना पेट पालने को मजबूर हैं।

जुबेर कुरैशी दो बार बॉडी बिल्डिंग वल्र्ड चैंपियनशिप में हिस्सा ले चुके हैं। जुबेर तीन बार मिस्टर एमपी चैंपियन ऑफ चैंपियन बन चुके हैं। लेकिन अब उनके पास डाइट के लिए भी पैसे नहीं हैं। इस कारण खेल से दूरी बनाने को मजबूर हैं। आर्थिक मदद के लिए सरकार को लिख चुके हैं, लेकिन अभी तक आर्थिक मदद नहीं मिली है। 

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि देश में आज भी खिलाडिय़ों के प्रति कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई। राष्ट्रीय या अतंर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने के बाद ही कुछ भाग्यशाली खिलाडिय़ों के भाग्य खुल जाते हैं लेकिन राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले खिलाड़ी तो आर्थिक सहायता के लिए तरस जाते हैं। अधिकतर का तो खेल जीवन ही समाप्त हो जाता है।

खेलों के प्रति उदासीनता आज से नहीं बल्कि जबसे देश आजाद हुआ है तभी से चली आ रही है। क्रिकेट खेल संघ एक अपवाद है जिसके पास खिलाडिय़ों को धन देने के लिए एक बड़ी रकम है। देश के अधिकतर खेल संघों के पास तो धन ही नहीं है जो धन सरकार की तरफ से मिलता भी है उसका अधिकतर भाग तो संगठन के पदाधिकारियों के खर्च में ही लग जाता है। खिलाडिय़ों के पास तो शायद 20 से 25 प्रतिशत ही जाता है। 

जनसंख्या के हिसाब से चीन के बाद भारत विश्व के दूसरे स्थान पर है लेकिन अगर ओलंपिक खेलों में मेडल प्राप्ति को देखें तो हम चीन से कहीं पीछे हैं। चीन ही क्या हम विश्व के कई छोटे-छोटे देशों से मेडल प्राप्ति के मामले में पीछे हैं। इसका मूल कारण यही है कि हम में खेल और खिलाडिय़ों प्रति उदासीनता ही है। अपनी मेहनत व लग्न के कारण जो खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर आते हैं उनके प्रति भी हमारी नीति स्पष्ट नहीं है। इस कारण उनका भविष्य धूमिल हो जाता है। अगर हम विश्व स्तर पर विशेषतया ओलंपिक खेलों में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं तो हमें राष्ट्रीय नहीं बल्कि जिला व प्रदेश स्तर पर खिलाडिय़ों को संरक्षण व समर्थन देना होगा। प्रदेश व देश का नाम रोशन करने वाले खिलाडिय़ों को जब आर्थिक सहायता मिलनी शुरू हो जाएगी तो यही खिलाड़ी आगे चलकर अंतर्राष्टीय स्तर पर देश का नाम चमकाएंगे।

जिस खिलाड़ी को पेट भरने के लिए मजदूरी करनी पड़े या रेहड़ी लगानी पड़े वह कैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अन्य देशों के खिलाडिय़ों का मुकाबला कर सकेगा। अति दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन खिलाडिय़ों ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीते भी हैं, उनमें से भी कुछ को पेट भरने के लिए मेडल बेचने पड़़ रहे हैं। खेल व खिलाडिय़ों प्रति उदासीनता देश की प्रतिभाओं के भविष्य को धूमिल कर  रही है। सरकार व समाज को चाहिए कि वह खेल और खिलाडिय़ों के उज्जवल भविष्य के लिए उदासीनता का त्याग कर खिलाडिय़ों को मान-सम्मान के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी दें ताकि वह एक सम्मानजनक जीवन जी सकें।

खाली पेट तो प्रभु का नाम भी नहीं लिया जा सकता। इस बात को ध्यान में रखते हुए खिालिडिय़ों की मदद के लिए सरकार व समाज को आगे आने की आवश्यकता है।    

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।
 

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