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वरुण गांधी की चिंता

Publish Date: August 04 2017 01:42:46pm

भाजपा सांसद वरुण गांधी ने लोकसभा में सांसदों द्वारा अपना वेतन व भत्ते स्वयं बढ़ाने के मुद्दे पर चिंता प्रकट करते हुए कहा कि 'देश के इस तरह के हालात में सांसदों को स्वयं का वेतन बढ़ाने का अधिकार नहीं होना चाहिए और इसके लिए ब्रिटेन की संसद की तर्ज पर एक बाहरी निकाय बनाया जाना चाहिए जिसमें सांसदों का हस्तक्षेप नहीं हो। भाजपा के वरुण गांधी ने शून्यकाल में इस विषय को उठाते हुए कहा कि राजकोष से अपने स्वयं के वित्तीय संकलन को बढ़ाने का अधिकार हथियाना हमारी प्रजातान्त्रिक नैतिकता के अनुरूप नहीं है। इस देश की ज्यादा से ज्यादा अच्छाई के लिए, हमें वेतन निर्धारित करने के लिहाज से सदस्यों से स्वतंत्र एक बाहरी निकाय बनाना होगा। अगर हम स्वयं को विनियमित करते हैं और देश के हालात तथा समाज में अंतिम व्यक्ति की आर्थिक स्थितियों पर विचार करते हैं, तो हमें कम से कम इस संसद की अवधि के लिए अपने विशेषाधिकारों को छोड़ देना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की संसद में एक स्वतंत्र प्राधिकरण है। गैर सदस्यों का यह निकाय सरकार को सांसदों के वेतन और पेंशन के लिए सलाह देता है। इसके लिए यह प्राधिकरण लाभार्थियों एवं जनता दोनों की सिफारिशों को संज्ञान में लेकर सिफारिशों की वैधता एवं सरकार के सामथ्र्य की जांच करता है। इस तरह का तंत्र हमारे देश में नहीं है। वरुण गांधी के अनुसार महात्मा गांधी ने एक बार लिखा था कि ''मेरी राय में सांसदों और विधायकों द्वारा लिए जा रहे भत्ते उनकी राष्ट्र को दी गई सेवाओं के अनुपात में होने चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में ब्रिटेन के 13 फीसद की तुलना में हमने अपने वेतन 400 प्रतिशत बढ़ाए हैं। क्या हमने सही में इतनी भारी उपलब्धि अर्जित की है ? यदि हम अपने पिछले दो दशक के प्रदर्शन पर नजर डालें तो मात्र 50 फीसद विधेयक संसदीय समितियों से जांच के बाद पारित किए गए हैं। जब विधेयक बिना किसी गंभीर विचार-विमर्श के पारित हो जाते हैं, तो यह संसद के होने के उद्देश्य को पराजित करता है। 

विधेयक को पारित करने की हड़बड़ी राजनीति के लिए प्राथमिकता दिखाती है, नीति के लिए नहीं। 41 फीसद बिल सदन में चर्चा के बिना ही पारित किये गये। उन्होंने कहा कि कुछ लोग हैं जो कहते हैं कि सांसदों का वेतन निजी क्षेत्र के अनुरूप होना चाहिए। वे लोग जो निजी क्षेत्र में काम करते हैं वे प्राथमिक रूप से स्वयं के हित के लिए कार्यरत होते हैं। हम सांसद लोग देश सेवा के लिए कार्यरत होते हैं, यह हमारे सपनों का भारत बनाने का एक मिशन है, इन दो उद्देश्यों की तुलना करना सार्वजनिक जीवन के प्रति प्रतिबद्धता को गलत तरीके से समझना है। वरुण ने कहा-वेतन के संबंध में मामलों को बार-बार उठाया जाता है, यह मुझे सदन की नैतिक परिधि के बारे में चिंतित करता है। पिछले एक साल में करीब 18,000 किसानों ने आत्महत्या की है। हमारा ध्यान कहां है?  कुछ सप्ताह पहले तमिलनाडु के एक किसान ने अपने राज्य के कृषकों की पीड़ा पर क्षोभ प्रकट करते हुए राष्ट्रीय राजधानी में आत्महत्या का प्रयास किया। 

