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केरल हिंसा

Publish Date: August 08 2017 04:59:11pm

पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश के परिवार वालों से मिलने पहुंचे केन्द्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कहा कि यदि ऐसी घटनाएं भाजपा या एनडीए शासित राज्यों में होती तो अवार्ड वापसी का दौर शुरू हो जाता और संसद को ठप कर दिया जाता। राजेश के शरीर पर 89 घाव उनके साथ हुई बर्बरता को बयां करने के लिए काफी हैं, इन्हें देख आतंकी भी सहम जाते। ऐसी हैवानियत तो आतंकवादी भी नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि यह दुखद है कि माकपा के सत्ता में आते ही हिंसा की घटनाएं शुरू हो जाती हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की हत्या होने लगती है और पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है। उन्होंने पुलिस और राज्य सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि वे निष्पक्षता से कार्रवाई नहीं करेंगे तो राज्य में हिंसा का माहौल कभी खत्म नहीं होगा। आखिरकार यह राÓय सरकार की जिम्मेदारी है कि दोषियों पर कार्रवाई हो और उन्हें कड़ी सजा मिले। उन्होंने कहा कि आरएसएस-भाजपा को हिंसा द्वारा खत्म नहीं किया जा सकता। 

जेटली ने सरकार में हो रही हिंसा पर कुछ राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों की कथित चुप्पी पर पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने तंज कसा, इस तरह की हिंसा के लिए दोहरा रवैया नहीं अपनाया जा सकता। जैसा केरल में हुआ, वैसा अगर किसी भाजपा या एनडीए शासित राज्य में होता तो अवार्ड वापसी शुरू हो जाती, संपादकीय लिखे जाते और यहां तक कि संसद को चलने नहीं दिया जाता। राज्य सरकार को राजनीतिक इ'छाशक्ति की जरूरत है ताकि वह अपने कैडर को अनुशासित रख सकें। 

देश में आ रहे राजनीतिक परिवर्तन का विरोध करने वाले अब हिंसा पर उतारू हैं। केरल में तो पिछले काफी समय से भाजपा व संघ के कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं लेकिन कांग्रेस व वामपंथी जो आए दिन भाजपा व संघ को कट्टरवादी कह कर कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करते हैं आज चुप बैठे हैं। वित्तमंत्री का यह कहना ठीक है कि अगर  ऐसी हिंसा किसी भाजपा शासित राज्य में होती तो एक बाद एक तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा सरकार से त्यागपत्र की मांग की होती और हिंसा विरुद्ध अपना विरोध जताने हेतु सरकार द्वारा दिए मैडलों की वापसी की घोषणा की होती। अब संघ कार्यकर्ता की हत्या हुई है तो उपरोक्त तथाकथित बुद्धिजीवियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।

मानव अधिकार के समर्थन और कट्टरवाद का विरोध करने के नाम पर उपरोक्त तथाकथित बुद्धिजीवियों ने मात्र संघ और भाजपा का विरोध करने के सिवा कुछ नहीं किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद सत्ता सुख लेने वाली कांग्रेस और वामदलों के लिए देश के सामाजिक व राजनीतिक स्तर में आ रहे परिवर्तन को स्वीकार करना मुश्किल हो रहा है। इसी कारण वह संघ और भाजपा के बढ़ते कदमों का प्रत्येक स्तर पर विरोध कर रहे हैं। 
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। देश में छ: दशक तक कांग्रेस तथा वामपंथियों को ही सत्ता सुख मिला है। अटल बिहारी वाजपेई की सरकार के बाद नरेन्द्र मोदी की सरकार को मिला बहुमत दर्शाता है कि देश का नागरिक अब परिवर्तन चाह रहा है क्योंकि कांग्रेस केन्द्र में सुशासन देने में असफल रही है। पंजाब में कांग्रेस का सत्ता में आने का मुख्य कारण बादल सरकार प्रति शहरी हिन्दुओं का गुस्सा और दूसरा कै. अमरेन्द्र सिंह की छवि है। कांग्रेस पंजाब में बिना कै. अमरेन्द्र सिंह के आज भी अपने दम पर चुनाव नहीं जीत सकती। अकाली दल के नेताओं विशेषतया मजीठिया प्रति जो रोष था, उस कारण पंजाब के शहरी विशेषतया हिन्दू मतदाता ने कैप्टन की कांग्रेस को विकल्प के रूप में चुना।

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस तथा वामपंथियों की तुष्टिकरण की नीति से जागरूक मतदाता दुखी हैं। विरोधी दलों की दोगली नीति से भी जनसाधारण नाराज ही है। इसी कारण कांग्रेस व वामपंथियों का राजनीतिक आधार कमजोर हो रहा है। विरोधी दलों की दोगली नीति भी एक बड़ी चुनौती बन कर खड़ी है। हिंसा तो हिंसा है वह चाहे किसी द्वारा भी की गई हो, उसका विरोध होना चाहिए। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। इसमें हिंसा एक अपराध ही है और अपराधी को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए। दुख तब होता है, जब हिंसा का विरोध भी राजनीतिक लाभ-हानि को सम्मुख रख विरोधी दल करते हैं। विपक्षी दलों की केरल में हुई हिंसा प्रति चुप्पी उनकी दोगली नीति को ही दर्शाती है। यह बात देश के लिए घातक है। केरल की सरकार को जहां संघ और भाजपा के कार्यकर्ताओं पर हमले के दोषियों को एक समय सीमा में सजा दिलवानी चाहिए। वहीं केन्द्रीय सरकार को प्रदेश की सरकार पर नजर रखते हुए संघ व भाजपा कार्यकर्ताओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए।

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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