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खिलाडिय़ों को सम्मान और सुविधा

Publish Date: September 07 2017 01:49:19pm

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने मंत्रिमंडल में किये गये फेरबदल में 2004 के ओलम्पिक में निशानेबाजी में रजत पदक जीतने वाले राज्यवर्धन राठौर को खेल मंत्री की जिम्मेवारी दी गई है। शायद यह पहला अवसर है कि एक ओलम्पिक मेडल विजेता देश का खेल मंत्री बना है। खेल मंत्री पद को संभालने के बाद अपनी पहली पत्रकार वार्ता में मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने कहा कि सबसे पहले मंत्रालय का माहौल बदलना होगा। मेरे लिए वीआईपी सिर्फ खिलाड़ी हैं, कोई और नहीं। यही रवैया सभी का होना चाहिए। उन्होंने बतौर खिलाड़ी अपने सफर को याद करते हुए कहा कि उन्हें खिलाडिय़ों की दिक्कतों का अनुभव है और वे मंत्रालय से खिलाडिय़ों का संपर्क आसान बनाने को प्राथमिकता रखेंगे।  जयपुर ( ग्रामीण ) से पहली बार संसद में आये राठौर ने कहा, खेल मंत्रालय तक का मेरा सफर रिसेप्शन से शुरू होता है जहां से भीतर आने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। खिलाड़ी के रूप में मुझे दिक्कतों का पता है लेकिन यहां अच्छे अधिकारी भी हैं जो खिलाडिय़ों का संबल बनते हैं और मेरा लक्ष्य उनकी संख्या बढ़ाना है। 

उन्होंने कहा कि यह चौबीस घंटे का मंत्रालय होगा क्योंकि टूर्नामेंटों की तैयारियों में जुटे खिलाडिय़ों को कभी भी हमारी जरूरत पड़ सकती है। हमें खिलाडिय़ोंं के लिए हम तक पहुंचना आसान बनाना होगा। हम खिलाडिय़ों की सेवा के लिए ही यहां हैं।  उन्होंने कहा, हर खिलाड़ी को सम्मान और देश का प्रतिनिधित्व करने वालों को सुविधाएं मुहैया कराना हमारा लक्ष्य होगा। खेल सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि युवाओं के लिए बहुत बड़ा मंच है। भारतीय युवाओं में अपार क्षमता है और उन्हें तलाश कर हमें खेलों और खिलाडिय़ों का विकास करना है। राठौर ने केंद्र के अलावा राज्य सरकारों, कारपोरेट जगत, खेल संस्थानों से भी आगे आने की अपील की। 

उन्होंने कहा, कोई भी जिम्मेदारी निभाने के लिए हमें कई लोगों के साथ की जरूरत होती है। मैं ऐसे लोगों की तलाश में हूं जिनमें प्रबंधन कौशल के साथ खिलाड़ी का दिल भी हो। यह पूछने पर कि पूर्व खिलाड़ी होने के कारण क्या उन पर अपेक्षाओं का अधिक दबाव होगा, उन्होंने कहा कि खेलों ने उन्हें चुनौतियों का सामना करना सिखाया है। उन्होंने कहा, अपेक्षाएं तो शुरू से ही रही हैं लेकिन एक खिलाड़ी हारने से कभी नहीं डरता। जीत हार के डर से पीछे हटना मैंने नहीं सीखा है। भारत युवाओं का देश है और इसे खेलों में महाशक्ति होना चाहिए। खेल विकास विधेयक को संसद में लाने और खेलों को फिक्सिंग मुक्त कराने के लिए क्या प्रयास रहेंगे? यह पूछने पर उन्होंने कहा, अभी मैंने कार्यभार संभाला है। मैं विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं को देखूंगा। जहां तक फिक्सिंग की बात है तो खेलप्रेमी कभी नहीं चाहते कि उनके नायक इस तरह की गतिविधि में लिप्त हों। इसका ध्यान रखा जाएगा कि ऐसी चीजें भारतीय खेलों में न हो।

धरातल का सत्य यही है कि भारत में खेल संगठन खिलाडिय़ों को सम्मान नहीं देेेते और खेल संगठनों के पदाधिकारी मठाधीशों की तरह व्यवहार करते हैं। सरकार की उदासीनता का ही परिणाम है कि खिलाड़ी तो खेल संगठनों के पदाधिकारियों के मात्र मोहरे बनकर रह जाते हैं। हाल ही में मणिपुर की दो खिलाडिय़ों जिन्होंने कॉमन वैल्थ में भार उठाने की प्रतियोगिता में स्वर्ण और रजत पदक जीता है वह खेल मंत्रालय के विरुद्ध अपने हक पाने के लिए मुकद्दमा लड़ रही हैं और मुकद्दमे के लिए धन भी दोस्तों व संबंधियों से उधार लिया है। वह वेट लिफ्टर हैं, संजीता और मीराबाई। इसी तरह पिछले दिनों पंजाब के एक पहलवान को न्यायालय ने सरकार को 25 लाख रुपए देने का आदेश दिया है क्योंकि उसको खेलों में भाग लेने से गलती से हवाई अड्डे पर रोक लिया गया था।

जिला, प्रदेश और राष्ट्र स्तर पर खेल संगठनों पर जिस तरह एक अधिकारी, एक राजनीतिज्ञ और एक वर्ग के कब्जे हुए हैं उनको समाप्त करना ही मंत्री राठौर का पहला लक्ष्य होना चाहिए। जब तक संगठनों में बैठे मठाधीशों का सफाया नहीं होता तब तक खिलाडिय़ों को मान-सम्मान नहीं मिल सकता। राठौर स्वयं खेल की दुनिया से जुड़े ही नहीं बल्कि खेल जगत के एक सितारे हैं। इसलिए उनके अपने खट्टे-मीठे अनुभव भी होंगे। लेकिन एक बुनियादी बात को अपनाये बिना खेल और खिलाडिय़ों का विकास संभव नहीं है। वह है खेल संगठनों के पदाधिकारियों पर ओलम्पिक के नियम को लागू करना। जब तक संगठनों में पारदर्शिता और गतिशीलता नहीं आती तब तक बात बनने वाली नहीं। खिलाडिय़ों को 24 घण्टे सुविधा व सहायता देने की जो बात खेलमंत्री राठौर ने की है वह स्वागत योग्य है। खिलाड़ी देश के राजदूत ही होते हैं और उनको मान व सम्मान देना भी देश का कत्र्तव्य है। एक ओलम्पिक पदक विजेता के हाथ में खेल मंत्रालय का आना एक शुभ संकेत है और खेल जगत को आशा है कि भारत में राज्यवर्धन राठौर के नेतृत्व में एक नये दौर की शुरुआत होगी।    


इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, उत्तम हिन्दू

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