सांसद हों या विधायक यह सदन व सभाओं में अपने-अपने दल की विचारधारा का ही बचाव करते हैं। जन सेवा के नाम पर यह एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं और कई बार तो मर्यादा की सभी सीमाओं को तोड़ एक-दूसरे के साथ हाथापाई और कुर्सियां तक फैंकने पर उतर आते हैं। संसद हो या प्रदेश की विधानसभा सभी में आप को हुल्लड़बा और शोर शराबा देखने को मिलेगा।

उपरोक्त सब कुछ जन सेवा के नाम पर होता है। अपनों को सेवक कहने वाले मेवा खाने याने अपने वेतन व भत्ते बढ़ाने हेतु एकजुट हो जाते हैं। राजनीति में परिवर्तन लाने के नाम पर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी ने जिस ढंग से विधायकों के वेतन व भत्ते बढ़ाये उससे सारा देश हैरान रह गया था। दिल्ली के बाद पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश सभी प्रदेशों के विधायकों ने अपने वेतन व भत्ते एक आवाज में ही बढ़ा लिए।

इनके बढ़े वेतन व भत्तों को देख सांसदों ने भी अपना वेतन व भत्ते बढ़ाने की मांग की जो पूरी भी होगी। उसी मुद्दे को लेकर भाजपा के सांसद वरुण गांधी ने नैतिकता को आधार बनाकर अपनी चिंता प्रकट की है। गौरतलब है कि राजनीति में जो आता है वह अपनी स्वयं की इच्छा से आता है और देश व समाज की सेवा का लक्ष्य अपने सामने रखता है। ऐसे सेवकों के लिए महात्मा गांधी ने कहा था कि 'जो व्यक्ति सेवा के लिए समर्पित है, वह एक क्षण के लिए भी अपनी सुख-सुविधाओं की चिंता नहीं करता, यह चिंता वह भगवान के ऊपर छोड़ देता है-वह दे या न दे। इसलिए वह अपने सामने पडऩे वाली हर चीज को लादकर नहीं चलता, वह सिर्फ उतनी चीज ले लेता है जितनी उसके लिए अनिवार्य है और बाकी छोड़ देता है। वह शांत क्रोधमुक्त और असुविधा की स्थिति में भी मन से अविचल रहता है। सद्गुण की तरह उसकी सेवा भी स्वयं अपना ही पुरस्कार है और वह इसी में संतोष का अनुभव करता है। एक बात और है कि सेवा में प्रमाद अथवा शैथिल्य कभी नहीं होना चाहिए। जो यह समझता है कि उसे अपना निजी व्यवसाय तो परिश्रमपूर्वक करना है और बिना कोई पैसा लिए किया जाने वाला सार्वजनिक कार्य वह जैसे चाहे और जब चाहे, कर सकता है तो यह मान लेना चाहिए कि उसे अभी त्याग के विज्ञान के बुनियादी नियमों का भी ज्ञान नहीं है। मनुष्य को स्वैच्छिक सेवा करते समय अपनी अधिकतम योग्यता का इस्तेमाल करना चाहिए और उसे अपने निजी काम से पहले करना चाहिए। वस्तुत: सच्चा भक्त बिना किसी शर्त के स्वयं को मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर देता है। 

गांधी जी के उपरोक्त संदेश को भूल आज तो सेवा के नाम पर मेवा ही लक्ष्य है। देश के अधिकतर राजनीतिज्ञों की छवि सेवा करने वाली नहीं बल्कि मेवा खाने वाली है। ऐसे में भाजपा सांसद वरुण गांधी का चिंतित होना एक शुभ संकेत है। गांधी द्वारा दिए सुझाव पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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