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निजता अब मौलिक अधिकार

Publish Date: August 26 2017 12:45:33pm

देश के सर्वोच्च न्यायालय की 9 जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति के साथ कहा है कि निजता देश के हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। निजता को मौलिक अधिकार मानने को अतीत में 1954 में 8 सदस्यीय पीठ और 1962 में छ: सदस्यीय संविधान पीठ ने इंकार कर दिया था, इसलिए निजता के मुद्दे को लेकर अब 9 सदस्यीय पीठ का गठन किया गया था जिसने अतीत में दिए गए निर्णयों को रद्द करते हुए निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ माना है।
यह फैसला सुनाने वाली 9 जजों की संवैधानिक पीठ की अध्यक्षता प्रधान न्यायाधीश जे.एस. खेहर कर रहे थे। पीठ में जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस. बोबड़े, जस्टिस आर.के अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस अभय मनोहर, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस संजय कृष्ण कौल और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर शामिल थे। इस मामले के याचिकाकर्ताओं में कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी, नैशनल कमीशन फार प्रोटैक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स के पहले चेयरमैन रहे मैग्से से पुरस्कार सम्मानित शांता सिन्हा और रिसर्चर कल्याणी सेन मेनन शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस शासित हिमाचल, कर्नाटक, पंजाब और पुड्डुचेरी व तृणमूल शासित पश्चिम बंगाल सरकार ने निजता के अधिकार का समर्थन किया था। उनकी ओर से कपिल सिब्बल ने कहा था, टैक्नोलॉजी एडवांसमैंट के दौर को देखते हुए कोर्ट को निजता के अधिकार पर नए तरीके से विचार करने की जरूरत है। वहीं केंद्र सरकार और भाजपा शासित महाराष्ट्र व गुजरात सरकार ने दलील दी थी कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। निजता का मुद्दा तब उठा जब सोशल वैल्फेयर स्कीम्स का फायदा उठाने के लिए आधार को केंद्र ने जरूरी कर दिया और इसके खिलाफ सुप्रीर्म कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई। इनमें आधार स्कीम की संवैधानिक वैधता को यह कहकर चुनौती दी गई कि यह निजता के बुनियादी हक के खिलाफ है।
निजता के अधिकार का मामला केंद्र सरकार तथा प्रदेश सरकारों द्वारा शुरू हुई योजना को आधार कार्ड से जोड़़ा जाने लगा तब एक वर्ग ने इस पर आपत्ति की और मामला अदालत तक पहुंच गया। भारत से पहले अमेरिका, जापान, स्वीडेन व योरूप के देशों में निजता को मौलिक अधिकार माना जा चुका है।
माननीय न्यायाधीशों ने निजता को मौलिक अधिकार मानते हुए जो दलीलें दी वह काफी महत्वपूर्ण हैं। वो इस प्रकार हैं- न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने कहा कि जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार अविच्छेद्य हैं। इनके बिना गरिमामय मानवीय अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती है। ये संविधान की देन नहीं है। उसमें स्पष्ट कहा गया है कि ये प्राकृतिक अधिकार है। इसलिए ये भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। जबकि निजता संवैधानिक अधिकार है और मौलिक अधिकारों से पैदा होता है। सूचनाओं की निजता भी निजता के अधिकार का अंग है। इसे न सिर्फ सरकार बल्कि गैर सरकारी संगठनों से भी खतरा है। इसके मद्देनजर उन्होंने सरकार को आदेश दिया कि वह डाटा प्रोटेक्शन पर मजबूत कानून बनाए। राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराधों की रोकथाम, सामाजिक कल्याण की योजनाओं, ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने आदि मामलों में सरकार वैद्य तरीके से आंकड़े ले सकती है। सरकार ने जस्टिस श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में इसके लिए एक आयोग का गठन किया है। इसलिए यह काम सरकार पर छोड़ा जाता है। न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर ने कहा कि मौलिक अधिकार लोगों की आजादी में राज्य के दखलंदाजी को रोकने की एकमात्र दीवार हैं। लिहाजा निजता का अधिकार लोगों की प्रमुख आजादियों में से एक है और इसकी सुरक्षा होनी चाहिए। अनुच्छेद 21 में जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, निजता का अधिकार उसी का हिस्सा है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि कोई भी कानूनी अधिकार संपूर्ण नहीं होता। हर अधिकार की एक सीमा है। इसलिए निजता के मौलिक अधिकार की भी एक सीमा है। जस्टिस नरीमन ने निजता के संदर्भ में कई अंतरराष्ट्रीय अदालती निर्णयों का जिक्र किया है। उन्होंने पीयूसीएल बनाम केंद्र सरकार के 1997 के केस का उदाहरण दिया है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि हमें यह कहने में कोई हिचक नहीं है निजता जीने के अधिकार का एक ही हिस्सा है व व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित है।
