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आजादी के सात दशक

Publish Date: August 16 2017 01:16:19pm

आज से 70 वर्ष पहले हजारों नहीं लाखों-करोड़ों लोगों के वर्षों के संघर्ष के बाद भारत आजाद हुआ था। आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वालों को प्रणाम। स्वतंत्रता संग्राम में भारतीयों को सफलता तब ही मिली थी जब उन्होंने भाषा और जाति से ऊपर उठकर अंग्रेजी हकूमत के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष किया था। देश के लिए मर मिटने वालों ने स्वतंत्र भारत के बारे एक सपना संजोया हुआ था, लेकिन यह सपना उस समय टूट गया जब भारत का विभाजन हो गया। धर्म के नाम पर विभाजन होने के बाद भारतीय जन मानस ने अपने लिए एक ऐसा संविधान अपनाया जिसमें किसी भी भारतीय नागरिक के साथ जाति, भाषा, लिंग, क्षेत्र या रंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो यह बात सुनिश्चित की।

7 दशक पहले देश के विभाजन के समय चली नफरत की आंधी में धर्म के नाम पर जो खून बहाया गया और जिस तरह रोते-बिलखते परिवारों के झुण्डों के झुण्ड सीमा के उस पार और इस पार से गये उन दिनों को याद कर आज भी दिल दहल जाता है। पाकिस्तान जो धर्म के आधार पर ही आस्तित्व में आया उसका पुन: विभाजन हो गया और बांग्लादेश आस्तित्व में आ गया। भारत के अंग रहे दोनों देश आज इस्लामिक देश हैं, क्योंकि वहां के बहुमत समुदायों ने यह निर्णय लिया। परिणामस्वरूप वहां के अल्पमत समुदायों की दशा आज दयनीय है।

भारत ने 70 वर्ष पहले एक लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई और 70 वर्ष बाद विश्व का सबसे ताकतवर व लोकतांत्रिक देश अमेरिका भारत को एक परिपक्व देश के रूप में देख रहा है। चीन तथा पाकिस्तान द्वारा भारत के प्रति जिस प्रकार की नाकारात्मक नीतियां अपनाई जा रही हैं और उसके उत्तर में भारत ने जो संयम रखा और जिस तरह का व्यवहार किया और समय आने पर जो कदम उठाए उन्हीं के कारण भारत विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहा।

चीन की धमकियां और पाकिस्तान का आतंकवाद को समर्थन व संरक्षण दोनों भारत पर दबाव बनाने में असफल रहे हैं। भारत आज शांति व विकास की राह पर चल रहा है और अपनी ऊर्जा शक्ति को नाकारात्मक कार्यों में इस्तेमाल नहीं करना चाहता। भारत ने समय की मांग को देखते व समझते हुए राजनैतिक, आर्थिक तथा सैन्य संबंधी जो फैसले लिए हैं उन्हें विश्व में सराहा जा रहा है।

भारत के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए विदेशी ताकतें तो अपना काम कर ही रही हैं हमारी अपनी कम•ाोरियां भी हमारी राहों में बड़ी बाधाएं बनकर खड़ी दिखाई दे रही हैं। आंतरिक चुनौतियों में  सबसे बड़ी चुनौती हमारी बढ़ती जनसंख्या है। दूसरी बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार है। तीसरी बड़ी चुनौती अनपढ़ता है। इसी तरह बेरोजगारी तथा सम्प्रदायों के आधार पर समाज का विभाजन अंग्रेजी हकूमत ने अपनी सुविधा के लिए सम्प्रदायों को आपस में लड़ाकर रखने की नीति अपनाई और उस नीति को आधार बना मुसलमानों के एक वर्ग की मांग पर भारत का विभाजन हो गया। देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो गये हैं लेकिन देश आज भी सम्प्रदाय और जाति के साथ, भाषा और क्षेत्र के नाम पर बंटा हुआ है। इसका मूल कारण हमारा राजनीतिक नेतृत्व ही है। आजादी के बाद जिनके हाथ सत्ता आई उन्होंने भी अंग्रेजी हकूमत की नीति को अपनाकर समाज को विभाजित रखने में ही अपनी सत्ता को सुरक्षित समझा। सत्ताधारियों की उपरोक्त नीतियों का यह परिणाम निकला है कि 70 वर्ष बाद भी भारत में भारतीय कम और पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, हिमाचली, राजस्थानी, गुजराती, हरियाणावी इत्यादि अधिक मिल जाएंगे। पिछले 70 वर्षों में प्रदेशों के आपसी झगड़ों को राष्ट्रहित को सम्मुख रख सुलझाने की बजाये प्रदेश व समुदाय को सम्मुख रख सुलझाने के परिणामस्वरूप आज तनाव बढ़ रहा है।

