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दम तोड़ती व्यवस्था

Publish Date: August 13 2017 04:49:42pm

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर है और गोरखपुर के प्रति उनका विशेष ध्यान भी है। पिछले दिनों वह गोरखपुर की यात्रा के दौरान उस अस्पताल भी गए थे जो आज अपनी दम तोड़ती व्यवस्था के कारण देश और दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है।

प्राप्त सूचना के अनुसार बीआरडी मेेडिकल कालेज के नेहरू अस्पताल में आक्सीजन सप्लाई करने वाली फर्म का 69 लाख रुपये का भुगतान बकाया था जिसके चलते गुरुवार शाम को फर्म ने अस्पताल में लिक्विड ऑक्सीजन की आपूर्ति ठप्प कर दी। गुरुवार से ही मेडिकल कालेज में जम्बो सिलेंडरों से गैस की आपूर्ति की जा रही थी। बीआरडी मेडिकल कालेज में 2 साल पहले लिक्विड ऑक्सीजन का प्लांट लगाया गया था। इसके जरिए इंसेफेलाइटिस वार्ड सहित करीब 300 मरीजों को पाइप के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। पहली बार रात 8 बजे इंसेफेलाइटिस वार्ड में ऑक्सीजन सिलेंडरों से की जा रही सप्लाई ठप्प हो गई। इसके बाद वार्ड को लिक्विड ऑक्सीजन से जोड़ा गया। यह भी रात 11:30 बजे खत्म हो गई। यह देख वहां तैनात आप्रेटर के होश उड़ गए। उसने जिम्मेदार अधिकारियों को फोन मिलाना शुरू किया लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया। इस बीच रात 1.30 बजे तक सप्लाई ठप रही। वार्ड में भर्ती 50 से अधिक मरीज बेहोशी की हालत में थे। उनकी हालत अचानक बिगडऩे लगी। डाक्टर व स्टाफ सन्न रह गए। चेहरे पर तनाव था लेकिन रात में कोई जुबां खोलने को तैयार नहीं था। खबर लिखे जाने तक 30 बच्चों की मौत हो चुकी थी।

उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के आदेश दे दिए और आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी पर छापे भी मारे हैं। दूसरी तरफ बीआरडी मेडिकल कालेज प्रबंधक कमेटी का कहना है कि मुख्य कारण आक्सीजन की कभी नहीं बल्कि बीमारी है। इससे स्पष्ट हो रहा है कि मेडिकल कालेज अपनी गलती पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहा है। आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का कहना है कि उस कालेज ने उसे 5 लाख रुपये देने थे जो कंपनी द्वारा नोटिस दिए जाने के बाद भी नहीं दिए गए लेकिन अब दो दिनों में 22 लाख और 40 लाख का भुगतान हो गया है और आक्सीजन की सप्लाई भी शुरू हो गई है।

कालेज के प्रिसिंपल महोदय ने कंपनी के भुगतान में देरी क्यों की जबकि देने के लिए रकम उनके पास थी। दूसरी बात जब आक्सीजन की कमी का पता चलने लगा था और मरीज बेहोशी की हालत में आ गए, तब कालेज और अस्पताल के अधिकारियों ने क्यों नहीं, कंपनी या फिर जिला प्रशासन से मसले को हल करने के लिए संपर्क किया। कुछ दिन पहले जब योगी आदित्यनाथ स्वयं गोरखपुर गए थे, तो उनके ध्यान में कंपनी उपरोक्त मामला क्यों नहीं लाई थी। 

बच्चों की मौत के बाद उनका पोस्टमार्टम न कराना और उनके मां-बाप को मृत बालक सौंप वहां से भगा देना यह सब बातें दर्शाती हैं कि कालेज व अस्पताल के अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को नहीं समझा या समझ कर भी उदासीन रहे। सरकार को उपरोक्त मामले की गंभीरता को समझते हुए तथा अन्य सरकारी अस्पतालों के लिए एक कड़ा संदेश देने हेतु लापरवाह अधिकारियों को सख्त से सख्त सजा देनी चाहिए और पीडि़त परिवारों को उचित मुआवजा देना चाहिए।

उपरोक्त सब कुछ एक समय सीमा के बीच उत्तर प्रदेश सरकार को करना होगा। योगी आदित्यनाथ की नियत व नीति पर कोई शक नहीं किया जा सकता, लेकिन इंसाफ मिलने में अगर देरी होती है तो योगी सरकार की साख व छवि दोनों ही धूमिल होंगी। जिस तरह की लापरवाही गोरखपुर के अस्पताल में देखने को मिली है करीब-करीब उपरोक्त स्थिति देश के अधिकतर सरकारी अस्पतालों में देखने को मिलती है। सरकारी अस्पतालों में अधिकतर गरीब आदमी ही जाते हैं। उनकी गरीबी ही उनके लिए अभिशाप बन जाती है। उन्हें अस्पतालों में न तो गंभीरता से देखा जाता है और न ही ठीक ढंग से इलाज होता है। पिछले दिनों उड़ीसा में वाहन न होने के कारण शव को कंधों पर या साइकिल पर लोग ले जाने को मजबूर होते हैं, इसे देश ने देखा था।

उपरोक्त घटनाएं दर्शाती है कि व्यवस्था दम तोड़ रही है अधिकतर सरकारी कर्मचारी बस वेतन व सुख-सुविधाएं लेने तक सक्रिय रहते हैं अपने कर्तव्यों के प्रति वह उदासीन ही होते हैं। यही कारण है कि एक के बाद एक त्रासदी सामने आती है। लेकिन  दोषी को सजा नहीं मिलती क्योंकि उसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है। समय की मांग है कि व्यवस्था में बुनियादी बदलाव लाया जाए और सही अर्थों में यह गरीब आदमी की सहायक बने, आज तो व्यवस्था गरीब का खून ही पी रही है। इस व्यवस्था को बदलने व सकारात्मक बदलाव लाने के लिए केवल एक मोदी और योगी काफी नहीं, बल्कि सबको मोदी और योगी की भूमिका निभाते हुए एक सकारात्मक भूमिका निभानी होगी। 


-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

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