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सिब्बल के घटिया उदाहरण

Publish Date: May 18 2017 01:53:54pm

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से तीन तलाक के मामले में देश के उच्चतम न्यायालय की पीठ सम्मुख पेश हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व वकील कपिल सिब्बल ने तीन तलाक को मुस्लिमों की आस्था और विश्वास से जुड़ा मसला बताते हुए कहा कि यह उसी तरह आस्था का प्रश्न है जैसे भगवान राम के अयोध्या में जन्म लेने को लेकर हिन्दुओं की आस्था है। जैसे उस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता तो तीन तलाक पर ऐसा क्यों? 

संविधान पीठ के समक्ष सिब्बल ने कहा तीन तलाक सन् 637 से है। इसे गैर-इस्लामी बताने वाले हम कौन होते हैं। सिब्बल ने कहा कि हिन्दुओं में दहेज के खिलाफ एक्ट लाया गया, लेकिन प्रथा के तौर पर दहेज लिया जा सकता है। हिन्दुओं में इस प्रथा को संरक्षण दिया गया है, तो वहीं मुस्लिमों के मामले में इसे असंवैधानिक करार दिया जा रहा है। कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए, नहीं तो सवाल उठेगा कि इस मामले को क्यों सुना जा रहा है।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सिब्बल ने कहा कि अगर पर्सनल लॉ को संविधान के दायरे में देखने लगें तो मुस्लिम लॉ खत्म हो जाएगा और इसका परिणाम व्यापक और गंभीर हो सकता है। सिब्बल ने दलील दी कि गाय जैसे पशु को बचाने के लिए इंसानों का कत्ल कर दिया जाता है और इसके पीछे आस्था का तर्क दिया जाता है। सिब्बल के इस उदाहरण पर संविधान पीठ के मुख्य और भारत के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने कहा कि आप यह घटिया उदाहरण दे रहे हैं। आप इसमें राजनीति घुसा रहे हैं। सिब्बल ने कहा कि मैं इसमें राजनीति नहीं ला रहा। चीफ जस्टिस खेहर ने कहा आप राजनेता भी हैं। न चाहते हुए भी राजनीति वाली बातें आपकी दलीलों में आ जाती हैं। आप हमें सिर्फ यह बताएं कि पर्सनल लॉ शरीयत कानून 1937 ही है। इसे आप साबित करके दिखाओ। सिब्बल: शरियत कानून ही पर्सनल लॉ है। मेरी आस्था क्या है? कोर्ट कैसे तय कर सकता है? पर्सनल लॉ संविधान के तहत सुरक्षित है। बदलाव संसद तय कर सकती है कोर्ट नहीं। जस्टिस नरीमन: तो क्या कोर्ट तीन तलाक का मामला न सुने? सिब्बल हां, बिल्कुल सही कहा। आपको नहीं सुनना चाहिए। जस्टिस नरीमन: पर हमें ऐसा नहीं लगता। चीफ जस्टिस खेहर: आप किस आधार पर कह रहे हैं कि देश के तमाम पर्सनल लॉ को संवैधानिक मान्यता मिलनी चाहिए। सिब्बल: संविधान सभी धर्मों के पर्सनल लॉ को मान्यता देता है। हिन्दुओं में दहेज के खिलाफ कानून है। लेकिन प्रथा के तौर पर आज भी दहेज लिया-दिया जाता है। लेकिन मुस्लिमों से जुड़े आस्था के मामले को असंवैधानिक कहा जा रहा है। तीन तलाक के मामले में कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए। जस्टिस नरीमन: क्या आप बदलाव को बेहतर नहीं मानते? सिब्बल: हम यह नहीं कह रहे कि तीन तलाक कोई अच्छी परम्परा है और हमेशा जारी रहे। लेकिन बदलाव के लिए किसी दूसरे को बाध्य न करे। दूसरे धर्म इसमें दखल देने से बचें।

कटु सत्य वही है जो जस्टिस खेहर ने कहा है। कपिल सिब्बल एक वरिष्ठ वकील के साथ-साथ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी हैं और कांग्रेस का वोट बैंक मुस्लिम मतदाता है जो आजकल कांग्रेस से रुठा हुआ है। सो सिब्बल साहिब मुस्लिम मतदाताओं को कांग्रेस की ओर आकर्षित करने के लिए न्यायालय में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण मुद्दे को ले आए है। कपिल सिब्बल राजनीति के चक्कर में यह भूल गये कि श्रीराम को भगवान मानते हुए अयोध्या को हिन्दू उसी तरह देखते हैं जिस तरह मुस्लिम मक्का को देखते हैं। जहां तक समाज की कुरीतियों का प्रश्न है तो वह सभी समाजों में पाई जाती हैं और उन्हें समय और परिस्थितियों अनुसार सुधारा भी जाता है। आजादी के तुरंत बाद हिन्दू समाज में प्रचलित, बाल विवाह, बहु पत्नी विवाह, तलाक, दहेज प्रथा सहित महिलाओं के अधिकारों से जुड़े अनेक प्रश्नों पर विचार कर सुधार लाने हेतु कानून द्वारा उन्हें रोका गया। कानून अपने उद्देश्य में कितना सफल रहा या समाज ने परिवर्तन को कितना अपनाया यह तस्वीर का दूसरा पहलू है।

तीन तलाक भी एक कुरीति है, इसे आस्था की आड़ में समर्थन व संरक्षण नहीं दिया जा सकता। दूसरी बात एक कानून की सीमित सफलता को देखते हुए कानून द्वारा समाज में परिवर्तन करने का प्रयास तो नहीं छोड़ा जा सकता। इस देश का दुर्भाग्य यह है कि धर्म-निरपेक्षता के नाम पर लगातार तुष्टिकरण का जो खेल खेला जा रहा है उस कारण देश जाति, क्षेत्र व भाषा के नाम बंटता चला जा रहा है। वोट बैंक की राजनीति के कारण अतीत में शाहबानों के मामले में कैसे मुस्लिम महिलाओं के हक के साथ खिलवाड़ किया गया वह हमारे सामने है। आज न्यायालय संविधान के अन्तर्गत प्रश्न पूछ रहा है और बहस केंद्र बिन्दु भी संविधान और पर्सनल लॉ ही होना चाहिए, पर राजनीति और तुष्टिकरण की नीति को प्राथमिकता देते हुए सिब्बल साहिब घटिया उदाहरण देने से भी नहीं कतराये।

समय की मांग यह है कि किसी भी समाज चाहे वह हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख हो या ईसाई इसमें आस्था के नाम पर जो कुरीतियां हैं या भ्रम व भ्रांतियां हैं उन्हें कानून द्वारा सुधारा जाए और संविधान की भावना अनुसार देश में धर्म-निरपेक्षता को मजबूत किया जाए। 
 

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