न्यायाधीश एस.के. कौल ने कहा कि निजता को सुरक्षित रखने की चुनौतियां काफी बड़ी हैं। जब संविधान लिखा गया तब यह सोचा नहीं गया था कि निजता का अधिकार एक दिन इतना अहम हो जाएगा। डिजिटल युग में बच्चे भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। उनके लिए ए बी सी अब एपल, ब्लूटूथ, चैट हो गया है और उसके बाद डाउनलोड, ई-मेल, फेसबुक, गुगल, हॉटमेल और इंस्टाग्राम आते हैं। बच्चों को उनकी बाल सुलभ गलतियों और नौसिखियेपन के दुष्परिणाम से बचाने की जरूरत है। सिर्फ वर्चुअल दुनिया ही नहीं बल्कि वास्तविक जगत में भी उनका सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। टैक्नोलॉजी के कारण आपकी गलतियां हमेशा आपके साथ रहती है और उन्हें छोड़कर आप जीवन दोबारा शुरू नहीं कर सकते हैं।
न्यायाधीश ए.एम. सप्रे ने कहा संविधान की प्रस्तावना में शामिल स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा अलग इकाई नहीं है। इन्हें अलग किया गया तो यह लोकतंत्र के उद्देश्यों के खिलाफ होगा। संविधान के खंड तीन में मौलिक अधिकारों से संबंधित अनुच्छेदों की व्याख्या करते समय प्रस्तावना के इन तत्वों को तवज्जों दी जानी चाहिए। संविधान निर्माताओं क लिए यह संभव नहीं था कि वे हर प्राकृतिक या कानूनी अधिकार का उल्लेख करते। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक व्याख्या के जरिए मौलिक अधिकारों के दायरे को बढ़ाया है। पीठ के सामने जो सवाल आए हैं उनका जवाब ढूंढने के लिए अमेरिकी अदालतों के फैसलों में जाने की जरूरत नहीं है। इस देश के विभिन्न न्यायालयों ने कई मामलों में निजता को मौलिक अधिकार माना है। यह ऐसा अधिकार है जो जन्म से ही व्यक्ति के पास रहता है और उसकी मौत तक साथ रहता है।
न्यायाधीश एस.ए. बोबडे ने कहा कि निजता को मौलिक अधिकार नहीं माना गया तो स्वतंत्रता के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में इससे पहले भी कई मामलों में यह फैसला दिया जा चुका है कि निजता के अधिकार के बिना बाकी सभी मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करना संभव ही नहीं है। हमारे प्राचीन शास्त्रों में भी निजता को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। रामायण हमें बताता है कि किसी अपरिचित पुरुष को किसी महिला को नहीं देखना चाहिए। गृह सूत्र में इस बात का विस्तार से उल्लेख है कि आपको अपना घर किस तरह से बनाना चाहिए ताकि इसमें रहने वालों की निजता की रक्षा हो सके। यही नहीं, पूजा या धार्मिक अनुष्ठान करते समय वेदों का पाठ करते समय और भोजन ग्रहण करते समय आप नितांत अकेले रह सकें। अर्थशास्त्र में कहा गया है कि किसी के भी घर में उसकी अनुमति के बिना प्रवेश नहीं करना चाहिए। दक्षिण भारत में आज भी रामानुज संप्रदाय के लोग किसी गैर की उपस्थिति में भोजन नहीं करते हैं। इसी तरह इस्लाम में भी दूसरे के घर में ताक-झांक करने की मनाही है। हदीस में किसी और का पत्र या कोई संवाद पढऩा निंदनीय माना गया है। ईसाई धर्म में भी बाइबिल में बिना दूसरों की जिन्दगी में दखल दिए जीने की तमन्ना जाहिर की गई है। धार्मिक और परंपरागत रीति-रिवाजों के अलावा हमारे कानून में भी निजता की गांरटी दी गई है। मसलन, नागरिक प्रक्रिया संहिता में पर्दानशीन महिला को कोर्ट में पेशी से छूट दी गई है।
निजता के मौलिक अधिकार मामले में केंद्र सरकार की पैरवी करते हुए अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कहा था कि विकासशील देशों में लाखों लोगों को जीवन की मूलभूत जरूरत की चीजें उपलब्ध नहीं है। रहने की जगह नहीं है, खाने के लिए भोजन नहीं है, पहनने के लिए कपड़े नहीं है, ऐसे में निजता को मौलिक अधिकार बताने का दावा बेमानी है। पर न्यायमूर्ति रोहिंग्टन एफ नरीमन ने इन दलीलों को दरकिनार कर दिया है। उन्होंने कहा, प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में किसी तरह विरोधाभास नहीं है। ये दोनों ही अधिकार स्वाभाविक है और सभी मनुष्य के लिए यह अविभाजित अधिकार है। ऐसे में सभी के व्यक्तित्व को हरसंभव विकास करने की जरूरत है। जीने का अधिकार और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार साथ-साथ चलता है। दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार वास्तव में जीने के अधिकार का ही विस्तार है।
गौरतलब है कि भारतीय संविधान सभी नागरिकों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से कुछ समान अधिकार देता है। इनमें राज्य का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। ये ऐसे अधिकार हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए जरूरी हैं। हमारे मौलिक अधिकारों को 6 श्रेणियों में बांटा गया है। < समानता या समता का अधिकार -स्वतंत्रता का अधिकार - शोषण के विरुद्ध अधिकार -धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार -सांस्कृतिक, शिक्षा संबंधी अधिकार - संवैधानिक उपचारों का अधिकार। 
लेकिन हम सबको एक बात ध्यान में रखनी होगी कि प्रत्येक अधिकार के साथ कुछ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार के साथ कुछ शर्तें भी लगा दी हैं। जिस कारण यह मौलिक अधिकार होने के बावजूद भी पूर्ण अधिकार नहीं। समय और परिस्थितियां इसको प्रभावित करती रहेंगी। उपरोक्त फैसला देश में एक नये दौर की शुरुआत का आधार अवश्य बन गया है।  

-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू। 

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