हम भारतीय आपसी मुद्दों को संवाद द्वारा सुलझाने की बजाए ऐसे लड़ते दिखाई दे रहे हैं जैसे कोई दो दुश्मन देश। जिस 'रामराज्यÓ का सपना हमारे संविधान निर्माताओं ने देखा था उससे तो हम भी कोसों दूर हैं। देश में जात-पात के नाम पर खून आज भी बहाया जा रहा है। धर्म के नाम पर आज भी लडऩे को तैयार है। गरीब और दलित की आज भी कोई सुनवाई नहीं है। व्यवस्था का हाल तो गोरखपुर में मासूम बच्चों की मौत से पता चलता है। सरकारी स्कूलों, कालेजों और अस्पतालों की दुर्दशा को देखकर रोना आता है। जिन सरकारी अधिकारियों पर उपरोक्त संस्थाओं की प्रबंधन की जिम्मेवारी है, उनके परिवारों के सदस्य सरकारी स्कूलों, कालेजों व अस्पतालों की तरफ मुंह तक नहीं करते।

देश में अन्न की कमी नहीं लेकिन अन्न बर्बाद हो रहा है और गरीब खाली पेट सोने को मजबूर है। बड़े-बड़े घराने सरकार के और बैंकों के करोड़ों-अरबों रुपए लूटकर अपना मौज मेला करते हैं, जबकि एक छोटा किसान, व्यापारी और उद्योगपति बैंक से लिए कर्जे से परेशान हो आत्महत्या करने को मजबूर है। 70 वर्ष की आजदी के बाद यह जो दोहरे मापदंड हैं, यही सबसे बड़ी परेशानी का कारण हैं। अमीर और गरीब के लिए सरकारी प्रक्रिया में जो भेदभाव दिखता है उसे समाप्त करना आज आजाद भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने नोटबंदी और उसके बाद वस्तु एवं सेवा कर जैसे कदम उठाकर देश की व्यवस्था में परिवर्तन लाने का कार्य तो शुरू किया है लेकिन अभी बहुत कुछ करना बाकी है। सबसे पहले तो राष्ट्र के प्रति जो कत्र्तव्य है उनको निभाने की भावना पैदा करनी होगी। राजनीतिज्ञ जिस तरह की स्वार्थ प्रेरित राजनीति कर रहे हैं यह राष्ट्रहित में नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व की संकीर्ण सोच का कार्यपालिका पर भी प्रभाव पड़ता है। न्यायापालिका पर भी बोझ बढ़ता जा रहा है।

70 वर्ष की आयु में इंसान बुढ़ापे की ओर बढ़ता है लेकिन एक देश जब 70 वर्ष का होता है तो बाल्यकाल से युवा अवस्था में कदम रखता है। भारत आज विश्व के युवा देश के रूप में जाना जाता है और आज युवाओं को रोजगार देने के साथ-साथ दिशा देने की भी आवश्यकता है। युवा शक्ति का सकारात्मक इस्तेमाल ही देश को सही दिशा में आगे बढ़ा सकता है।

देश में वैचारिक स्तर पर परिवर्तन की लहर चल रही है। इस परिवर्तन को लेकर समाज में वाद विवाद भी चल रहा है। इसको लेकर चिंतित होने से बेहतर आप स्वयं चिंतन का हिस्सा बनें क्योंकि आपकी उदासीनता देश के हित में नहीं है। देश का वर्तमान और भविष्य आप के चिंतन पर ही निर्भर है। चिंता नहीं चिंतन कीजिये, यही है आज का मूल मंत्र। जयहिन्द


 -इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।

 

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