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बांटती नहीं, देश को एक सूत्र में बांधती है भाषा: कोविंद

Publish Date: September 14 2017 01:44:08pm

नयी दिल्ली (उत्तम हिन्दू न्यूज): देश का अस्तित्व हिन्दी पर निर्भर बताते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज कहा कि मजहब भले ही बांट सकता है, लेकिन भाषा देश को एक सूत्र में पिरोती है। कोविंद ने हिन्दी दिवस के अवसर पर आज यहां विज्ञान भवन में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा, हिन्दी पर हमारा अस्तित्व निर्भर करता है। मजहब बांट सकता है, लेकिन भाषाएं हमेशा जोड़ती हैं। उन्होंने कहा कि भाषा से जो समीपता तथा निकटता आती है वह किसी अन्य चीज से नहीं आती। 

गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित समारोह की अध्यक्षता केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने की। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर तथा गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू भी समारोह में उपस्थित थे। राष्ट्रपति ने कहा कि देश का अस्तित्व हिन्दी पर ही निर्भर करता है। इसे समझाने के लिए उन्होंने जाने-माने शायर मोहम्मद इकबाल द्वारा लिखे गीत, सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा की अंतिम पंक्तियों का उदाहरण देते हुए कहा, हिन्दी हैं हम, हिन्दी हैं हम। उन्होंने कहा बस इतना ही रहने दीजिए। राष्ट्रपति ने बाद में पूरी पंक्ति बोलते हुए कहा कि इसमें वतन बाद में आता है, हिन्दी हैं हम, वतन है, हिन्दोस्तां हमारा।
 
कोविंद ने कहा कि हिन्दी देश की सामासिक संस्कृति को व्यक्त करने में पूरी तरह सक्षम है और इसके प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दी बोलने वालों के साथ-साथ गैर हिन्दी भाषियों को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि यह भी कहा जा सकता है कि हिन्दी का अस्तित्व गैर हिन्दी भाषियों के हिन्दी के इस्तेमाल पर निर्भर करता है। इसके लिए हिन्दी बोलने वालों को दूसरी भाषाओं तथा क्षेत्रीय बोलियों को भी उचित सम्मान देना होगा।  

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